मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है, क्या है इसका इतिहास और पौराणिक महत्व – Makar Sankranti kyu Manaya jata hai

मकर संक्रांति का पर्व, पौराणिक महत्व और इतिहास – क्यों मनाई जाती है, मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है, मकर संक्रांति का अर्थ, Makar Sankranti kyu Manaya jata hai itihas and importance.

मकर संक्रांति नववर्ष के आगमन के बाद भारत में मनाया जाने वाला पहला त्योहार है।  मकर संक्रांति का पर्व लौकिक के साथ-साथ शास्त्रीय भी है। इसी कारण जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तब मकर संक्रांति का पावन उत्सव मनाया जाता है। 

यह एक तरफ जहाँ ऋषि पर्व है वहीं दूसरी तरफ यह कृषि पर्व भी है। पराणिक कथाओं और कहानी से मकर संक्रांति के पौराणिक इतिहास और महत्व का पता चलता है। मकर संक्रांति को समुंद मंथन के साथ ही जोड़कर देखा जाता है।

क्योंकि इसी दिन देवताओं को दानव पर विजय प्राप्त कर अमृत पाने में सफल हासिल हुई थी। चाहे धरती पर गंगा के अवतरण की बात हो अथवा गंगासागर में गंगा की मिलन की, यह सारी घटना मकर संक्रांति के दिन ही तो हुआ था।

मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है, क्या है मकर संक्रांति का महत्व इस बात का अंदाजा इन बातों से लगाया जा सकता है की वाणों की शैया पर महीनों से पड़े भीष्म पितामह ने अपने प्राण मकर संक्रांति के दिन ही त्याग हेतु चुना था। इसी दिन से कुम्भ मेले की भी शुरुआत होती है।

Vedio – Makar Sankranti kyu Manaya jata hai

यह दिन क्यों खास होता है इसे आगे जानेंगे। कहते है कि इस पावन भूमि पर देवता भी जन्म लेने के लिए तरसते हैं। मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियां में स्नान, दान और पितृ तर्पण का विशेष महत्व है।

मकर संक्रांति के दिन गंगासागर, प्रयागराज में लाखों लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है कि हमारा देश भारत त्योहारों का देश है। आस्था के महापर्व छठ की तरह ही मकर संक्राति भी भगवान सूर्य को समर्पित है।

देश के प्रमुख त्योहार में मकर संक्रांति का नाम आता है। भारत के लोग ऋतुओं के  परिवर्तन  को बहुत ही उमंग और आस्था साथ मनाते हैं। इस दिन से, देश भर में सर्द हवाओं के बाद मौसम गर्म और सुखद होना शुरू हो जाता है।

मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है जो अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार साल का पहला उत्सव माना जाता है। इस त्योहार को सम्पूर्ण भारत में अलग-अलग नामों और तरीके से मनाया जाता है। कहीं यह बीहू, कहीं पोंगल, कहीं संक्रांत तो कही खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है।

इस त्योहार को कुछ खास पकवानों से भी जोड़ कर देखा जाता है। इस अवसर पर तिल और गुड़ के लड्डू, गजक, तिलकुट इत्यादि खूब बनाये और खाये जाते हैं। साथ ही कुछ राज्य में इस अवसर पर खिचड़ी और दही + चुरा(पोहा) खाने का चलन है।

मकर संक्रांति हर वर्ष 14 तारीख को ही क्यों मनाया जाता है, इस लेख में इस पर भी चर्चा करेंगे। इस दिन पतंग उड़ाने का भी प्रचालन है। यहाँ तक की इस अवसर पर भारत के गुजरात में अंतर्राष्ट्रीय पतंग उत्सव का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें दुनियाँ भर के पतंगवाज भाग लेते हैं।

इस लेख में मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है क्या है मकर संक्रांति का इतिहास और पौराणिक महत्व, विस्तार से जानते हैं। हमे आशा है मकर संक्रांति पर लिखा गया यह लेख आपको जरूर पसंद आएगा। तो चलिए सबसे पहले हम मकर संक्रांति का अर्थ समझते हैं।

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मकर संक्रांति का अर्थ – information about makar sankranti in hindi

