मेधनाद साहा का जीवन परिचय – Meghnad saha biography in Hindi,

भारत के महान वैज्ञानिक मेघनाथ साहा (M.N. SAHA )जाने-माने खगोलशास्त्री थे। तारा भौतिकी ( astro physics) के क्षेत्र में उनकी खोज ने उन्हें विश्व के महान वैज्ञानिक की श्रेणि में लाकर खड़ा कर दिया।

साहा समीकरण उनकी महत्वपूर्ण खोज मानी जाती है। जिससे सूर्य और तारों के अध्ययन में आसानी हुई। आगे हम मेधनाद साहा का जीवन परिचय में उनकी जीवनी के साथ-साथ भौतिकी विज्ञान के क्षेत्र में उनकी खोज के के बारे में विस्तार से जानेंगे। महान खगोलशास्त्री मेधनाद साहा

उन्होंने भौतिकी विज्ञान में ऊष्मा के क्षेत्र में उल्लेखनीय अनुसंधान कर विश्व पटल पर भारत को गौरान्वित किया। उनके इस सिद्धांत को महान वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने भी सराहा था और उनके इस खोज को संसार के लिए महान उपलब्धि बताया।

मेधनाद साहा का जीवन परिचय - Meghnad saha biography in Hindi,
मेधनाद साहा का जीवन परिचय / Image credit commons.wikimedia.org

रॉयल सोसायटी इंगलेंड के फेलो(सदस्य) चुने जाने वाले संभवतः वे सबसे कम उम्र के भारतीय वैज्ञानिक थे। एक खगोलशास्त्री के अलावा मेघनाद साहा एक महान स्वतंत्रता सेनानि भी थे।

सुभाष चंद्र बोस से वे काफी प्रभावित थे। भारतीय कैलेंडर के क्षेत्र में उनके अहम योगदान सराहनीय माना जाता है। तो चलिये मेधनाद साहा का जीवन परिचय (meghnad saha biography in hindi ) विस्तार से जानते हैं

मेधनाद साहा का जीवन परिचय – meghnad saha biography in hindi

इस पैराग्राफ में मेघनाथ साहा की जीवीनी से जुड़ी उनके प्रारम्भिक जीवन के वारे में सविस्तार वर्णन किया गया है। भारत के इस विज्ञानिक का जन्म आधुनिक बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुआ था।

आजादी के पहले यह क्षेत्र पूर्वी बंगाल के नाम से ब्रिटिश भारत का अभिन्न अंग था। डॉ मेघनाद साहा का जन्म 6 अक्टूबर सन 1893 ईस्वी में ढाका के पास शाओराटोली नामक गांव में हुआ था। डॉ साहा के माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।

डॉक्टर मेघनाद साहा के पिता का नाम जगन्नाथ साहा था। उनके पिताजी का गाँव में ही एक छोटी सी दुकान थी। उनके परिवार की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी। किसी तरह दुकानदारी से गुजर-बसर चल पाता था।

मेधनाथ साहा की शिक्षा दीक्षा – information about meghnad saha in hindi

बचपन से मेधनाथ साहा पढ़ने लिखने में अत्यंत ही मेधावी थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में हुई। अपने क्लास रूम में वे शिक्षक को सबाल पूछ कर विस्मित कर देते थे। उनकी प्रतिभा को देखकर उनके टीचर अत्यंत ही प्रभावित हुए।

प्राइमरी स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके पिता के पास आगे पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। डॉ साहा के पिता जगन्नाथ साहा चाहते थे की उनके पुत्र पढ़ाई के बाद बिजनेस में उनका साथ दे। ताकि परिवार की स्थिति सुदृढ़ हो सके।

लेकिन मेघनाद साहा की इच्छा कुछ अलग ही थी। वे उच्च शिक्षा ग्रहण कर कुछ नया करना चाहते थे। क्लास टीचर के सहयोग से उनके आगे की पढ़ाई की व्यवस्था की गयी। डॉ.अनंत दास नामक एक सज्जन ने उनके पढ़ाई में सहयोग दिया।

