Krishna Ji के जन्म की कहानी – Shri Krishna Janmashtami 2020

Shri Krishna Janmashtami के इस लेख में krishna ji के जन्म के बारें में विस्तार से जानेंगे। श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी का उत्सव हिन्दू समुदाय के लिए विशेष महत्‍व रखता है। द्वापर युग में जन्माष्टमी के दिन भगवान विष्णु ने Shri Krishna Ji के रूप में अवतार लिया था। श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है।

प्रतिवर्ष हिन्दू समुदाय के लोग Shri Krishna Janmashtami का उत्सव बहुत ही धूम-धाम से मनाते हैं। भगवान श्री कृष्ण के जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।

Krishna Ji के जन्म की कहानी  - Shri Krishna Janmashtami
Krishna Ji के जन्म की कहानी – Shri Krishna Janmashtami
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इसीलिए भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को Sri Krishna ji के जन्म को  Janmashtami के नाम से जाना जाता है। भारत में हिन्दू समुदाय के लोग भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाते हैं। भारत के आलवा यह त्योहार मॉरीशस, नेपाल तथा दुनियों के कई अन्य देशों में भी मनाते हैं।

Janmashtami के मौके पर दिन भर घरों और मंदिरों में लोग भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं। इस दौरान मंदिरों को विशेष रूप से सजा कर भगवान श्री कृष्ण की झांकियां निकाली जाती हैं. 

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Krishna Ji के जन्म की कहानी – Shri Krishna Janmashtami 2020

हिन्दू पंचांग के मुताबिक Shri Krishna Janmashtami 2020 का तारीख रक्षाबंधन के बाद पड़ेगा। प्रतिबर्ष श्री कृष्ण Janmashtami भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी महीने के अनुसार Shri Krishna Janmashtami  अगस्त और सितंवर के दौरान पड़ता है।

इस साल जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 11 अगस्त को पड़ रहा है।  फलतः श्री कृष्ण Janmashtami 2020 में मंगलवार के दिन 11 अगस्त को मनाया जाएगा।

जन्माष्टमी का त्योहार अर्धरात्रि को मनाया जाता मनाते है क्यों?

हिन्दू समुदाय के लोगों का भगवान श्री कृष्ण के प्रति गहरी आस्था है। वे दिव्य अवतारी पुरुष थे।  कहते हैं की भगवान श्री कृष्ण का जन्म राजा कंस के कारावास में हुआ था। जिस समय श्री कृष्ण का जन्म हुआ था, उस बक्त रोहिणी नक्षत्र चल रहा था। भयाभय काली अंधेरी रात के बीच मूसलाधार बारिश हो रही थी।

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष अष्टमी को अर्धरात्रि के समय हुआ था। यही कारण है की भगवान Shri Krishna Ji का जन्मोत्सव Janmashtami के रूप मेंअर्धरात्रि के बक्त मनाया जाता है।

जन्माष्टमी का त्योहार मनाने का तरीका

Shri Krishna Janmashtami का उत्सव हिन्दू समुदाय के लिए विशेष महत्‍व रखता है। क्योंकि इसी दिन सृष्टि के पालनकर्ता श्री हरि ने श्री कृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लिया था।

यह उत्सव दो दिन तक मनाई जाती है। पहले दिन Shri Krishna Ji के जन्मदिवस को विशेष व्रत, पूजा और भक्ति गीतों के साथ मनाते है। तथा दूसरे दिन को ‘दही-हांडी’ अर्थात ‘गोकुल अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

जन्माष्टमी महोत्सव पहला दिन

जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। इस दिन लोग घर में या मंदिर जाकर  भगवान श्री कृष्ण की विशेष पूजा-पाठ करते है। सभी आयु वर्ग के लोग Shri Krishna Janmashtami का उत्सव बड़े ही उमंग और उल्लास के साथ मनाते हैं।

श्री कृष्ण Janmashtami के अवसर पर कृष्ण मंदिरों में विशेष भजन-कीर्तन का प्रोग्राम आयोजित किया जाता है। जन्माष्टमी के दौरान मथुरा, वृंदावन, गोकुल में कृष्ण मंदिरों की रौनक देखते बनती है।

