गौतम बुद्ध का जीवन परिचय – ABOUT GAUTAM BUDDHA IN HINDI

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय (About Gautam Buddha in Hindi )- भगवान बुद्ध  बौद्ध धर्म के आदि प्रवर्तक कहलाते हैं। गौतम बुद्ध को सिद्धार्थ, भगवान बुद्ध, महात्मा बुद्ध और शाक्यमुनि जैसे कई नामों से जाना जाता है।

हम गौतम बुद्ध का जीवन परिचय के अंतर्गत जान सकेंगे की गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम क्या था। साथ ही इस लेख में गौतम बुद्ध का जीवन परिचय और उनके प्रमुख उपदेश का विवेचन है।

साथ ही गौतम बुद्ध की पत्नी, पुत्र, गुरु और उनके माता पिता का नाम क्या था। उन्हें ज्ञान की प्राप्ति कहाँ और कैसे हुई।क्यों वे राजकुमार होते हुए सारी सुख-सुविधाओं को ठोकर मारकर विश्व कल्याण के लिए गृह त्याग कर दिया।

यधपी उनके पिता राजा शुद्धोधन ने अपने पुत्र का ध्यान सांसारिक ओर मोड़ने की बहुत कोशिस की और उनकी शादी कर दी। लेकिन वे मोह माया के पाश में कहाँ बंधने वाले थे। सत्य और ज्ञान खोज में वे गृह त्याग कर दिए।

वर्षों की कठोरतम तपस्या के फलसरूप बिहार के बोध गया के निकट एक बट वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। आइये गौतम बुद्ध का जीवन परिचय शीर्षक वाले इस लेख में कपिलवस्तु के राजकुमार की सिद्धार्थ से गौतम बुध बनने की कहानी विस्तार से –

गौतम बुद्ध जीवनी एक झलक – About About Gautam Buddha In Hindi

  • गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम क्या था – सिद्धार्थ
  • गौतम बुद्ध की पत्नी का नाम – यशोधरा
  • गौतम बुद्ध के पुत्र का नाम – राहुल
  • गौतम बुद्ध के गुरु का नाम – प्रथम गुरु आलार कलाम
  • गौतम बुद्ध की माता का नाम – महामाया
  • गौतम बुद्ध के पिता का नाम – शुद्धोधन
  • गौतम बुद्ध के गुरु का नाम – आचार्य सब्बमित्त
  • ज्ञान की प्राप्ति – बोधगया बिहार
  • पहला उपदेश – सारनाथ
  • गौतम बुद्ध की मृत्यु – कुशीनगर (Kushinagar )

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय-

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Bhagwan Buddha – गौतम बुद्ध जीवन परिचय
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गौतम बुद्ध का जन्म – Gautam Buddha in Hindi

भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व शाक्य कुल में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वन में हुआ था। लुम्बिनी नेपाल के तराई में कपिलवस्तु और देवदह के बीच स्थित था। भगवान बुद्ध के अन्य नाम गौतम और बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

कहते हैं की महारानी महामाया जब अपने पिता के घर देवदह जा रही थी तभी रास्ते में उन्हें प्रसव पीड़ा हुई। इस प्रकार  महारानी महामाया ने रास्ते में ही लुम्बिनी वन में एक शिशु को जन्म दिया। जो आगे चलकर भगवान बुद्ध कहलाये।

गौतम बुद्ध का नामांकरण संस्कार

उनके नामांकरण संस्कार के दौरन राजा ने अनेक ब्राह्मण विद्वानों को आमंत्रित किया। उपस्थित सभी विद्वानों ने गौतम बुद्ध के भविष्य के वारें में दोहरी भविष्यवाणी की।

सभी ने एक स्वर में कहा की यह बालक बड़ा होकर एक महान राजा बनेगा या समाज का प्रसिद्ध मार्गदर्शक साबित होगा। फलतः उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ दो शब्दों सिद्ध+अर्थ के मेल से बना है।

जिसका का मतलब होता है जिसका जन्म किसी खास प्रयोजन या सिद्धी प्राप्ति के उद्देश्य से हुआ हो। गौतम गोत्र का होने के कारण वे गौतम कहलाये।

गौतम बुद्ध का लालन पालन – childhood bhagwan buddha

कहते हैं की उनके जन्म के मात्र सात दिन के बाद ही उनकी माता का निधन हो गया। इस प्रकार उनका लालन पालन उसके पिता राजा शुद्धोधन और रानी गौतमी ने किया।

