mahadevi verma biography in hindi – महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma Biography In Hindi – महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा एक महान कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल चित्रकार थी। छायावाद युग की प्रसिद्ध कवयित्री में महादेवी वर्मा का नाम शुमार है। उनकी काव्य का रचनाकाल 1924 से लेकर 1942 ईस्वी तक माना जाता है।

उनका पूरा जीवन शिक्षा को ही समर्पित रहा। उन्होंने एम ए करने के बाद प्रयाग महिला विध्यापीठ की प्राचार्य बनी और आजीवन इस पद पर रहीं। प्रारंभ से ही उन्हें काव्य के क्षेत्र में रुचि थी, और मात्र सात बर्ष की अवस्था में उन्होंने कविता लिखनी शुरू कर दी थी।

उन्होंने कुछ दिन महिलाओं की पत्रिका ‘चाँद’ का भी सम्पादन किया। महिला अधिकारों के लिए जीवन भर वे संघर्ष करती रही। उन्होंने महिलाओं को अपने हक के लिए लड़ना सिखाया।

महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा को ‘सरस्वती’ नाम से पुकारते थे। महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की ‘मीरा’ भी कहते हैं।

Mahadevi Verma Biography In Hindi - महादेवी वर्मा
Mahadevi Verma Biography In Hindi – महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा का जीवन परिचय (Mahadevi Verma Biography In Hindi )

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 ईस्वी को उत्तरप्रदेश के फरुखाबाद में हुआ था। उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा एक शिक्षक थे। माता हेमरानी वर्मा विदूसी और अत्यंत ही धार्मिक प्रवृति की महिला थी।

वे अपने माता पिता की एकलौती संतान थी। उनके पिता ने प्यार से उनका नाम महादेवी रखा था। कहते हैं की महादेवी वर्मा के नाना जी वज्र भाषा के कवि थे। इस कारण बचपन से काव्य रचना की प्रेरणा उन्हें अपने ही परिवार से प्राप्त हुई।

उनकी आरंभिक शिक्षा घर के साथ इंदौर के मिशन स्कूल में हुई। बचपन से ही महादेवी वर्मा की पढ़ाई में बहुत मन लगता था।

बाल्यावस्था से ही उन्हें सूर, तुलसी और मीरा जैसे संत व कवियों की रचनाओं को पढ़ने में विशेष रुचि थी। आगे चलकर यही महान संत व कवि उनकी जीवन का प्रेरणा स्रोत बने।

विवाह व शिक्षा

महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma )की बाल्यावस्था में ही शादी कर दी गयी। उनके पति का नाम डॉ रूपनारायण वर्मा था। हालांकि कहते हैं की उनका दाम्पत्य जीवन उतना सफल नहीं रहा। शादी के बाद उनके शिक्षा में कुछ दिनों के लिए रुकावट आ गयी।

लेकिन उन्होंने दुबारा अपनी पढ़ाई शुरू की। उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद ) में नामांकन लिया। वहीं पर उन्होंने हाई स्कूल, इंटर और स्नातक की परीक्षा पास की। वे हमेशा पढ़ाई में अव्वल रही और इसके लिए उन्हें छात्रवृति भी प्रदान की गयी।

सन 1933 ईस्वी में उन्होंने प्रयागराज यूनिवर्सिटी से संस्कृत में एम ए की परीक्षा पास की। उनकी पहली रचना ‘चाँद’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। उनकी रचना को खूब सराहा गया।

बाद में वे इस पत्रिका का सम्पादक भी बनी। इस रचना के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। वे काव्य साधना के पथ पर अनवरत चलती रही। 

भगवान बुद्ध से थी प्रभावित

कहते हैं की महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma ) भगवान बुध से बेहद प्रभावित रहीं। उनकी रचनाओं में करुणा तथा संवेदना का भाव बुध से ही प्रेरित लगता है। कहा जाता है की एक बार वे अपने घर गृहस्थी छोड़कर सन्यासी बनने की तरफ अग्रसर होने का मन बना ली थी।

लेकिन महात्मा गाँधी से मुलाकात के बाद उनका इरादा बदल गया। और उन्होंने अपना सारी जिंदगी हिंदी साहित्य के सृजन में समर्पित कर दी।