मकर संक्रांति का मतलव क्या है समझते हैं। ज्योतिषीय रूप से, मकर का अर्थ ‘मकर’ राशि और ‘संक्रांति ‘ का आशय परिवर्तन से है। सूर्य का एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करने की क्रिया ही संक्रांति कहलाता है।

बैज्ञानिक भाषा में इसे ‘विंटर सोलस्टाइस‘ (Winter Solstice) कहा जाता हैं। इस प्रकार मकर संक्रांति अर्थ होता है, सूर्य का मकर राशि में संक्रमण यानि  प्रवेश करना। इस दिन को हिंदू धर्म में किसी मंगल कार्य के शुरुआत के लिए सबसे शुभ दिन माना गया है।

जब सूर्य अपनी वार्षिक घूर्णन गति के दौरान धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में संक्रमण करती है। तब इसे हिन्दू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति कहते हैं। इसीलिए इस संक्रांति को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। 

संक्रांति का चक्र हर महीने जनवरी से दिसम्बर तक चलते रहता है। साल भर में सूर्य की कुल 12 संक्रांतियों में सिर्फ चार संक्रांति मेष, तुला, कर्क और मकर राशी कि संक्रांति ही सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। 

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व

सूर्य 6 माह दक्षिणायन और 6 माह उत्तरायण में रहता है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश के साथ ही धीरे-धीरे सर्दी कम होने लगती है। इस दिन से रातें छोटी व दिन तिल-तिल कर बड़े होने लगते हैं जिस कारण मौसम में बदलाव शुरू हो जाता है।

इस दिन से वातबरण के तापमान में धीरे धीरे बढ़ोतरी शुरू हो जाती है। प्राणियों में नई ऊर्जा का संचार शुरू हो जाता है। इस दौरान लोग पवित्र नदियों में स्नान के साथ ढोल नगारे, गायन, नृत्य,और पतंग बाजी  जैसे विभिन्न क्रिया कलापों के द्वारा खूब आनंद लेते हैं।

मकर संक्रांति का अध्यात्मिक महत्व –

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व तो है ही लेकिन आध्यात्मिक महत्व का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है। मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है, इसके आध्यात्मिक पहलू को जानते हैं।

कहते हैं की इस दिन से ही देवताओं की दिन की शुरुआत मानी जाती है। इस कारण मकर संक्रांति का दिन किसी मंगल कार्यों के आरंभ करने के लिए सर्बोत्तम जाता है। मकर संक्रांति का कितना महत्व है।

मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है (Makar Sankranti kyu Manaya jata hai ) इस बात का उत्तर नीचे लिखे बातों से स्पष्ट हो जायेगा।

क्यों भीष्म ने मकर संक्रांति के दिन ही स्वेच्छा से अपना प्राण त्यागा

महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था।  महाभारत के लड़ाई में अर्जुन के बाणों से बुरी तरह आहात होने के बाबजूद बाणों की सैया पर वे लम्बे समय तक पड़े  रहे। 

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है, इतिहास और महत्व - MAKAR SANKRANTI KYU MANAYA JATA HAI
भीष्म ने मकर संक्रांति को देह त्याग किया

अगर वे चाहते तो अपनी इच्छानुसार मृत्यु को वरण कर सकते थे  लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके दो कारण थे। पहला कि वे महाभारत कि लड़ाई के परिणाम जाने बिना प्राण त्यागने के पक्ष में नहीं थे।

क्योंकि वे मरने से पहले हस्तिनापुर की राजगद्दी को सुरक्षित  देखना चाहते थे। और दूसरा कारण  था वे जन्म जन्मांतर के बंधन से मुक्ति होकर परमधाम यानि मोक्ष को प्राप्त करना।

उन्हें यह मालूम था दक्षिणायन काल की तुलना में उत्तरायण काल में शरीर त्याग करने से मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।

जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश कर गया। वैदिक साहित्य के अनुसार दक्षिणायन को पितृयान यानि देवताओं कि  रात्रि तथा उत्तरायण को देवयान यानि देवतओं का दिन कहा गया है।

यही कारण था की भीष्म पितामह जैसे महारथी भी मोक्ष की कामना लिए Makar Sankranti के दिन अपना मृत्यु का दिन चुना था।  

इसी दिन हुआ था गंगा का घरती पर अवतरण

महाराजा भगीरथ ने कठोर तपस्या के वल पर इसी दिन गंगा को धरती पर उतारा और अपने पुर्वजों को शाप से मुक्ति दिलाई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों  के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्बी पर उतारा।