रानी गौतमी सिद्धार्थ की मौसी और राजा शुद्धोधन की दूसरी पत्नी थी। रानी गौतमी और राजा शुद्धोधन ने उनका लालन-पालन बहुत ही प्यार से किया।

भगवान बुद्ध का आरंभिक जीवन परिचय – gautam buddha information in hindi

सिद्धार्थ बचपन से ही वे तेज व कुशाग्र बुद्धि के थे। शस्त्र विद्या, घुड़दौड़ और मलयुद्ध में उन्होंने महारत हासिल कर ली। लेकिन सिद्धार्थ अर्थात भगवान बुद्ध का मन बचपन से सांसारिक कार्यों में एकदम नहीं लगता था।

गौतम बुद्ध की कहानी से पता चलता है की वे वचपन से ही दया और करुणा की प्रतिमूर्ति थे। यह बात उनके जीवन में धटित कई घटनाओं से पता चलता है। कहते हैं की एक बार सिद्धार्थ के चचेरे भाई देवदत्त ने अपने तीर से एक हंस को घायल कर दिया था।

हंस की दशा को देखकर वे करुणा से भर गये। उन्होंने तड़पते हुए हंस को उठाकर उनकी सेवा कर उसके प्राणों की रक्षा की। किसी को दुखी अवस्था में देखकर वे आत्मविभोर हो जाते थे।

सिद्धार्थ के घोड़े का क्या नाम कंथक था। घुड़सवारी के दौरान अगर उनके घोड़े के मुँह से झाग निकलने लगता तो उन्हें दया आ जाती। वे घोड़े को थका जानकर तत्क्षण रोककर उतर जाते। क्योंकि किसी को दुखी देखना उन्हें पसंद नहीं था।

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गौतम बुद्ध घायल हंस की रक्षा करते हुए
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गौतम बुद्ध प्रेरक कहानियाँ हिंदी में – gautam buddha motivational stories in hindi

सिद्धार्थ बचपन से ही गंभीर, जिज्ञासु और उदासीन प्रकृति के थे। धन-वैभव, राजपाट और सांसारिक वैभव के प्रति उनके तनिक भी आकर्षण नहीं था।

ये घटनायें देखने में तो साधारण सी लगती है। लेकिन बालक सिद्धार्थ के वाल मानस पर इसका बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। आइये जानते हैं Bhagwan buddha के बचपन में धटित कई घटनाओं के वारें में।

पहली घटना

एक बार वे रथ पर सवार होकर जब सैर पर निकले तो रास्ते में उन्हें एक विमार व्यक्ति मिला। उनका शरीर पीला और अत्यंत ही रुग्ण हो चुका था। लोग सहारा देकर उन्हें ले जा रहे थे। सिद्धार्थ ने सारथी से पूछा तो सारथी ने जबाव दिया।

यह व्यक्ति बीमारी से ग्रसित है जिस कारण इसकी ऐसी दशा है। सिद्धार्थ ने पूछा क्या कोई भी बीमार पड़ सकता है। सारथी ने कहा हाँ, विमारी किसी को भी हो सकती है।। विमार कोई भी पड़ सकता है। यह सुनकर सिद्धार्थ सोच में डूब गये। क्या मैं भी विमार पड़ूँगा।

दूसरी घटना

एक दिन वे रथ पर सवार होकर सैर पर पर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। बूढ़ा आदमी को देखकर उन्हें बहुत ही दया आ रही थी। उसके सम्पूर्ण बाल सफेद हो गये थे।

उन्हें वहुत ही कम दिखाई दे रहा था। कमर झुक हुआ और शरीर अकड़ गया था। वहुत ही मुस्किल से वे लाठी के सहारे सड़क पर चल पा रहा था। उसने अपने सारथी से पूछा की वह कौन है।

सारथी ने जबाव दिया वह बूढ़ा आदमी है। उनकी उम्र बहुत हो गयी है इस कारण उसकी यह अवस्था है। सिद्धार्थ ने पूछा क्या मैं भी एक दिन ऐसे ही बूढ़ा हो जाऊंगा।

सारथी ने जबाव दिया हॉँ एक न एक दिन सबको बूढ़ा होना है। यह सुनकर सिद्धार्थ गंभीर हो गये। सुंदर व स्वस्थ शरीर की इस परिणाम को देखकर सिद्धार्थ चिंतन में डूब गये।

उनके में में वैराग्य की प्रवृति जागृत होने लगी। उनका मन संसार से विरक्त होने लगा।

