Swami Vivekananda 1983 speech – know स्वामी विवेकानंद death

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स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय – Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद त्याग, तपस्या, सेवा और भारतीयता संस्कृति के प्रखर प्रवक्ता थे। इसके साथ ही स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) दुनियाँ को वेदान्त का पाठ पढ़ाने वाले युवा सन्यासी और युग पुरुष थे। स्वामी विवेकानंद परमार्थ के प्रतिमूर्ति थे।

Swami Vivekananda - स्वामी विवेकानंद
Swami Vivekananda – स्वामी विवेकानंद

रवींद्रनाथ ने कहा है अगर भारत को कोई समझना चाहता है तो उसे स्वामी विवेकानंद को पढ़ना पड़ेगा। आडंबरों और अंधबिश्वासों से ऊपर उठकर उन्होंने धर्म की अद्भुत विवेचना किया। Swami Vivekananda का कहना था, धर्म मनुष्य के भीतर सद्गुणों का विकास है। यह केबल किताब या धार्मिक सिद्धांत में निहित नहीं है।

भारत में अनेकों संत हुये लेकिन सनातन धर्म के दिव्य ज्ञान के आलोक को, जन-जन तक पहुचाने का काम अगर किसी संत ने किया, वह था स्वामी विवेकानंद(Swami Vivekananda )।  उनके व्ययक्तित्व से ऐसा ओज निकलता था, उनके वाणी में ऐसा जादू था की सामने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था।

स्वामी विवेकानंद शिकागो रवाना होने के पहले अपने गुरुमाता माँ शारदा के पास आशीर्वाद लेने गये। माँ शारदा कुछ जबाब नहीं दी। जब विवेकानंद ने दुबारा पूछा तब माँ शारदा ने उन्हें एक चाकू लाने को बोली। Swami Vivekananda विना कुछ सबाल किए उनकी आज्ञा का पालन किया।

उन्होंने चाकू लाकर माँ शारदा की तरफ बढ़ा दिया। माँ शारदा ने देखा की स्वामी विवेकानंद चाकू का धार वाला हिस्सा खुद पकड़ कर मूठ की तरफ से चाकू उन्हें दिया। जबकी चाकू मांगने पर अमूमन लोग मूठ का भाग पकड़ कर धार के तरफ से चाकू सामने भले की तरफ बढ़ाते हैं।

माँ शारदा समझ चुकी थी की स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda ) में परमार्थ की भावना जागृत हो चुकी है। उन्होंने आशीर्वाद दिया पुत्र तुम्हारे अंदर जन-कल्याण की भावना प्रबल हैं। जाओ विश्व में तुम्हारा नाम रौशन हो।  

स्वामी विवेकानंद  जी द्वारा कही गयी हर बातें प्रेरणादायक और सटीक है। 8 साल की उम्र में स्कूल में दाखिला, 21 साल के उम्र में  बी ए पास करना, 25 साल के उम्र में सन्यास ग्रहण, 30 साल की उम्र में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग और  39 साल के उम्र में ही समाधी लेकर शरीर का त्याग करना।

लेकिन इस अल्प आयु में भी Swami Vivekananda दुनियों को इतना कुछ दे गये की वर्षों तक आने वाली पीढ़ी उन्हें याद करेंगे। समस्त भारत उन्हें स्मरण मात्र से हमेशा गौरान्वित अनुभव करेगा।

स्वामी विवेकानंद का बचपन – Biography of Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 ईस्वी कोलकता में हुआ था। उनके वचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यालाय में वकालत करते थे। उनकी माता भुवनेस्वरी देवी बहुत ही विदुषी महिला थी।

उनकी भगवान शिव की उपासना के साथ धर्म-कर्म में विशेष आस्था थी। नरेंद्र वचपन से ही अपनी माँ से रामायण, महाभारत आदि धार्मिक कहानियों सुना करते थे। इस प्रकार नरेंद्र में धर्म और अध्यात्म के प्रति लगाव बचपन से ही हो गया। वल्याबस्था से ही उसमें धीरे-धीरे धार्मिकता के बीज अंकुरित होने लगा।