कहते हैं कि गंगा स्वर्ग से उतरने के बाद हिमालय पर्वत के रास्ते गंगासागर नामक स्थान पर सागर में समाहित हो गयी। इस प्रकार राजा भगीरथ के 60 हजार पूर्वजों कि अस्थियों इनकी पवित्र जलधारा में बहकर सागर में समाहित हो गयी।

इस प्रकार राजा भगीरथ ने अपने साठ हजार पुर्वजों को जो वर्षों से मुक्ति का इंतजार कर रही थी उन्हें सदगति दिलाई।

कुम्भ मेले की शुरुआत मकर संक्रांति के दिन से होती है

पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं एवं दानवों ने मिलकर समुन्द्र मंथन किया था।  समुन्द्र मंथन के फलसरूप चौदह प्रकार के रत्नों निकले।  लेकिन इन सब में जो सबसे बहुमूल्य चीज निकला वह था “अमृत से भरा कलश” । 

अमृत प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों के बीच निरन्तर संघर्ष हुआ। दानव अमृत कलश लेकर आगे-आगे भाग रहे थे और  देवगण उनका पीछा करते हुए छीनने का प्रयास कर रहे थे। कहते है की जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में मकर संक्रांति के दिन प्रवेश किया।

तब दानव, देवताओं के पकड़ में आए और अमृत कलश को अपने कब्जे में लिया। इस संघर्ष के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयागराज , हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) में अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर गिरी थीं।

जिससे यह स्थान पावन हो गया। तभी से इन स्थानों पर प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता होता है। तभी से कुम्भ मेले का पहला स्नान की शुरुआत भी मकर संक्रांति के दिन होती है।

गंगासागर में इस दिन विशाल मेले का आयोजन

इस अवसर पर गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान व  तर्पण का विशेष महत्व माना गया है। कहते हैं इस दिन स्नान, दान, तप से मनुष्य जन्म जन्मांतर के बंधन से मुक्त हो जाता है।

मकर संक्रांति के मौके पर बंगाल के गंगासागर में स्नान, दान और पितरों के तर्पण का भी विशेष महत्व है। गंगासागर में इस दिन लाखों श्रद्धालु आस्था कि डुवकी लगाकर मोक्ष कामना लिए अपने पितरों का तर्पण करते हैं।

हिन्दू समुदाय के लोग मकर संक्रांति की शुरुआत सुबह पवित्र नदियों में स्नान के साथ करते है। तत्पश्चात सूर्य भगवान कि आराधना के साथ दान पुण्य करते है।

इसीलिए हिन्दू धर्म शास्त्र में मकर संक्रांति के दिन किया जाने वाला स्नान, दान, तर्पण आदि जैसे कार्यों का विशेष महत्व दिया गया है।

मकर संक्रांति से जुड़ी भगवान सूर्य और शनि की कहानी

इस पर्व को पिता और पुत्र के मधुर संबंध से भी जोड़ कर देखा जाता है। कहते हैं की इस दिन सूर्य देव ने वर्षों की नाराजगी त्याग कर अपने पुत्र शनि से मिले थे। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सूर्य देव अपने पुत्र शनि से किसी कारण से बहुत नाराज हो गए थे।

लेकिन मकर संक्रांति के दिन उन्होंने अपनी नाराजगी त्याग कर पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर गए थे। शनि देव ने अपने पिता को पास आए देख बहुत खुश हुए। उन्होंने अपने पिता सूर्य देव कि काले तिल से पूजा की।

भगवान सूर्य भी अपने पुत्र से खुश होकर उनका दूसरा घर मकर प्रदान किया। इसी इस दिन चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी बने। तभी से इस दिन का महत्व बढ़ गया और यह खास दिन मकर संक्रान्ति के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

यह प्रतिवर्ष 14 या 15 जनबरी को मनाया जाता है क्यों

भारत में हर त्यौहार कि कुछ खास पहचान है। मकर संक्रांति भी उन खास त्योहारों में आता है जिनकी अपनी अलग पहचान है। यह भारत का एक मात्र त्यौहार है जिसकी तिथि हर वर्ष पहले से निर्धारित होती है। 