तीसरी घटना

उनके जीवन की तीसरी घटना है जब वे एक दिन सैर पर जा रहे थे तो रास्ते में उन्होंने देखा की एक आदमी की मृत्यु हो गयी थी और कुछ लोग अर्थी को कंधा देकर ले जा रहे थे।

उनके प्रियजन और सगे-संबंधी विलाप कर रहे थे। सिद्धार्थ ने जब सारथी से इसके वारें में पूछा तो सारथी ने जबाव दिया।सुनिये राजकुमार, इस आदमी की मृत्यु हो चुकी है।

अतः लोग इसका अंतिम संस्कार करने के लिए ले जा रहे हैं। सिद्धार्थ ने सारथी से पूछा की क्या एक दिन सबको मरना है। सारथी ने कहा हाँ राजकुमार यह संसार नश्वर है और एक दिन सबकी मृत्यु निश्चित है।

इन दृश्यों को देखकर राजकुमार सिद्धार्थ बहुत विचलित हुए।

चौथी घटना

चौथी बार राजकुमार सिद्धार्थ जब सैर को निकला, तो रास्ते में उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की समस्त भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने राजकुमार को आकृष्ट किया।

मानो उन्हें जीवन की दिशा और उद्देश्य मिल गया हो। सिद्धार्थ के मन में उसी क्षण संसार से विरक्ति का भाव पैदा होने लगा।

इधर राजा अपने पुत्र सिद्धार्थ के उदासीन स्वभाव चिंतित रहा करते थे। वे चाहते थे क उनका पुत्र किसी तरह सांसारिक सुखों के प्रीति आकर्षित हो जाये।

कहते हैं की राजा शुद्धोधन ने अपने पुत्र सिद्धार्थ के लिए समस्त विलासिता की बस्तु उपलबद्ध कराया। लेकिन राजकाज एवं सांसारिक कार्यों में उन्हें तनिक भी मन नहीं लगता था।

वे घंटों तक किसी गंभीर चिंतन में खोए हुए रहते। आध्यात्मिक चिंतन से सिद्धार्थ के मन को हटाने और राजकाज की जिम्मेदारी संभालने के उद्देश्य से राजा ने उनकी शादी का फैसला किया।  

गौतम बुद्ध का विवाह

इस प्रकार सोलह वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया गया। उनके रहने के लिए सुंदर महल बनबाये गये।

उनकी सेवा में अनेकों दास-दसियों को लगाया गया। उनके मनोरंजन के लिए कई संसाधन जुटाये गये। राजा ने सोचा की विवाह के बाद सांसारिक मोह-माया में उलझकर सिद्धार्थ का ध्यान राजकाज की तरफ अग्रसर होगा।

लेकिन विवाह के थोड़े दिन के बाद ही उनका मन सांसारिक कार्यों से फिर से आनसक्त होने लगा। भौतिक विलासिता की ये बस्तु उन्हें ज्यादा देर तक सांसारिक मोह-माया में बाँधकर नहीं रख सकीं।

शादी के कुछ वर्षों के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम राहुल रखा गया। राहुल का मतलब होता है एक और बंधन। लेकिन Bhagwan buddha सांसारिक मोह-माया के इस बंधन में जकड़ने वाले कहाँ थे।

कहते हैं की उन्होंने अपने पुत्र राहुल के जन्म के कुछ घंटे के अंदर ही घर त्याग का फैसला ले लिया। एक दिन वह समय आ ही गया जब उनके पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा गहरी नींद में सोयी हुई थी।

तभी रात्री में ही अपने पुत्र और पत्नी को तत्क्षण छोड़कर जंगल की तरफ निकल पड़े। इस प्रकार उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं, घर-परिवार का त्याग कर ज्ञान की खोज में भटकने लगे।

कविवर गुप्त जी ने गौतम बुद्ध के गृह त्याग को बड़े ही मार्मिक ढंग से अपने कविता के द्वारा वर्णन किया है।

“क्यों भाग रहा हूँ भार देख, मैं छोड़ चला निस्तार देख, तू मेरी ओर निहार देख, अटकेगा मेरा कौन काम, ओ क्षणभंगुर भव राम-राम। “

गौतम बुद्ध का गृह त्याग ( महाभिनिष्क्रमण )

अपने पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा को प्रसव पीड़ा में ही छोड़कर गौतम,  Bhagwan buddha बनने साधना की मार्ग पर चल पड़े थे। उनका आध्यात्मिक जीवन शुरू हो चुका था।