नारी शिक्षा और अधिकार के लिए सतत प्रयासरत

महादेवी वर्मा ने प्रयागराज यूनिवर्सिटी से संस्कृत में डिग्री लेने के बाद प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनीं। वहाँ पर उन्होंने महिला को समर्पित प्रसिद्ध पत्रिका ‘चाँद’ का सम्पादन किया। इस पत्रिका का सम्पादन के लिए उन्होंने कोई शुल्क नहीं ली।

इस पत्रिका के संपादन द्वारा उन्होंने नारी शिक्षा, उनके अधिकारों के बारें में जमकर लिखी। वे महिलाओं के स्वतंत्रता को समाज में उनके सम्मानजनक स्थान के लिए हमेशा प्रयत्न शील रही। उन्होंने नारी की विकास के लिए शिक्षा को आवश्यक माना।

महादेवी वर्मा की रचनायें (mahadevi verma ki rachnaye in hindi )

महादेवी वर्मा जी की गद्य और पद्य दोनो में महारत हासिल थी।

काव्य ग्रंथ – उनकी काव्य रचनाओं में निहार, रश्मि, नीरजा, संध्या गीत, दीपशिखा, प्रथम आयाम, सप्तपर्णा, सन्धिनी, अग्निरेखा, आत्मिका, दीपगीत, नीलाम्बरा और यामा आदि प्रसिद्ध हैं।

गढ़ ग्रंथ में – उनकी गद्य कृतियों में स्मृति की रेखाएं, मेरा परिवार, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियां और अतीत के चलचित्र आदि प्रसिद्ध हैं।.

महदेवी वर्मा की रचनाओं की विशेषता

उनकी अधिकतर रचनायें नारीवादी दृष्टिकोण पर केंद्रित लगती हैं। महादेवी वर्मा ने करुणा की अभिव्यक्ति के लिए अपने रचनाओं में शब्दों का चयन इस प्रकार किया है की उनकी रचनाओं ने लोगों के दिल को छुआ।

उनकी रचनायें आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है। चाहे गद्य हो या पद्य उन्होंने अपनी हर रचना में जान डाल दिए हैं।

महादेवी वर्मा की भाषा शैली

Mahadevi Verma की रचनाओं में बिरह और वेदना का समन्वय दिखाई देता है। शुरुआत में उन्होंने वज्र भाषा में अपनी कविता लिखी। लेकिन बाद में उन्होंने खड़ी बोली में अपने काव्य की रचना करने लगी।

उनका नाम हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में लिया जाता है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत के साथ हिंदी साहित्य के छायावाद युग को एक नई दिशा और चेतना प्रदान की।

उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में  में भावात्मक शैली का अद्भुत प्रयोग किया है। उनकी रचना में अलंकार के रूप में उपमा, रुपक आदि की प्रधानता नजर आती है।

पुरस्कार व सम्मान

महादेवी वर्मा को भारत सरकार के द्वार सन 1956 ईस्वी में पद्ध भूषण से सम्मानित किया था। साहित्य के सबसे बड़े सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हने 1982 ईस्वी में उनकी प्रमुख काव्य संग्रह ‘यामा’ के लिए प्रदान किया गया।

हिंदी साहित्य में अमूलय योगदान के लिए वर्ष 1988 ईस्वी में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन की तरफ से उन्हें भारतेन्दु अवॉर्ड प्रदान किया गया। इसके आलवा भी उन्हें कई छोटे-बड़े अवॉर्ड से सम्मानित  किया गया।

महादेवी वर्मा की मृत्यु ( death of Mahadevi Verma )

हिन्दी साहित्य को अपना समस्त जीवन समर्पित करने वाली महादेवी वर्मा की प्रयागराज में 11 सितंबर 1987 को मृत्यु हो गयी। उनकी कृतियों अनुपम और महान हैं। हिन्दी साहित्य जगत इस आधुनिक मीरा की सदा ऋणी रहेगी।

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महादेवी वर्मा की कविता के कुछ अंश

काव्य का नाम – मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हँसा नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झारिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा, श्वासों से स्वप्न-पराग झरा नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय-बयार पली।

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल, चिन्ता का भार बनी अविरल रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना, पथ-चिह्न न दे जाता जाना; सुधि मेरे आगन की जग में, सुख की सिहरन हो अन्त खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना, इतिहास यही उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

महादेवी वर्मा

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