नरेंद्र(Swami Vivekananda ) अपने दोस्तों के बीच बड़े लोकप्रिय थे। वे हमेश अपने मित्र मंडली का नेतृत्व करते। दोस्तों के साथ मिलकर वे अपना प्रिय खेल ‘राजा और राजदार’ का खेलते। नरेंद्र दोस्तों के साथ राज दरवार लगाते। कमरे की सीढ़ी के सबसे ऊपर वाले पौड़ी को राजसिंहासन बनाया जाता।

बालक नरेंद्र खुद राजा बनकर राजसिंहासन पर विराजमान हो जाते। तत्पश्चात राजमंत्री की नियुक्ति होती। अपने पदों के अनुसार सबके बैठने का स्थान निर्धारित होता। इस तरह वे शाही गरिमा के साथ राज दरबार में फैसला सुनाते। उनके साथियों का आपस में वाद-विवाद होने पर सुलह के लिए सभी नरेंद्र के ही पास जाते। 

नरेंद्र(Swami Vivekananda ) बचपन से ही नीरसता को पसंद नहीं करते थे। उनके जीवन में हमेशा सक्रियता दिखाई पड़ती है। बचपन में वे अपने मित्र मंडली के साथ नाटक खेला करते। इसके लिए घर के पूजा-कक्ष को नाट्यशाला बनाया जाता। इसके अलाबा अपने दोस्तों के साथ नियमित रूप से व्यायाम करते।    

उनकी शिक्षा दीक्षा – Education of Swami Vivekananda in hindi

नरेंद्र बचपन से ही तेज बुद्धि के थे। जब वे तीसरी कक्ष में थे तब उनको अपने पिता के साथ रायपुर जाना पड़ा। उस दौरान रायपुर में स्कूल नहीं होने की वजह से ज्यादातर समय वे अपने पिता के साथ बिताते। करीब दो साल के बाद वे अपने पिता के साथ कलकत्ता वापस लौटे।

तब बालक नरेंद्र(Swami Vivekananda ) की उम्र महज 8 साल की थी। कलकत्ता में  इनका नामांकन ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में कराया गया। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद कि आरंभ से ही अंग्रेजी एवं वंगला भाषा में शिक्षा प्राप्त हुई।

एक बार क्लास में शिक्षक पढ़ा रहे थे। तभी वे अपने दोस्तों से बात करते हुए पकड़े गये। शिक्षक ने वारी बारी से सभी लड़के को पढ़ाई गई बात को दोहराने को कहा। सारे लड़के चुप हो गये। शिक्षक ने जब बोला तुम लोगों में बात कौन कर रहा था।

सारे लड़के नरेंद्र(Swami Vivekananda ) की तरफ इशारा करने लगे। लेकिन नरेंद्र ने जब हूबहू पाठ सूना दिया तब शिक्षक आश्चर्य चकित रह गये। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था लेकिन नरेंद्र की प्रतिभा को मानना पड़ा। नरेंद्र को बचपन से ही संगीत के साथ-साथ योग में विशेष रुचि थी।

मात्र 21 वर्ष की अवस्था में ही Swami Vivekananda  ने बी ए की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। तत्पश्चात वे आगे की कानून की पढ़ाई में जुट गये। कॉलेज में अध्ययन काल के दौरान ही उनका संपर्क ब्राह्म समाज से हुया। लेकिन यहॉं भी उनकी धार्मिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा शांत नहीं हुई।

उनके पिता एक जाने-माने वकील थे, घर में किसी सुख-सुविधा की कमी नहीं थी। लेकिन वर्ष 1884 में उनके पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु के पश्चात घर की दशा अत्यंत ही खराव हो गयी।  