मध्य रात्री में Janmashtami महोत्सव

भगवान श्री कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में होने के कारण ही, ‘Shri Krishna Janmashtami ‘ का उत्सव रात के 12 बजे मनाया जाता है।  अपने मनोकामना की पूर्ति के लिए लोग इस दिन Shri Krishna Janmashtami ‘ का व्रत रखते हैं। इस दिन वे उपवास रखते है।

इस दौरान कुछ लोग अन्न के साथ-साथ जल भी नहीं ग्रहण करते। इसे निर्जला व्रत के नाम से जाना जाता है। वे आधी रात को Shri Krishna Janmashtami के आरती के बाद प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत का समापन करते हैं। भगवान श्री कृष्ण भाद्रपद अष्टमी को अर्धरात्रि को देवकी के आठवें संतान के रूप में जन्म लिया।

Shri Krishna Janmashtami के रात्री के ठीक 12 वजते ही मंदिरों में शंख की आवाज शुरू हो जाती है। इस समय पूरा माहौल कृष्ण भक्ति से भक्तिमय होता है जन्मोत्सव के अंत में भगवान श्री कृष्ण की आरती होता है तथा उन्हें माखन मिश्री से भोग लगाया जाता है।

श्री कृष्ण को मिश्री और माखन का भोग क्यों लगाते हैं।

कहते हैं की बचपन में भगवान श्री कृष्ण बहुत ही नटखट स्वभाव के थे। गोकुल के प्रत्येक घर में उनकी शरारतों की चर्चा होती थी। वे दूसरों के घर से माखन-मिस्री चुराकर खा जाते थे।

जिस कारण उन्हें माखन चोर भी कहा जाता है। मानते हैं की कन्हैया को दही और माखन काफी पंसद था। यही कारण है की भगवान Shri Krishna ji के पूजा के वाद  उनका प्रिय चीज मिश्री और माखन का भोग लगाया जाता है।

जन्माष्टमी की झांकी – Shri Krishna ji Janmashtami

जन्माष्टमी के अवसर पर कई जगहों पर भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेल का आयोजन किया जाता है। इस दौड़ान भगवान श्री कृष्ण के जीवन पर आधारित झांकी निकली जाती है।

Shri Krishna Janmashtami  के अवसर पर रास लीला के द्वारा कृष्ण की लीलाओं का मंचन किया जाता है। इस तरह Shri Krishna Janmashtami के मौके पर पूरा वातावरण कृष्ण भक्ति में सराबोर हो जाता है।

Shri Krishna Janmashtami के दूसरे दिन ‘दही-हांडी उत्सव

Krishna Ji के जन्म की कहानी  - Shri Krishna Janmashtami
Krishna Ji के जन्म की कहानी – Shri Krishna Janmashtami
महाराष्ट्र में दही-हांडी उत्सवKRISHNA JI
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Shri Krishna Janmashtami के दूसरे दिन महराष्ट्र में दही-हांडी उत्सव बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत में दही-हांडी नामक प्रतियोगिता का आयोजन व्यापक स्तर पर किया जाता है। 

दही-हांडी उत्सव की शुरुआत की कहानी

कहते हैं की श्री कृष्ण की शरारत से तंग आकार गोकुल की महिलाओं, माखन की मटकी को ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया। ताकि Shri Krishna Ji और उनके सखा मटकी तक न पहुंच पाये। लेकिन नटखट श्री कृष्ण अपनी समझदारी से उनकी सारी योजना को फेल कर देते थे।

श्री कृष्ण ने उचाई पर लटके हुए मटकी से भी माखन छुड़ाकर खाने का उपाय ढूंढ लिकाला। इसके लिए वे अपने सभी सखा को आपस में गोल घेड़ा(मानव पिरामिड) में खड़ा करते थे।

उसके वाद स्वयं सबसे ऊपर चढ़कर, ऊंचाई पर लटकाई हुई मटकी से दही व माखन चुरा लेते थे। Shri Krishna Janmashtami के अवसर पर आयोजित होने वाला आज का दही-हांडी नामक उत्सव भी इसी से प्रेरित है।

गोविंद का वेश धारण कर दही-हांडी फोड़ना

जैसा का हम जानते हैं की आधुनिक दही-हांडी उत्सव श्री कृष्ण द्वारा माखन चुराने के तरीके से प्रेरित है।इस दौरान लड़के भगवान श्री कृष्ण के वाल रुप का वेश धारण करते हैं। मटकी तोड़ने के लिए जो सबसे ऊपर खड़ा होता है उसे गोविंदा कहते हैं।

