केदारनाथ मंदिर का इतिहास, केदारनाथ मंदिर किसने बनवाया, जाने इसका रहस्य व कहानी

By Amit
केदारनाथ मंदिर का इतिहास
केदारनाथ मंदिर का इतिहास

केदारनाथ मंदिर का इतिहास (History of Kedarnath temple in Hindi) बहुत ही पौराणिक माना जाता है। केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham)उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। भगवान शिव के वृषभनाथ रूप को समर्पित यह मंदिर, बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

इस मंदिर में स्थित शिवलिंग को अति प्राचीन माना जाता है। यहाँ स्थित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है जो बैल की पीठ के आकार का है। केदारनाथ में स्थित शिवलिंग को भगवान शिव के वृषभनाथ रूप का प्रतीक माना गया है।

माना जाता है कि नर और नारायण ऋषि जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं यहाँ तपस्या की थी। तब शिव जी उनके तप से खुश होकर यहीं ज्योतिर्लिंग में वास करने का वचन दिया। केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के चार धामों में पहला है।

हिमालय पर्वत की गोद में स्थित यह मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में अवस्थित है। इस मंदिर को उत्तराखंड का सबसे ऊंचा शिव मंदिर भी कहा जाता है। यहाँ मंदिर समुद्र तल से करीब 3584 मीटर ऊंची हैं, जहां सर्दियों के मौसम में बर्फ जमी रहती है।

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यह मंदिर साल में 6 महीने की दर्शन के लिए खुलता है। ठंड गिरने से पहले इस मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सर्दी के मौसम में इनके चल विग्रह उत्सव डोली, ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर ले आया जाता है। जहां बाबा छह महीने के लिए विराजमान रहते हैं।

इस लेख में केदारनाथ मंदिर का इतिहास, केदारनाथ मंदिर किसने बनवाया, क्या है केदारनाथ मंदिर की कहानी सहित केदारनाथ मंदिर का रहस्य के बारें में विस्तार से जान सकेंगे।

केदारनाथ मंदिर का इतिहास – History of Kedarnath temple in Hindi

केदारनाथ धाम मंदिर का इतिहास अति प्राचीन और रोमांचक है। हिमालय की गोद में अवस्थित इस मंदिर को भगवान शिव की तपस्या, शिव-पार्वती के विवाह, शिव-शक्ति के विलय, पांडवों के पश्चाताप, नंदी के वरदान सहित शिव-विष्णु के संवाद से भी जोड़ कर देखा जाता है।

केदारनाथ मंदिर किसने बनवाया था?

केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने किया, इस बारे में कई बातों का उल्लेख मिलता है। कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण पांडव कुल के राजा जनमेजय द्वारा किया गया था।

जिसे आगे चलकर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। जबकी कुछ लोगों का कहना है कि इसे उत्तराखंड के इस क्षेत्र पर शासन करने वाले कात्युरी वंश के राजाओं ने 7वीं सदी के बाद बनवाया था। इस लिहाज से भी देखा जाय तो केदारनाथ मंदिर कम से कम 1200 साल पुराना है।

जानिए केदारनाथ मंदिर किस शैली में बना है

बाबा केदारनाथ धाम का मंदिर कत्यूहारी शैली में निर्मित माना जाता है। केदारनाथ धाम में भगवान शिव के अलावा भक्तजन भगवान गणेश, माता पार्वती, भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी सहित कुंति, द्रौपदी, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की भी पूजा अर्चना की जाती है।

मंदिर की बनावट और संरचना

इस मंदिर को बनाने में बड़े-बड़े भूरे रंगों के पत्थरों का उपयोग किया गया है। केदारनाथ मंदिर की छत की बात करें तो यह लकड़ी से निर्मित है, जिसके शिखर पर सोने का कलश रखा हुआ है।

मंदिर के मुख्य द्वार पर शिव की सबसे प्रिय नंदी की विशाल मूर्ति विराजमान है, मानो वह पहरेदारी कर रहे हो। केदारनाथ मंदिर को 3 भागों में विभक्त किया गया है।