वचपन से ही ईश्वर के बारे में जानने की जिज्ञासा – swami Vivekanand

बचपन से ही उन्हें आधात्म और ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता थी। लेकिन हर बात को विना तर्क की कसौटी पर कसे और उनकी सच्चाई जाने बिना बिश्वास नहीं करते। वे ईश्वर की सत्ता को विना प्रमाण मानने को तैयार नहीं थे।

कहते हैं की जब भी वे किसी संत या महात्मा से मिलते उनका एक ही प्रश्न होता, क्या अपने भगवान को देखा है। संत महात्मा ढेर सारे तर्क के माध्यम से उन्हें समझाने की कोशिस करते। लेकिन वे तर्क Swami Vivekananda की जिज्ञासा का शमन करने में सक्षम साबित नहीं होते।

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात

इसी बीच Swami Vivekananda  का अपने मन में उठी कई सबालों का जबाब पाने की लालसा से रामकृष्ण परमहंस के पास गये। Swami Vivekananda  ने Sri ramakrishna परमहंस से भी वही सवाल किए, जिसका जवाव आज तक उन्हें नहीं मिल पाया था।

उन्होंने रामकृष्ण से सीधा सबाल किया, आप तो महान संत हैं, क्या आपने भगवान को कभी देखा है। क्या आपको माँ काली का दर्शन प्राप्त हुया। Sri ramakrishna परमहंस सहज भाव से नरेंद्र(Swami Vivekananda ) की तरफ देखा और उत्तर दिया हाँ।

Sri ramakrishna परमहंस ने कहा, में उन्हें ठीक वैसे ही देख पा रहा हूँ जैसे में तुम्हें देख पा रहा हूँ। तुम चाहो तो तुम्हें भी दर्शन करा सकता हूँ। बशर्ते  तुम्हें मेरे बताये हुये मार्ग पर चलना होगा। क्या तुम देखना चाहते हो। पहली वार किसी ने नरेंद्र को प्रश्न हीन कर दिया था।

उन्हें लगा की ये शव्द स्वामी परमहंस के अनुभूति की गहराई से निकला। उन्हें रामकृष्ण की उपस्थिति में अद्भुत आनंद की अनुभूति हुई। कहते हैं की बाद में रामकृष्ण परमहंस जी ने Swami Vivekananda  को माँ काली से सकक्षात्कार कराया था।

Swami Vivekananda -  स्वामी विवेकानंद
स्वामी रामकृष्ण परमहंस
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स्वामी विवेकानंद का रामकृष्ण की तरफ झुकाव

रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद के विलक्षण प्रतिभा को जानने के बाबजुद उन्हें तुरंत अपना शिष्य नहीं बनाया। शायद वे किसी खास घड़ी के इंतजार में थे। इधर नरेंद्र (Swami Vivekananda ) की रामकृष्ण परमहंस से दुबारा मिलने की जिज्ञासा और प्रबल होने लगी।

इच्छा न होते हुए भी वे रामकृष्ण परमहंस की ओर खिचे चले जा रहे थे। कुछ दिनों के बाद नरेंद्र फिर से दक्षिणेश्वर स्थित ramakrishna math  पहुचे। किंतु इस बार रामकृष्ण परमहंस जी ने देखते ही बोले,  नरेंद्र तुम आ गये। जैसे की अपने परम शिष्य नरेंद्र का उन्हें भी वेसब्री वर्षों से इंतजार हो।

परमहंस ने विवेकानंद को पास बुलाया और उनके माथे को स्पर्श किया। Swami Vivekananda के शरीर में जैसे विजली का झटका लगा हो। उनका सारा शरीर झंकृत हो उठा और उन्हें अलौकिकता की अनुभूति हुई।मानो जैसे सारा कुछ तिरोहित होकर मंजिल मिल गया हो।

रामकृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करना SWAMI VIVEKANANDA IN HINDI