इसके लिए मिट्टी की मटकी में छाछ-दही तथा मक्खन भर हवा में उचाई पर लटका दिया जाता है। जैसे की Shri Krishna Ji अपने ग्वाल-वालों के साथ मटकी तक पहुचने के लिए करते थे। उसे तरह इस मटकी को बाल-गोविंदाओं की टोली मिलकर तोड़ने का प्रयास करते है।

इसमें गोविंदाओं की टोली एक दूसरे के ऊपर खड़े होकर एक उचे मानव पिरामिड बनाते हैं। गोबिंदा की जो टोली मटकी तोड़ने में सफल होता है उसे विजेता घोषित किया जाता है। विजेता बाल-गोविंदा को पुरस्कार देकर प्रोत्साहन किया जाता है।  

माया नागरी मुंबई तथा पुणे का दही-हांडी उत्सव बिश्व प्रसिद्ध है। Shri Krishna Janmashtami पर इसे देखने के लिए देश भर से लोग मुंबई पहुचते हैं। दही हांडी के उत्सव के दौरान लोग गोविंदा आला रे का गाने गाते हैं।

दही हांडी एक चुनौतीपूर्ण प्रतियोगिता

दही हांडी की प्रतियोगिता एक तरफ जहों उल्लास से भरे होते हैं वहीं दूसरी तरफ चुनौतियों से भरी होती है। इसमें प्रतियोगिता में भाग लेने वाले गोविंदायों को कभी-कभार जोखिम का सामना करना पड़ता है।

क्योंकि प्रतियोगिता को ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए, इनाम की राशि के साथ मटकी की उचाई भी बढ़ा दी जाती थी। कहीं-कहीं मटकी की उचाई 40 फिट से भी ज्यादा रखी जाती थी। इस दौरान मानव पिरामिड का संतुलन बिगड़ने के कारण हादसा का खतरा बना रहता है। कभी-कभार गहरी चोट भी लग जाता है।  

दही-हांडी पर महाराष्ट्र उच्च न्यायालय का फैसला

इसी के मद्देनजर साल 2014 में, एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया। महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में, दही हांडी लटकाने की अधिकतम उचाई 20 फीट तय की।  इसके साथ ही अदालत ने छोटे-छोटे बच्चे को इस प्रतियोगिता से दूर रखने की हिदायतें भी दी।

Shri Krishna ji की Janmashtami पर जानिए श्री कृष्ण की जन्म से जुड़ी कहानी

दुवापर युग की बात है एक बार मधुरा में उग्रसेन नामक राजा राज्य करता था। उनका पुत्र कंस बहुत ही अत्याचारी निकला। उसके अत्याचार के कारण सारे मथुरावासियों का भयभीत रहते थे। एक दिन कंस अपने पिता उग्रसेन को जेल में डालकर खुद मथुरा का राजा बन गया।

कहते हैं की जब कंस अपनी बहन देवकी को उसके विवाह के पश्चात विदा करने जा रहा थे। तभी उसी समय कंस के लिए एक आकाशवाणी हुई। कंस जिस खुशी से तुम अपनी बहन देवकी को विदा कर रहे हो उसी देवकी के गर्भ से उटपन आठवीं संतान तुम्हारा बिनाश करेगा।

कंस ने जब देवकी का मारना चाहा

यह सुनकर कंस को क्रोध आ गया । फिर क्या था राजा कंस ने रथ रोक दिया और अपनी बहन को ही तलवार के घाट उतारने के लिए आतुर हो गया। कंस ने सोच न देवकी बचेगी और न कोई मेरा वध करने  वाला पैदा होगा।

वासुदेव जी ने कंस को विनती कर समझाया की तुम्हारी दुश्मनी देवकी से नहीं है बल्कि उनसे उटपन संतान से है। इसीलिए देवकी की हत्या मत करो। मैं देवकी से उटपन संतान को तुम्हारे हवाले कर दूंगा।

कंस द्वारा देवकी और वसुदेव को कारावास

वासुदेव जी के बहुत ही अनुनय-विनय के वाद कंस ने अपनी बहन को जीवन दान तो दिया। लेकिन उसने देवकी एवं वासुदेव को सक्त पहरेदारी के बीच कारागार में डाल दिया।