क्योंकि यह त्योहार पूरी तरह से सूर्य की घूर्णन गति पर निर्भर करती है तथा उसी के अनुसार इसकी तिथि निर्धारित होती है। प्रतिवर्ष सूर्य का मकर राशि में प्रवेश कुछ मिनट के देरी से होता है।

इसलिए इसका समय थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ता रहता है। फलतः एक निश्चित समय अंतराल के बाद इस त्योहार की तिथि एक दिन आगे बढ़ जाती है। इसीलिए यह किसी-किसी वर्ष 14 जनवरी के बदले 15 जनबरी को मनाया जाता है।

किसानों के लिए कृषि पर्व है मकर संक्राति – About Makar Sankranti In Hindi

चूँकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसीलिए इस  त्यौहार को फसल से भी जोड़ कर देखा जाता है। मकर संक्रांति तब मनाई जाती है जब खरीफ फसल के कटाई के बाद खेत में रबी की फसल लहराने लगती है।

मकर संक्रांति का महत्व किसानों से बेहतर कौन जान सकता है। तभी तो यह त्यौहार फसलों और किसानों का त्योहार के नाम से भी जाना जाता है। इस त्योहार के दौरान किसानों में खास  प्रसन्नता और उत्साह देखने को मिलता है।

कुछ स्थानों पर इस दिन किसान अपने बैलों को सजा कर उसकी पूजा करते है। क्योंकि बैल हमेशा से उनके कृषि कार्य में सहायक रहा है। साथ ही वे खरीफ कि अच्छी पैदावार के लिए भगवान को धन्यवाद देते हैं तथा आने वाली रबी की अच्छी उपज की कामना करते हैं।

मकर संक्रांति की पूजा

मकर संक्रांति के दिन क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए इसके बारें में थोड़ा जानते हैं। मकर संक्रांति किसी भी शुभ कार्य के आरंभ करने का दिन होता है। इस दिन स्त्रियां पवित्र स्नान के बाद भगवान भास्कर की कर अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं।

वहीं बड़े बुजुर्ग इस पर्व को अध्यात्म से जोड़कर देखते हुए पवित्र स्नान के बाद जन्म जन्मांतर के बंधन से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। क्योंकि इस दिन स्नान, दान, तर्पण आदि जैसे कार्यों के लिए काफी महत्पूर्ण माना गया है।

• इस दिन सूर्योदय से एक या दो घंटे पहले जग जाना चाहिए। स्नान के पश्चात  जल और फूलों के साथ उगते सूर्य देव की पूजा करने के लिए तैयार रहें।

सूर्य देव  के उदय हो जाने पर गायत्री मंत्र का जाप करते हुए हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। इस प्रकार सूर्य से बुद्धि और ज्ञान की प्रार्थना करें।

• तिल और गुड़ के लड्डू तथा अन्य मिठाई तैयार करें। इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मिल बाँट कर ग्रहण करें।

• इसके साथ ही मकर संक्रांति के दिन जरूरतमंदों को उपयोगी वस्तुएं दानकर पुण्य अर्जित करें।

दक्षिणायन एबं उत्तरायण काल और संक्रांति

मकर संक्रांति के दिन  सूर्य दक्षिणायन को छोड़ कर उत्तरायण में प्रवेश करता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को गुजरात में उत्तरायण के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य जब छः महीने दक्षिणायन में होती है तो उस कालखंड को देवताओं की रात्री का समय होता है। 

उसी प्रकार जब सूर्य उतरायण में छ: माह रहता है वह काल देवताओं का दिन कहा जाता है। चूँकि मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उतरायण में प्रवेश करती है।  इस कारण शास्त्रों के अनुसार देवताओं के दिनों की गणना इसी दिन से ही शुरू होती है।

•     उत्तरायण का  समय काल  – 14   जनबरी से लेकर   13  जुलाई तक होती है। •     दक्षिणायन का समय काल  – 14   जुलाई से लेकर    13 जनवरी तक होती है।

मकर संक्रांति के बारे में In Hindi –

जैसा की हम जानते है की कुल बारह राशियाँ होती है। ज्योतिष्य गणना और चन्द्रमा की घूर्णन गति के आधार पर जैसे महीने को दो भाग में बाँट कर देखा जाता है  शुक्ल पक्ष एबं कृष्ण पक्ष।