Swami Vivekananda को आभास हो गया की Sri ramakrishna परमहंस अद्वितीय आध्यात्मिक शक्तियों के पुंज हैं। वे Sri ramakrishna परमहंस के चरणों में गिर पड़े।  उन्हें आत्म-बोध की अनुभूति हो चुकी थी। स्वामी विवेकानंद उसी  क्षण Sri ramakrishna परमहंस को अपना गुरु मान लिया और अपने को गुरु चरणों में अर्पण कर दिए।

वे रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा प्राप्त कर उनके परम शिष्य बन गये। उन्होंने आगे की कानून की पढ़ाई छोड़ दी और मात्र 25 वर्ष की अवस्था में सन्यास ग्रहण कर लिया। इस प्रकार वे ईश्वर से साक्षात्कार हेतु आजीवन ब्रह्मचारी और त्याग का वर्त घारण कर लिया।

इनका नाम स्वामी विवेकानंद कैसे पड़ा?

Swami Vivekananda - स्वामी विवेकानंद
मात्र 25 वर्ष की अवस्था में सन्यास ग्रहण
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अमेरिका के शिकागो रवाना होने के पहले वे अपने शिष्य खेतरी के राजा के अनुरोध पर खेतरी गये। खेतरी के महाराज ने दरवार में स्वामी जी से विवेकानंद नाम धारण करने को कहा। जिसे स्वामी जी ने स्वीकार किया। तत्पश्चात वे Swami Vivekananda  के नाम से विश्व प्रसिद्ध हो गये।

रामकृष्ण परमहंस का ब्रह्मलीन होना

Sri Ramakrishna जी विवेकानंद को कहते थे की नरेंद्र तुम्हारा जन्म सांसारिक कर्मों के लिए नहीं बल्कि किसी खास प्रयोजन के लिए हुया है। तुम एक दिन विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाओगे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को मानव मात्र में परमात्मा के दर्शन की प्रेरणा दी।

बर्ष 1984 के बाद स्वामी रामकृष्ण का स्वास्थ खराव बेहद खराव रहने लगा। उन्हें गले का केन्सर था। एकबार Swami Vivekananda ने रामकृष्ण परमहंस जी से कहा आप माँ काली के परंभक्त होते हुए केन्सर से पीड़ित हैं। आप माँ काली से अपने विमारी को दूर करने की कामना क्यों नहीं करते।

रामकृष्ण परमहंस ने सहज उत्तर दिया, माँ से इस नश्वर शरीर के लिए क्या मांगना, इस शरीर को एक न एक दिन तो नष्ट होना ही है। अगर मांगना ही होगा तो कुछ वैसा मांगा जाय जिसे पाने के वाद कुछ भी शेष नहीं रहे। साल 1986 में सवामी रामकृष्ण परमहंस ब्रह्मलीन हो गये।

स्वामी जी का भारत भ्रमण – Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद गेरुआ वस्त्र धारण कर  वाराणसी, वृंदावन, लखनऊ, हाथरस की यात्रा करते हुए हिमालय में चले गये। हिमालय के घने जंगल, झरने, अनुपम दृश्य, हिमाच्छादित पर्वत शिखर और वहाँ व्याप्त असीम शांति और अनुपम वातावरण ने उनके अंदर अद्भुत उत्साह का संचार किया।

कई वर्ष तक हिमालय में ही तपस्या में लीन रहे और दिव्य ज्ञान का अर्जन किया। उसके वाद वे (Swami vivekanad ) कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पैदल ही समपूर्ण देश का भ्रमण किया। भारत उस समय गुलाम था। वे भारतीयों के दिन-हीन दशा के प्रति काफी चिंतित थे।

वे अतीत भारत के गौरवपूर्ण इतिहास से वर्तमान भारत की दशा देखकर अति खिन्न होते। तत्पश्चात उन्होंने भारतीयों का दशा सुधारने का संकल्प भी लिया।