स्कूल से निकाला जाना

इस प्रकार उनका दाखिला अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में हुई। कहते हैं की अपनी लगन और कुशाग्र बुद्धि के कारण उन्होंने सिर्फ अपने क्लास में ही नहीं बल्कि पूरे जिले में टॉप रहे। इस कारण उन्हें छात्रवृति मिलनी शुरू हो गयी।

आगे की पढ़ाई के लिए उनका नामांकन सरकारी हाई स्कूल में हो गया। वे एक सच्चे देश भक्त थे। सन 1905 में बंगाल वीभाजन का उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने अपने साथियों के साथ स्कूल में गर्वनर के दौरे का विरोध किया था।

फलतः आजादी की लड़ाई में उनका नाम संलिप्त होने के कारण उनका नाम स्कूल से काट दिया गया। उन्हें छात्रवृति मिलनी भी बंद हो गयी। लेकिन उन्होंने हिम्मत से काम लिया और ढाका के किशोरी लाल जुबली हाईस्कूल से इन्टर की परीक्षा पास की।

महान वैज्ञानिक ज्योति वसु से मुलाकात

इन्टर की परीक्षा अच्छे नंबर से पास होने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे कलकत्ता चले आये। वहाँ उनका नामांकन कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में हुआ। अपनी कड़ी मेहनत और लग्न के बल पर उन्होंने स्नातक और भौतिकी में एम.एस.सी. की डिग्री हासिल की।

यहीं पर उनका मुलाकात भारत के महान वैज्ञानिक ज्योति वसु से हुई। कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कालेज में उन्होंने जगदीश चंद्र बसु तथा प्रफुल्ल चंद राय जैसे महान वैज्ञानिक से शिक्षा ग्रहण की।

इस दौरान महान वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बसु भी उनके साथ पढ़ते थे। डॉ साहा महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु से अत्यंत ही प्रभावित हुए। वसु साहब ने उन्हें भौतिक विज्ञान की तरफ कड़ी मेहनत करने को प्रेरित किया।

फलतः वे अक्सर वसु साहब के साथ लैब में जाते और नए-नए अनुसंधान करते रहते। इस तरह धीरे-धीरे उनका रुझान वैज्ञानिक खोजों की तरफ बढ़ता गया।

प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति

एम.एस.सी. की डिग्री हासिल करने के बावजूद भी उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिली। फलतः वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे। लेकिन साथ ही अपने अनुसंधान में सतत लगे रहे। फलतः एक दिन उनकी नियुक्ति कलकत्ता विश्व-विध्यालय में विज्ञान के प्रवक्ता के पद पर हो गयी।

डा साहा अपने लैब में हमेशा छात्रों से घिरे रहते। सन 1920 ईस्वी में उन्होंने विदेश की यात्रा की। अपने विदेश यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात अनेकों वैज्ञानिक से हुई।

सन 1923 ईस्वी में भारत वापस आने के बाद उन्हें प्रयागराज विश्वविद्यालय में भौतिकशास्त्र विभाग के अध्यक्ष बनाये गये। सन 1938 तक प्रयागराज विश्वविद्यालय में सेवा करने के वाद वे पुनः कलकत्ता वापस आ गये।

मेघनाद साहा की खोज, अविष्कार व देन (meghnad saha inventions in hindi )

दुनियाँ के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन के मूल शोधपत्र जर्मन भाषा में था। अल्बर्ट आइंसटीन के जर्मन भाषा में छपे मूल शोधपत्रों का अंग्रेजी में अनुवाद करने का श्रेय डॉ साहा को ही जाता है।

उन्होंने आइंसटीन के मूल शोधपत्र को केवल अनुबाद ही नहीं, बल्कि आसान शब्दों में समझाया। इस प्रकार आइंसटीन के द्वारा दिए गये सापेक्षिकतावाद और क्वांटम थ्योरी को लोगों को समझने में आसानी हुई।