कंस को यह संशय हो गया की देवकी का कौन सी आठवाँ संतान उसका वध करेगा। फलसरूप कंस ने देवकी के संतानों को जन्म लेते ही निर्दयतापूर्वक मारना शुरु कर दिया।

कंस के जेल में आधीरात को भगवान श्री कृष्ण का जन्म

Krishna Ji के जन्म की कहानी  - Shri Krishna Janmashtami
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जब देवकी के आठवीं संतान के रूप में श्री कृष्ण का जन्म हुआ। उस समय भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी की अर्धरात्रि का समय था और रोहिणी नक्षत्र चल रहा था। Shri Krishna Ji का जन्म होते ही जेल की कालकोठरी में आलौकिक प्रकाश फैल गया।

भगवान विष्णु ने चतुर्भुज रूप में वासुदेव जी को दर्शन देते हुये बोले। मैं बालक का रूप धारण कर रहा हूँ, तुम मुझे लेकर नन्द के घर पहुंचा दो। साथ ही नन्द के घर उटपन लड़की को लाकर कंस के हवाले कर देना। इस समय बाहर का वातावरण एकदम प्रतिकूल है।

बाहर काली अंधेरी रात में मूसलाधार बारिश हो रही है। यमुना नदी अपने उफान पर है, फिर भी तुम चिंता मत करना।  कहते हैं की ईश्वर कृपा से उस समय जेल के परेदार को गहरी नींद  आ गयी। कारागृह के दरवाजे अपने आप खुल गये और उफनती यमुना नदी ने पार जाने का मार्ग दे दी।

वासुदेव जी वाल Shri Krishna Ji को एक टोकरी में लेकर माता यशोदा और नन्द जी के हवाले कर दिया। इसके साथ ही वे नन्द जी के पास से कन्या लेकर वापस जेल में आ गये। तथा जेल का दरवाजा फिर से यथाबत स्थिति में हो गया।

कंस को देवकी के आठवें संतान के बारें में  पता चलाना

कंस को देवकी के आठवें संतान के बारें में पता चलते ही, उस पृथ्वी पर पटक कर मार देना चाहा। लेकिन वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गयी और बोली अरे मूर्ख कंस, मुझे मारना चाहता है। मैं श्री विष्णु की माया हूं और मेरा नाम वैष्णवी है।

तुम मुझे किया मार पायोगे, तुझे मारने वाला तो पैदा हो चुका है और इस समय गोकुल में मौजूद है। इतना कहकर वह कन्या हवा में विलीन हो गयी।

कृष्ण द्वारा पूतना, केशी, काल तथा अरिष्ट नामक दैत्य का प्राण हरण  

उस  कन्या की बात सुनकर कंस भयभीत हो गया तथा पूतना नामक राकक्षी को श्री कृष्ण को मारने के लिए गोकुल भेजा। कंस की आज्ञा से पूतना ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का वेश धारण गोकुल यशोदा के घर पहुंच गई।

पूतना स्तनपान के बहाने बालक Shri Krishna Ji को जहरीला दूध पिलाकर मार देना चाहती थी। लेकिन श्री कृष्ण ने स्तनपान के द्वारा ही पूतना के प्राण हर लिए।  

पूतना के मृत्यु के बाद कंस ने केशी नामक अश्व दैत्य को भेजा। Shri Krishna Ji ने उसे भी मार दिया। तत्पश्चात कंस ने अरिष्ट नामक दैत्य को बैल के रूप में कन्हैया को मारने के लिए भेजा। कृष्ण उस समय अपने सखा के साथ खेल रहे थे।

श्री कृष्ण खेल-खेल में ही उस बैल रूपी दैत्य का वध कर डाला। कंस ने जब कौवे के रूप में काल नामक दैत्य को भेजा तब Shri Krishna Ji ने गला दबोचकर उसे मार दिया।  

कृष्ण द्वारा कालिया नाग को जीवन दान

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एक समय की बात है श्री कृष्ण यमुना नदी के किनारे अपने सखा संग खेल रहे थे। तभी उनकी गेंद यमुना नदी में चली गयी। श्री कृष्ण गेंद लाने के लिए यमुना नदी में कूद पड़े। मैया यशोदा कृष्ण के बारें में  खबर मिलते ही लल्ला-लल्ला विलाप करती यमुना के तट पर पहुंची गयी। 