विश्व सर्वधर्म सम्मेलन के लिए रवाना

स्वामी विवेकनन्द को जब भी याद किया जाता है तब उनके द्वारा अमेरिका में दिया गया भाषण की चर्चा जरूर होती है। United states के शिकागो में सन 1893 (Chicago in 1983 ) में विश्व सर्व धर्म-सम्मेलन को आयोजन किया गया।

Swami Vivekananda  सनातन धर्म, सत्य व सार्वभौम सिद्धान्तों का बोध विश्व को करना चाहते थे। इसी कारण वे सर्व धर्म-सम्मेलन में भाग लेने के लिए 31 मई 1893 को बम्बई से जहाज में  शिकागो(United states ) के लिए रवाना हुये।

विवेकानंद ने शिकागो में ठंढ से बचने के लिए मालगाड़ी में बिताई रात

विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए Swami Vivekananda  को ढेर सारे कष्टों का सामना करना पड़ा। कहते हैं की Swami Vivekananda  1983 speech के पांच हफ्ते पहले ही 25 जुलाई 1893 को जहाज से Chicago  पहुंच गये थे। नॉर्थ वेस्ट अमेरिका में उस बक्त कड़ाके की ठंड थी।

हालांकि उनके शिष्यों ने मुंबई से रवाना के बक्त कुछ गर्म कपड़े दिए थे। लेकिन शिकागो की सर्दी के लिए वे कपड़े पर्याप्त नहीं थे। ऊपर से शिकागो अमेरिका का बहुत महंगा शहर ठहरा। उनके पास खर्चे के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

इस प्रकार शिकागों में खुद को कड़ाके की ठंड से बचाने के लिए उन्हें यार्ड में खड़ी मालगाड़ी में सोकर कई रातें गुजारनी पड़ी थी.

पश्चिमी देश का भारत के प्रति नजरिया SWAMI VIVEKANANDA IN HINDI

पश्चिमी देश के लोगों का उस समय भारत के प्रति नजरिया अच्छा नहीं था। भारत को दिन-हीन और पराधीन होने के कारण अत्यंत ही हीन भाव से देखा जाता था। वहाँ सूची में भारत के लिए जगह ही नहीं थी। कहते हैं की एक अमेरिकन प्रोफेसर ने Swami Vivekananda  की सहायता की।

फलसरूप उन्हें कुछ क्षण बोलने को मौका दिया गया। लेकिन उनके सारगर्भित बातों को सुनकर सभी उपस्थित विद्वान दंग रह गए। उन चंद मिनटों में ही उन्होंने सनातन धर्म की महत्ता को जिस प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उससे वहाँ बैठे 7000 से अधिक विद्वान मंत्र मुग्ध हो गये।

Swami Vivekananda जैसे ही अपने भाषण की शुरूयात ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ से शुरू की, पूरा हॉल तालियों की ध्वनि से गूंज उठा। उनके संबोधन के प्रथम वाक्य मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ ने सबका दिल जीत लिया था।

कई मिनटों तक तालियाँ वजती रही। इस विश्व धर्म-सम्मेलन में वे भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए वेदान्त दर्शन से दुनियाँ को अवगत कराया।

स्वामी जी के शिकागो भाषण के कुछ अंश-Swami Vivekananda in hindi

“अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।”

इस सारगर्भित भाषण के कारण कुछ मिनट वाद उन्हें दुवार भाषण देने का अवसर मिला। उस विस्तृत भाषण में उन्होंने गीता एवं उपनिषदों में कथित निष्काम भाव कर्म की सुरुचिपूर्ण व्याख्या की। तत्पश्चात United states अमेरिका में उनका भव्य स्वागत हुआ।