कपिलबस्तु से निकलकर गौतम बुद्ध राजगृह पहुँचे। इस प्रकार वे भिक्षाटन और भ्रमण करते हुए आलार कालाम से मिले। आलार कालाम उनके प्रथम गुरु माने जाते हैं।

उसके बाद वे उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे। इन दोनो से उन्होंने योग-साधना, ध्यान, धारणा और समाधि लगाने के वारें में जाना। लेकिन इनकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई

उन्होंने ज्ञान की खोज में वन पर्बत छान डाले लेकिन उन्हें उस चीज की प्राप्ति नहीं हुई जिनकी उन्हें तलाश थी। तत्पश्चात सिद्धार्थ उरुवेला पहुंचकर कठोर साधना करने लगे।

सिद्धार्थ ने पहले अल्पाहार लेकर साधना की और बाद में वे किसी भी प्रकार के आहार से परहेज करने लगे। राजकुमार सिद्धार्थ का सुंदर क्रांतिमान शरीर सूखकर क्षीणकाय हो गया।

कई वर्षों तक कठोर साधना के फलसरूप भी गौतम बुद्ध को सफलता नहीं मिली। तब जाकर उन्होंने कठोर साधना छोड़ मध्यम मार्ग को अपनाया।

कहते हैं की एक दिन गौतम बुद्ध अपने साधना में रत थे। तभी दूर से गुजरती हुई कुछ स्त्रियाँ की गुनगुनाने की आवाज उनके कान में पड़ी। उनके गीत का अर्थ से गौतम बुध बहुत ही प्रभावित हुया। गीत का भावार्थ था।

वीणा की तार को इतना ढीला मत छोड़ दो की उससे कोई स्वर ही नहीं निकले। और इतना भी मत कसो की वीणा की तार टूट ही जाएँ।’ सिद्धार्थ को समझ में आ चुका था।

तत्पश्चात सिद्धार्थ ने किसी भी चीज की अति से किनारा कर लिया। तब से उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग को चुना।

गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति

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गौतम बुद्ध के उपदेश GAUTAM BUDDHA UPDESH IN HINDI
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एक बार की बात है Bhagwan buddha नदी में स्नान करने के लिए गये लेकिन कमजोरी के कारण नदी से निकल नहीं प रहे थे। बहुत ही मुस्किल से उन्होंने एक पेड़ की झुकी हुई डाली को पकड़ कर बाहर निकल सके।

भूख से उनकी जान निकली जा रही थी। उसी क्रम में सुजाता नाम की लड़की वन देवता को भोग लगाने वन में आई हुई थी। सुजाता ने गौतम बुद्ध को ही वन देवता मान कर खीर खिलाई।

इससे उन्हे नई ऊर्जा और वल मिला। कहते हैं की उसी रात को उनकी आत्मा में प्रकाश फुट पड़ा। इस प्रकार वैशाखी पूर्णिमा के दिन ३५ वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ को गया में पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई।

तभी से वे सिद्धार्थ से गौतम ‘बुद्ध’ कहलाए। बुद्ध का मतलब होता है – सचेत, ज्ञानी, जागा हुआ। जिस पीपल वृक्ष के उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई वह बोधिवृक्ष के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कुछ सप्ताह तक इसी बोधिवृक्ष के नीचे रहकर वे चिंतन और साधना में लिप्त रहे। तत्पश्चात भगवान बुद्ध बौद्ध धर्म का उपदेश देने निकल पड़े।

भगवान बुद्ध का पहला उपदेश

भगवान बुद्ध अपना पहला उपदेश कासी के निकट मृगदाव में दिया जिसे वर्तमान में सारनाथ के नाम से जाना जाता है। भगवान गौतम बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग अपनाने का उपदेश दिया। उन्होंने लोगों को बतलाया की मनुष्य दुखी हैं लेकिन उनके दुख अकारण नहीं है।

उन्होंने बताया की लोगों के दुखों का निवारण संभव है। अपने मत के प्रचार और प्रसार के लिए उन्होंने निरंतर भ्रमण करना शुरू किया। उन्होंने अपने अनुयायी के लिए चार आर्य सत्य बताए।

इन्हें भी पढ़ें – टॉप 25 गौतम बुद्ध के उपदेश हिन्दी में भगवान बुद्ध के उपदेशों का सार

बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य, जिस पर बौद्ध धर्म आधारित है इस प्रकार हैं –  

  • दुःख आर्य सत्य है
  • दुःख समुदय आर्य सत्य हैं,
  • दुःख निरोध आर्य सत्य है।
  • दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा आर्य सत्य है।