श्री कृष्ण का पानी के नीचे पहुचकर कालिया नाग सामना हुआ। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब कृष्ण ने कालिया नाग को परास्त कर नाथ दिया। तव कालिया नाग की पत्नी अपने पति के प्राणों की रक्षा के लिये Shri Krishna Ji से विनती करने लगी।

फलसरूप कृष्ण ने उसे जीवन दान दे दिया। तत्पश्चात वही कालिया नाग भगवान Shri Krishna Ji को अपने मस्तक पर उठाकर गेंद सहित पानी से बाहर ले आये।

कृष्ण द्वारा कंस का वध

अंत में कंस ने एक चाल के तहद अक्रूर जी के द्वारा कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया। वे कृष्ण को मथुरा बुलाकर अपने पहलवान चाणुर और मुष्टिक के द्वारा मारना चाहा। इसके आलवा कंस ने अखाड़े के मुख्य द्वार पर कुवलय नामक हाथी खड़ा कर रखा था।

जिससे की वे श्री कृष्ण को प्रवेश द्वार पर ही कुचल कर मार सके। लेकिन श्री कृष्ण, कंस के चाल को समझ गये और उन सबको वहीं मार दिया। कहावत है की मौत का स्थान और समय नियत होती है।

जब कंस, कृष्ण को ढूंढ रहा था तब श्री कृष्ण उनके पकड़ में नहीं आया। और जिस दिन Shri Krishna Ji का कंस से सामना हुआ वह कंस के लिए आखरी दिन साबित हुआ। कृष्ण और कंस में भयंकर युद्ध हुआ। अंतोगत्वा कृष्ण के हाथों अधर्मी कंस मारा गया। कंस के वध होने पर आकाश से देवताओं ने फूलों की वर्षा की।

धर्म की स्थापना के लिए भगवान का धरती पर अवतरण

इस प्रकार श्री कृष्ण ने कंस को मार कर धर्म के पुनः स्थापना की। अंतोगत्व  Shri Krishna Ji ने माता देवकी और पिता वसुदेव को कंस के कारागृह से मुक्त कराया।

कहते हैं जब-जब पृथिवी पर अत्याचार बढ़ जाता है। तव-तव प्रत्येक युग में धर्म की स्थापना के लिये भगवान का अवतरण इस धरती पर होता है। इस बात को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में भी कहा है-

“परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम् धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे!”

भगवान श्री कृष्ण के अलग अलग नामों की कहानी

वैसे तो भगवान Shri Krishna Ji के सैकड़ों नाम हैं- जैसे गोपाल, श्यामसुंदर, चितचोर, गोबर्धनधारी,  सावरिया, मुरारी, मुरलीधर, बंसीधर, मोहन, मनोहर इत्यादि। आगे चलकर इनका नाम मुरलीधर, बंशीधर, मुरलीवाला, माखन चोर, चितचोर, पड़ा। भगवान श्री कृष्णके हर नाम के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर जुड़ी है। आइये जानते है।

कृष्ण का नाम कृष्ण, श्याम व कान्हा और कन्हैया कैसे पड़ा।

कहते हैं की Shri Krishna Ji का नामांकरण संस्कार गर्गाचार्य जी ने किए थे। नामांकरण के समय गर्गाचार्य ने माँ यशोदा को बताया की भविष्य में आपके पुत्र के कई नाम होंगे। जैसे जैसे वह बड़ा होता जाएगा वैसे-वैसे इनके नाम की संख्या बढ़ती जायेगी।

गर्गाचार्य जी बोले, चुकीं बालक दिखने में श्याम अर्थात कृष्ण(काला) वर्ण के है। इसलिए इसका नाम श्याम अर्थात कृष्ण होगा। यह सुनकर मैया बोली बाबा यह कैसा नाम रख दिया, कोई अच्छा और सीधा सा नाम बता देते। तब गर्गाचार्य जी बोले आप इसे किशन, कान्हा, कन्हैया या किसना कुछ भी पुकार लेना। आपका लल्ला दौरा चला आएगा।