तीन साल तक Swami Vivekananda United states ऑफ अमेरिका में रहे

भौतिकवाद से ऊब चुके पश्चिमी देशों के लोगों को स्वामी विवेकानंद के भाषण से शांति का नया मार्ग दिखाई दिया। उनकी ओजस्वी वाणी को सुनने के लिए जगह-जगह से निमंत्रण आने लगे। तीन वर्ष तक वे अमेरिका में रहकर वहाँ के लोगों को भारतीय vedanta society न से अवगत कराया।

उनकी बोलेने की (वक्तृत्व) शैली तथा प्रखर ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया था। इस प्रकार पश्चिमी देशों में उनके ढेरों सारे शिष्य हो गये। इंगलेंड में सिस्टर निवेदिता उनकी प्रमुख शिष्या थी।

राम कृष्ण मिशन की स्थापना – works of swami vivekananda

भारत लौटकर Swami Vivekananda  ने लोगों में नई चेतना जगाई। उन्होंने जन-जन में प्रेम, त्याग एवं सेवा भावों को जागृत किया। भारतीयता के नाम पर उन्हें गौरव की अनुभूति होती थी।

लोगों को संगठित कर रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं एवं उपदेशों को जन-जन तक पहुचाना उनका मुख्य उद्देश्य था। उन्होंने अपने गुरु के नाम पर Ramkrishna mission की स्थापना की।  इस मिशन के द्वारा वे रामकृष्ण परमहंस के संदेश को धर-धर तक पहुचाने का काम किया।

स्वामी विवेकानंद द्वारा महासमाधि – swami vivekananda death

Swami Vivekananda - स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद ध्यान की मुद्रा में
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Swami Vivekananda ध्यानावस्था में ही 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 साल की अवस्था में ब्रह्मलीन हो गये। belur math से कुछ दूरी पर गंगा तट पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। जहॉं पर तट के दूसरी तरफ सोलह वर्ष पूर्व उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी का अंत्येष्टि हुआ था।

राष्ट्रीय युवा दिवस – As a birthday of swami vivekananda

स्वामी विवेकानंद भारतवर्ष के देशभक्त, युवा सन्यासी तथा युवाओं के प्रेरणास्रोत थे। उनके जन्म दिवस को हर वर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। Swami Vivekananda  निष्काम कर्म, social services, अद्वैतवाद एवं हिन्दू-धर्म की उदारता में पूर्ण विश्वास रखते थे।

उनके अनुसार पीड़ित विश्व को भारतीय सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा ही सच्चे सुख और शांति का मार्ग दिखा सकती है। सुभाषचंद्र बोस ने कहा था “नई पीढ़ी के लोगों में विवेकानंद ने भारत के प्रति देशप्रेम के भावना जागृत की।

लोगों न यह भी पूछा – people also ask

  • स्वामी विवेकानंद क्यों प्रसिद्ध है? – रामकृष्ण मठ, रामकृष्ण मिशन की स्थापना और वेदान्त दर्शन से विश्व को अवगत कराने के कारण।
  • स्वामी विवेकानंद का जन्म कहाँ और कब हुआ था? – कलकत्ता में 12 जनवरी 1863 को।
  • स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कब हुई? – 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में।
  • स्वामी विवेकानंद के पिता का क्या नाम था? – विश्वनाथ दत्त

उपसंहार – conclusion

वास्तव में स्वामी विवेकानंद जी का जीवन अदम्य साहस और उत्साह का अद्भुत मिसाल है। हमें अपने कर्म के प्रति उत्साही, कर्मवीर या दृढ़वर्ती होना चाहिए। Swami Vivekananda  को शिक्षाओं से हम बड़ी-से बड़ी विपत्ति को भी हँसकर अंत करने की प्रेरणा पाते हैं।

जीवन में हार मानकर कभी भी रुकना नहीं चाहिए। सफल होने के लिए Swami Vivekananda  के कथन-“उठो, जागो, और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये”। उनके उपदेशों का संकलन ज्ञान योग, Raj yoga नामक रचना में की गयी है।

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