ठीक उसी प्रकार सूर्य की वार्षिक गति को  भी दो भाग में बाँट कर देखा जाता है। दक्षिणायन एबं उत्तरायण।  सूर्य छः माह दक्षिणी गोलार्ध में रहती है जिसे दक्षिणायन और छः  माह उत्तरी गोलार्ध में जिसे उत्तरायण कहते है। 

सूर्य  जब पृथ्बी के दक्षिणी गोलार्ध में होती है तब यह क्रमशः कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृशिचक और धनु राशि से होकर गुजरती है।  ठीक उसी प्रकार सूर्य जब पृथ्बी के उत्तरी गोलार्ध में होती है तब यह मकर, कुम्भ, मीन मेष, वृषभ और धनु राशि से होकर गुजरती है।

इस प्रकार हर महीने  किसी एक राशि की संक्रांति  होती है। आइये हम हर महीने की संक्रांति के बारें में जानते हैं  कि किस महीने में कौन सी संक्रांति पड़ती है।

जनवरी मकर संक्रांति सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करती है
फरवरी कुम्भ संक्रांति सूर्य जब मकर राशि से कुंभ में प्रवेश करती है
मार्च- मीन संक्रांति कुम्भ राशि से जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करती है
अप्रेल- मेष Sankranti सूर्य का मीन राशि से मेष राशि में जब संक्रमण होता है। 
मई- वृषभ संक्रांति सूर्य जब मेष राशि से बृषभ राशि में प्रवेश करती है। 
जून- मिथुन संक्रांति सूर्य का वृषभ से मिथुन राशि में प्रवेश करने पर  
जुलाई- कर्क संक्रांति  सूर्य का मिथुन से कर्क राशि में प्रवेश करने पर होता है
अगस्त- सिंह संक्रांति सूर्य कर्क राशि से सिंह राशि में संक्रमण करती है।
सितम्बर कन्या संक्रांति सूर्य जब सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करती है।
अक्टूबर तुला Sankranti सूर्य जब कन्या राशि से तुला राशि में प्रवेश करती है।
नबम्बर वृश्चिक संक्रांति   सूर्य जब तुला राशि से वृश्चिक राशि में प्रवेश करती है 

संक्रांति का यह चक्र जनवरी से दिसम्बर तक चलते रहता है। ऊपर बर्णित सूर्य की कुल 12 संक्रांति में सिर्फ चार संक्रांति मेष, तुला, कर्क और मकर राशी कि संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। 

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति –

मकर संक्रांति भारत के अलग अलग राज्यों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। जानते हैं इस पर्व को भारत के किस राज्य में किस नाम से और किस तरह मनाया जाता है।

उत्तरप्रदेश : उत्तर प्रदेश में इस त्योहार को खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है।  इस दिन खिचड़ी खाने और दान करने कि परम्परा है।

मकर संक्रांति के दिन पवित्र गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व है।  इस कारण से उत्तर प्रदेश में इस पर्व को दान के पर्व के नाम से भी जानते हैं। 

इस दिन से प्रयागराज में गंगा जमुना और सरस्वती के संगम पर विशाल माघ मेले का आयोजन होता है। मकर संक्रांति के दिन प्रयागराज में संगम तट पर चले जाइये। वहॉं मकर संक्रांति के महत्व अपनी आखों से देख सकते हैं।

बिहार में मकर संक्रांति – विहार एवं झारखण्ड में इस त्यौहार को सकरांत के नाम से जाना जाता है।  विहार व् झारखण्ड के लोग सुबह गंगा जैसी पाबन नदियों में डुबकी लगाकर इस त्यौहार की शुरुआत करते है। 

तत्पश्चात सूर्य की आराधना करते है। इस दिन यहाँ के लोग स्नान के बाद  दही चुरा व् तिल  की मिठाई का सेवन करते हैं।  कुछ जगह पर लोग इसे खिचड़ी पर्व के नाम से पुकारते है और इस दिन खिचड़ी का सेवन करते है। 

पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति: पश्चिम बंगाल में इस त्यौहार को पौष संक्रांति या पौष पर्व के नाम से जाना जाता है।  पौष पर्व पर भी खास व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जैसे पुली पिट्ठा, खीर पुली पिट्ठा आदि।