भगवान कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहा जाता है।

कहते हैं की जरासंध के साथ लड़ाई में एक बार भगवान श्री कृष्ण युद्ध के मैदान को छोड़कर भाग खड़े हुए थे। तभी से इनका नाम रणछोड़ पड़ा। इस प्रकार जब  द्वारका के  राजा बने तब वे द्वारकाधीश कहलाये। इस प्रकार ज्यों-ज्यों भगवान Shri Krishna Ji बड़े होते गये उनके नये नाम जुडते गये।

श्री कृष्ण को माखन चोर कहलाने के पीछे कहानी

Shri Krishna Ji Janmashtami 2020
Krishna Ji के जन्म की कहानी – Shri Krishna Janmashtami
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कान्हा को माखन इतना प्रिय था की अपने बाल सखा के साथ पास-पड़ौस के घरों से भी  माखन चोरी करके खा जाते थे। हर दिन कान्हा का शिकायत मां यशोदा के पास आती थी।

कहते हैं की एक दिन मां यशोदा ने नटखट श्री कृष्ण को माखन चोरी से रोकने के लिए ओखली से बांध दिया। लेकिन हर बार नटखट कान्हा अपनी चतुराई और सूझ-बुझ से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते। फलतः माखन चुराने के वजह से ही Shri Krishna ji का नाम ‘माखन चोर’ पड़ा।

श्रीकृष्ण की विभिन राज्य में अलग अलग नाम से पूजा।   

भगवान श्री कृष्ण बचपन से ही अपने कर्मों के आधार पर अलग-अलग जगहों में अलग-अलग नामों से जाने गये। इस प्रकार भारत के अलग अलग राज्य में भगवान Shri Krishna Ji को अलग-अलग नामों से पूजा जाता है।

उत्तर प्रदेश में इन्हें श्री कृष्ण, कान्हा, नंद गोपाल, ब्रजवासी, बांके बिहारी, मुरलीधर इत्यादि अनेकों नाम से पुकारा जाता है।  राजस्थान में ये श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से तो गुजरात में द्वारकाधीश के नाम से पूजनीय हैं। मध्य भारत में इन्हें विट्ठल, उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ तथा बंगाल में गोपालजी के नाम से पूजते है।

वहीं दक्षिण भारत में वेंकटेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में इन्हें Shri Krishna Ji नाम से पूजा की जाती होती है। इसके साथ भारत के पड़ोसी देश नेपाल में इन्हें भगवान श्री कृष्ण के नाम से पूजते हैं।

श्री कृष्ण का जीवन दर्शन

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में जन्म के समय से ही निरंतरता देखने को मिलती है। उनका जन्मे लेते ही जेल कर दरवाजा खुलना, अंधेरी रात में गोकुल जाना। वचपन में ही कई रकक्षों को वध करना।

कृष्ण अवतार में उन्होनें कुरुक्षेत्र में गीता के उपदेश के द्वारा आत्मा और परमात्मा जैसे गूढ रहस्य से मानव को अवगत कराया। भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में सदा ही कर्मण्येवाधिकारस्ते पर बल दिया। गीता में उनका उपदेश अकाट्य और सदा आत्मसात करने योग्य है।

भगवान श्री कृष्ण ने ऊंचाई पर लटकी हुई दही-हांडी से माखन खाकर एक संदेश दिया। उन्होंने बताया की भले ही लक्ष्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर मिलकर प्रयास किया जाय तो सफलता अवश्य मिलती है।

भगवान श्री कृष्ण बहु-आयामी व्यक्तित्व के पुंज थे। उनके बहु-आयामी व्यक्तित्व की व्याख्या करना संभव नहीं है। भगवान Shri Krishna Ji के जीवन में निरंतर कर्म की गतिशीलता दिखाई देती है। जीवन प्रयत्न हमेशा वे सक्रिय दिखाई दिये।

उपसंहार (Conclusion)- happy Janmashtami 2020

वे परम योद्धा के साथ ही, एक कुशल  राजनीतिज्ञ भी थे। जिसका प्रयोग उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए किया। भगवान श्री कृष्ण ने हमेशा कर्मण्येवाधिकारस्ते के महत्व पर बल दिया।

उनके द्वारा गीता में कही गयी हर बात जीबन में आत्मसात करने योग्य है। Janmashtami 2020 के अवसर पर हम Shri Krishna Ji के आदर्श को अपने जीवन में उताड़ना चाहिए। Happy Janmashtami 2020।

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