खगोलीय भौतिकी के क्षेत्र में डॉ साह का योगदान

उन्होंने खगोलीय भौतिकी के क्षेत्र में काम करते हुए सूर्य और तारों से सम्बद्ध कई अहम जानकारी प्रदान की। इन्होंने कई विदेशी वैज्ञानिकों के साथ काम करते हुए कई अनुसंधान किया।

तारा भौतिकी के क्षेत्र में उनके योगदान और उनके द्वारा प्रदत्त साहा समीकरण ने उन्हें दुनियाँ में प्रसिद्ध कर दिया। इसके अलावा उन्होंने आयोनाइजेशन फार्मूला की भी खोज की।

इनके द्वारा प्रतिपादित सूत्र के कारण खगोलशास्त्र का अध्ययन करने वालों को सूर्य और अन्य तारों के आंतरिक तापमान और दबाव का ज्ञान हासिल करने में मदद मिली।

अपने अविस्कार से उन्होंने विश्व पटल पर भारत को गौरान्वित करने का काम किया। ऊष्मा भौतिकी पर उनके द्वारा लिखी गई किताब ‘ट्रीटाइज ऑन हीट‘ और ‘मॉडर्न फीजिक्स’ काफी लोकप्रिय रहा।

आजादी के बाद सांसद के रूप में योगदान

विज्ञान के उत्थान से साथ-साथ वे देश की समस्याओं के प्रति भी सतत जागरूक रहे। बचपन में बाढ़ की विभीषिका को डॉ.मेघनाद साहा ने करीब से अनुभव किया था। इस कारण दामोदर घाटी योजना सहित कई योजनाओं के पारुप तैयार करने में उन्होंने अहम रोल अदा की।

आजादी के बाद सन् 1953 ईस्वी में उन्हें इण्डियन साइंस एसोसिएशन का डाईरेक्टर बनाया गया। उन्होंने इस पद पर रहते हुए अपने दायित्वों को भली भांति निभाया।

बाद में वे कलकत्ता लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनकर सांसद भवन पहुंचे। उन्होंने भारतीय वैज्ञानिक और विज्ञान की समस्याओं से सरकार को बखूबी अवगत कराया और अनेक सुधार के काम किए।

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कई संस्थानों की नींव

उन्होंने अपने समपूर्ण जीवन को विज्ञान के प्रति समर्पित करते हुए कई संस्थानों की नींव रखी। अंतरराष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ की स्थापना का श्रेय उन्ही को जाता है। उन्होंने प्रयागराज में नैशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज की नींव रखी।

इसके अलावा डॉ साहा, ‘नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ साइंसेज ऑफ इंडिया’ तथा ‘इंडियन फिजिकल सोसायटी’ की स्थापना की। उनके कठोर प्रयास से साहा इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स नामक संस्थान की स्थापना हुई। उन्होंने ‘साइंस एण्ड क्लचर’ नाम से एक पत्रिका का भी प्रकाशन किया।

मेघनाथ साहा का निधन

अपना समस्त जीवन भौतिक विज्ञान और देश की सेवा में समर्पित कर दिया। सन् 1956 ईस्वी मे 16 फरवरी को जब वे सांसद भवन जा रहे थे।

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मेधनाद साहा का जीवन परिचय / Sdeoghuria – https://commons.wikimedia.org

तभी रास्ते में मुरक्षित होकर गिर पड़े। फलतः 16 फरवरी 1956 को नई दिल्ली में इस महान वैज्ञानिक का निधन हो गया। आज भले ही डॉ साहा हमारे बीच नहीं रहे लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में उनके अहम योगदान को हमेशा याद रखा जायेगा।

आपको मेधनाद साहा का जीवन परिचय (Dr meghnad saha biography in hindi ) कैसी लगी अपने सुझाव से जरूर अवगत करायें। मेधनाथ साहा के बारे में विशेष जानकारी के लिए meghnad saha wikipedia in hindi पर विज़िट करें।

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