इस त्यौहार के मौके पर पवित्र स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। पश्चिम बंगाल के 24 दक्षिण परगना जिले में सागर द्वीप अबस्थित है। इसी स्थल पर गंगा नदी सागर में मिलती है।

जिस कारण यह स्थान गंगासागर के नाम से प्रसिद्ध है। हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु गंगासागर में स्नान करते है। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगासागर में स्नान से मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।    

पंजाब और हरियाणा :   पंजाब और हरियाणा में मकर संक्रांति को माघी के नाम  जानते हैं। यहाँ मकर संक्रांति का महत्व कितना है, किस तरह से यहाँ के लोग मकर संक्रांति को मानते हैं आइये जानते हैं।

मकर संक्रांति के ठीक एक दिन पहले ‘लोहिड़ी’  मनाया जाता है।  लोहड़ी के शाम को सूर्यास्त के बाद घर के बाहर लकड़ी जमा कर उसमें आग लगाया जाता है। उस जलते हुए आग के चारो ओर लोग इकट्ठा होकर भांगड़ा  करते और लोहिड़ी लोकगीत गाते हैं। 

इसके साथ ही तिल ,मूंगफली, तिलकुट और मक्की के भुने हुए दाने आदि कि आग में आहुति दी  जाती है।  यह त्यौहार नवजात बच्‍चे और नई-नवेली दुल्‍हनों के लिए बेहद खास होता है। सभी एक-दूसरे को लोहड़ी कि वधाईयॉं देते हैं। 

सभी लोग आपस में गजक, मुगफली, तिल की मिठाइयॉँ आदि मिल बाँट कर खाते हैं। इस अवसर पर पंजाब के मुक्तसर में हर वर्ष माघी मेला का भव्य आयोजन होता है।

गुजरात :  मकर संक्रांति के दिन सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर आरंभ होती है।  इसीलिये  गुजरात में मकर संक्रांति को  उत्तरायण  नाम से जाना जाता है। गुजरात के लोगों के लिए मकर संक्रांति का दिन बेहद शुभ माना जाता है।

इस दिन बड़ों के साथ बच्चों में भी काफी खास उत्साह देखने को मिलता है।  बच्चे इस दिन बेरोक-टोक मौज-मस्ती करते हुए पतंगबाजी का मजा लेते है। 

क्योंकि गुजरात में मकर  संक्रांति को पतंग उत्सव के लिए भी जाना जाता है। मकर संक्रांति के पावन पर्व के अबसर पर गुजरात पतंगबाजी के लिए प्रसिद्ध है।

गुजरात में मकर संक्रांति के दिन आकाश में एक अद्भुत  नजारा नजर आता है। आसमान अलग अलग आकर एबं डिजाइन वाली रंग बिरंगी पतंगों से भर जाता है। 

यहाँ कि पतंगबाजी दुनियॉं भर में प्रसिद्ध है।  गुजरात में इस अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है।  इस महोत्सव में दुनियाँ भर के लोग गुजरात आकर पतंगबाजी का आनंद लेते हैं।

मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है, इतिहास और महत्व - MAKAR SANKRANTI KYU MANAYA JATA HAI
अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव

महाराष्ट्र में मकर संक्रांति : महाराष्ट्र में इस के दिन महिलाएं आपस में  तिल और गुड़  बांटते हुए “तिल गुड़ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला” बोलती हैं।

जिसका अर्थ होता है तिल गुड़ लो और गुड़ की तरह मीठा बोलो, ऐसा इसीलिए किया जाता है ताकि संबंधों में मधुरता बनी रहे। इसके साथ महाराष्‍ट्र में इस दिन खास तरह का हलवा खाने और बांटने की परंपरा है।

इसके आलावा महाराष्ट्र में मकर संक्रांति के दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल, नमक, गुड़, तिल, रोली आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं।  

तमिलनाडु में मकर संक्रांति : दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में इस त्यौहार को पोंगल के नाम से जाना जाता है।  सूर्य देव को अन्न और समृद्धि प्रदान करेने वाला देवता माना गया है।

अच्छी फसल के लिए सूर्य देवता के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है।  हर दिन पोंगल के अलग अलग नाम होते हैं।

पहला दिन – भोगी पोंगल —जो देवराज इन्द्र को समर्पित हैं,

दूसरा दिन – सूर्य पोंगल  –  इस पोंगल के दिन महिलायें खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में एक विशेष प्रकार की खीर तैयार करती हैं।  उसके बाद उस खीर को सूर्य देव को चढ़ाकर, प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