मोटे तौर पर उनके चार आर्य सत्य के अभिप्राय यह है की जीवन कठिनयियों से भरा है। इन कष्टों के कई कारण हो सकते हैं। एक कारणों का शमन कर दुख से छुटकारा पाया जा सकता है।

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भगवान बुद्ध
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गौतम बुद्ध का अष्टांग मार्ग – mahatma budh ki shiksha in hindi

भगवान बुद्ध के अनुसार संसार में दुखों का कारण तृष्णा है। अतः तृष्णा के नाश द्वारा दुखों से मुक्ति संभव है। बौद्ध धर्म में तृष्णा के क्षय के लिए अष्टांग मार्ग का उपदेश दिया गया है। इस अष्टांग मार्ग को मध्यम मार्ग भी कहा जाता है। जो इस प्रकार है-

  1. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य तथा संसार चक्र के कारणों का ज्ञान।
  2. सम्यक संकल्प : सांसारिक विषयों, राग, द्वेष के परित्याग का संकल्प
  3. सम्यक वचन  : मिथ्या और उनुचित बातों का त्याग
  4. सम्यक कर्म : हिंसा व गलत कर्मों से परहेज
  5. सम्यक आजीव  : गलत व्यापार व रोजगार से परहेज
  6. सम्यक व्यायाम : अर्थात बुरे कर्मों को त्याग कर शुभ कर्म के लिए संकल्प
  7. सम्यक स्मृति : चित शुद्धि का संकल्प
  8. सम्यक समाधि : चित के एकाग्रता एवं निर्वाण की प्राप्ति

धर्म-चक्र-प्रवर्तन

उन्होंने अपना उपदेश संस्कृत के बजाय उस समय की सवसे सरल जनभाषा पाली में दिया। सर्वप्रथम उन्होंने पाँच लोगों को अपना उपदेश देकर शिष्य बनाया। तत्पश्चात वे उनको बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेज दिया।

उनके प्रिय शिष्य का नाम आनंद था। गौतम बुद्ध अपना उपदेश आनंद के सम्बोधन से करते थे। भगवान बुद्ध के उपदेशों को जिस ग्रंथ में संकलित किया गया उने धममपद के नाम से जाना जाता है।

बौद्ध धर्म एवं संघ

भगवान बुद्ध के सिद्धान्तों पर आधारित धर्म ही बौद्ध धर्म कहलाया। बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार से बौद्ध भिक्षुओं की संख्या लगातार बढ़ने लगी। सामान्य जन से लेकर राजा-महाराजा उनके अनुयायी हो गये।

बौद्ध भिक्षुओं ने मिलकर बौद्ध संघ की स्थापना की। यह धर्म ने केवल भारत तक ही सीमित रहा, वरन मौर्यकाल तक बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, और श्रीलंका आदि देशों तक पहुँच चुका था।

भगवान बुद्ध ने अपने जीवन काल में ही बौद्ध धर्म की परिणति देखी।

गौतम बुद्ध की मृत्यु

इस प्रकार वे जीवन भर धूम-घूम कर पालि भाषा में अपना उपदेश देते रहे। बौद्ध धर्म ग्रंथ के अनुसार गौतम बुद्ध ने 483 ईसा पूर्व ८० वर्ष की अवस्था में महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया।

बुद्ध पूर्णिमा इन हिंदी

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भगवान बुद्ध का जन्म स्थान लुम्बिनी वन नेपाल
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बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध धर्म के लोगों का अति महत्वपूर्ण उत्सव है। कहते की बैसाख के पूर्णिमा के दिन ही भगवान गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। साथ ही गौतम बुद्ध ने वैसाख के पूर्णिमा को ही महानिर्वाण प्राप्त किया।

बुद्ध पूर्णिमा के दिन इन्हें बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई। गौतम बुद्ध द्वारा गृह त्याग तथा कठोर तपस्या के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण के नाम से जाना जाता है।

बुद्ध किसकी पूजा करते थे?

उन्होंने ने किसी ईश्वर का नाम लिया और न ही वे किसी देवता की भक्ति करने का शिक्षा दी। उन्होंने न ही कोई प्रार्थना की प्रथा चलाई। लेकिन वे परलोक और देवयोनि में विश्वास करते थे।

उन्होंने भक्ति मार्ग को छोड़कर कर्म की वकालत की। आपको गौतम बुद्ध का जीवन परिचय (About Gautam Buddha in Hindi )शीर्षक वाला यह लेख जरूर अच्छा लगा होगा, अपने कमेंट्स से अवगत करायें।

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