तीसरा दिन -मट्टू पोंगल – यहाँ के मान्यता के अनुसार भगवान भोले शंकर के बैल का  नाम मट्टू है।  जिसे भोले  शंकर ने मानव कल्याण के लिए धरती पर भेजे हैं। इस दिन बैलों को खूब सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। 

चौथा दिन – कन्या पोंगल – इस दिन घर खूब को सजाया जाता है. घर के मुख्य  द्वार पर महिलायें मनमोहक रंगोली बनती हैं।  तमिलनाडु में इस दिन जालु कट्टु का खेल का भी आयोजन किया जाता है।  यह काफी प्रसिद्ध खेल है जिसमें इंसानों को बैलों के साथ लड़ाया जाता है। 

यह बहुत ही साहस पूर्ण और जोखिम भरा खेल है। यह खेल तमिलनाडु के संस्कृति ले जुड़ा हुआ  है।  ऐसा माना जाता है की इस खेल का इतिहास लगभग 2000 साल पुराना है। इसके अलाबा भारत के अन्य राज्यों में भी यह त्यौहार अलग-अलग नामों के साथ मानते हैं।

विदेशों में मकर संक्रांति का त्यौहार

भारत कि तरह दुनियॉं के कुछ अन्य देशों में भी मकर संक्रांति है। भारत के पड़ोसी देशों में भी मकर संक्रांति का त्यौहार बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।  आइये एक नजर डालते हैं। 

हिमालय के तराई में बसा नेपाल में भी यह अलग अलग  रीति-रिवाजों द्वारा बहुत ही भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। नेपाल में मकर संक्रांति को माघे-संक्रान्ति या माघी के नाम से जानते है।

नेपाल में विशेषकर थारू समुदाय के लोगों के बीच Makar sankranti ka importance सबसे अधिक है। थारू समुदाय के लोगों का यह सबसे प्रमुख त्यैाहार है। यहाँ भी मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्त्व है।

नेपाल में इस त्यौहार को फसलों एवं किसानों के साथ जोड़ कर देखा जाता है। इस दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिये सूर्य देव को धन्यवाद  देते है।

पाकिस्ता के सिंध प्रांत में मकर संक्रांति के त्यौहार को  ‘तिरमूरी’ या उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। क्योंकि इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है। इस दिन लोग अपनी शादी शुदा पुत्री के घर शगुन के रूप में तिल का बना लड्डू भेजते हैं।

बंगलादेश के लोग इस त्यौहार को पौष संक्रांति के नाम से जानते है।  इस त्यौहार के दिन लोग स्नान के बाद तिल का दान करते हैं। श्रीलंका में मकर संक्रांति त्यौहार को तमिलनाडु के तरह पोंगल के नाम से मनाया जाता है। 

भारत के लोग भले ही दुनियाँ के जिस देश में बस गए हों अपनी संस्कृति और परंपरा को संभाले हुए हैं। इस प्रकार दुनियॉं के अन्य देशों में भी प्रवासी भारतीय के द्वारा मकर संक्रांति बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है।

मकर संक्राति का क्या अर्थ है?

मकर का आशय मकर राशी से है और संक्रांति का मतलब संक्रमण अर्थात प्रवेश करना होता है। इस प्रकार संक्रांति का अर्थ सूर्य का मकर राशी में गमन से है।

मकर संक्रांति पर्व का क्या महत्व है?

मकर संक्रांति के अवसर पर पवित्र नदियों में स्नान, दान व तर्पण का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के महत्व इस बात से चलता है की इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त भीष्म पितामह ने इसी दिन ही अपना प्राण त्यागा।

मकर संक्रांति में किसकी पूजा होती है?

मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान कर भगवान भास्कर की पूजा की जाती है।

14 जनवरी को मकर संक्रांति क्यों मनाते हैं?

इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करती है जो शुभ माना जाता है। यह दिन किसी विशेष कार्य की सुरुआत के लिए शुभ मानी जाती है।

आपको मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है, इसका इतिहास और महत्व (Makar Sankranti kyu Manaya jata hai) से जुड़ी जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी। अपने कमेंट्स से अवगत कराएं।

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