  1. पहला- गर्भगृह (जहां ज्योतिर्लिंगों अवस्थित है)
  2. दूसरा- दर्शन मंडप (जहां पर भक्तजन खड़े होकर पूजा करते हैं)
  3. तीसरा- सभा मण्डप (जहां सभी तीर्थयात्री एकट्ठा होते हैं)

केदारनाथ मंदिर की कहानी

इस मंदिर के बारे में कई धार्मिक कहानियाँ और मान्यताएँ भी प्रचलित हैं। इस मंदिर का उल्लेख महाभारत और स्कन्द पुराण के केदार खंड में मिलता है। सभी जानते हैं कि महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला था।

जिसमें भाई-भाई, गुरु-शिष्य, बड़े और छोटे आदि सभी रिश्ते का तार-तार हो गया था। कुरु क्षेत्र के मैदान हर जगह कौरवों और पांडव सेना के खून से लाल था। युद्ध की समाप्ति के बाद पांडव अपने को दोषी मानकर ब्रह्म हत्या, गुरु हत्या, अपने से बड़ों की हत्या आदि पापों से मुक्त होना चाहते थे।

इन पापों से मुक्ति पाने के लिए वे भगवान शिव की शरण में जाना चाहते थे। इसलिए पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए काशी जाते हैं। लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे, इसलिए पांडवों के काशी पहुंचने से पहले वे हिमालय की केदार गुफाओं की ओर चले गए।

पीछे-पीछे पांडव भी भगवान शिव के दर्शन के लिए उनकी खोज में हिमालय की ओर चले गए। अपने पीछे पांडवों को आते देख भगवान शिव गायब हो गए और केदार में जाकर बस गए।

पांडवों ने भी उनका पीछा केदार पर्वत तक किया। जब भगवान शिव ने पांडवों को अपनी ओर आते देख एक भैंस का रूप धारण कर लिया और जानवरों के बीच चले गए। पांडवों ने भगवान शिव के दर्शन पाने की योजना बनाई।

भीम ने एक विशाल रूप धारण किया और अपने दोनों पैरों को केदार पर्वत के दोनों ओर फैला दिया। भीम से सभी जानवर डर कर उनके पैरों के बीच से गुजरते हुए भागने लगे। लेकिन भैंस के रूप धारण किया भगवान शिव पर भीम के भय का कुछ भी असर नहीं हुआ।

तभी भीम को समझ में आ गया की यह एक साधारण भैंस नहीं हो सकता। क्योंकि इस पर मेरे भय को कुछ भी असर नहीं हुआ। तभी भीम ने उस भैंस को पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह धरती में सामने लगी।

तब भीम ने तेजी से भैंस के पिछले हिस्से को कसकर पकड़ लिया। अंत में काफी प्रयास के बाद भगवान शिव पांडवों की भक्ति से प्रसन्न हुए। तब जाकर उन्होंने पांडवों को दर्शन दिए और उन्हें उनके पापों से मुक्त किया।

कहा जाता है कि तब से यहां भगवान शिव की पूजा भैंस की पीठ के रूप में की जाती है। मान्यता है कि इस भैंस के सिर नेपाल में निकला था, जहां भगवान शिव की पूजा पशुपतिनाथ के रूप में की जाती है।

केदारनाथ मंदिर का रहस्य (Kedarnath Mandir ka Rahasya)

वैज्ञानिक के अनुसार यह मंदिर लगभग 400 वर्षों तक 13 वीं शताब्दी से 17 वीं शताब्दी के बीच बर्फ से ढका रहा। इतने लंबे समय के बाद बाद भी इस मंदिर में कुछ भी क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। 400 वर्षों के बाद जब मंदिर से बर्फ हटी तब यह भक्तों के सामने प्रकट हुई।

इसके बाद इस मंदिर में पूजा अर्चना शुरू हुई। लेकिन वैज्ञानिक हैरान हैं कि इतने सालों तक बर्फ में दबे रहने के बाद भी यह मंदिर कैसे सुरक्षित रहा। कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण करने वाले कारीगर के पास एक विशेष कला थी जिसके कारण यह मंदिर आज तक मजबूती से अचल खड़ा है।

कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण एक विशेष प्रकार की मोटी चट्टानों से किया गया है। इसकी दीवारें और छत भी एक ही प्रकार के शिलाखंड से बने हैं।

शायद यही वजह हो सकता है की मंदिर 400 साल तक बर्फ में ढके रहने के बाद भी सुरक्षित रहा। यहाँ तक की 2013 की केदारनाद की भयंकर आपदा में भी यह मंदिर मजबूती से खड़ा रहा।

केदारनाथ मंदिर 2013 की घटना

केदारनाथ मंदिर 2013 में एक बहुत ही भीषण और विनाशकारी आपदा का सामना कर चुका है। लेकिन बाबा की महिमा रही की केदारनाथ में भारी तबाही के बावजूद भी इस मंदिर का एक बाल भी बांका नहीं हुआ।

जबकी यहाँ आए प्राकृतिक आपदा में कई हजार लोग मारे गए थे। यह घटना 16 जून 2013 को हुआ था। उस साल केदारनाथ धाम के पीछे चोराबारी ग्लेशियर के ऊपर बादल फटने से ग्लेशियर में बनी एक पुरानी झील में बहुत अधिक पानी भर गया।

पानी के तबाब से झील की दीवार टूट गई और पूरा पानी एक साथ हजारों लोगों की जान लेते हुए केदारनाथ मंदिर के रास्ते तबाही मचाते हुए निकल गई।

जब बह गई शंकराचार्य की समाधि

इस प्रलयकारी अचानक आई पानी की तेज धरा में मंदिर के बगल में अवस्थित शंकराचार्य की समाधि को भारी नुकसान पहुचा। लेकिन मंदिर को कुछ भी नहीं हुआ। बताते चले की जिस दिन मंदिर के कपाट बंद होने लगते हैं। उस दिन शंकराचार्य की समाधि पर विशेष पूजा की जाती है।

केदारनाथ मंदिर के दर्शन

मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष अप्रैल अथवा मई महीने में भक्त के लिए खोले जाते हैं। केदारनाथ के कपाट दिवाली के दो दिन बाद भैयादूज पर करीब 6 महीने के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान बाबा केदारनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली को ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर ले जाया जाता है।

6 माह के लिए बाबा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में ही निवास करते हैं। जब मंदिर के कपाट खुल जाते हैं तब भक्त केदारनाथ के दर्शन सुबह 6 से लेकर 2 बजे थक और शाम में 3 बजे से लेकर 9 बजे रात तक कर सकते हैं। इस दौरान मंदिर सोमवार से रविवार तक नित्य खुला रहता है।

केदारनाथ मंदिर कैसे पहुंचे

केदारनाथ मंदिर जाने का रास्ता गौरीकुंड और सोनप्रयाग से होकर जाता है। आप गौरी कुंड से 14 किलोमीटर चलकर पर्वतीय मार्ग से केदारनाथ धाम पहुंच सकते हैं। वहीं आप सोनप्रयाग से 21 किलोमीटर की दूरी तय कर बाबा का दर्शन कर सकते हैं।

यदि ट्रेन से भी केदारनाथ की यात्रा कर सकते हैं। केदारनाथ के सबसे नजदीकी हरिद्वार, ऋषिकेश, और देहरादून है। हरिद्वार से केदारनाथ मंदिर की दूरी करीब 225 किलोमीटर है। इन स्टेशनों से बसों और टैक्सियां के द्वारा केदारनाथ धाम आसानी से पहुचा जा सकता है।

केदारनाथ मंदिर किसके लिए प्रसिद्ध है

केदारनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। यह मंदिर अपने इतिहास, चमत्कार और वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है। 400 साल तक बर्फ से ढके रखने और 2013 के भूस्खलन के बाद भी इस मंदिर का ढांचा अभी भी बहुत ही मजबूत और सुरक्षित है।

आपको केदारनाथ मंदिर का इतिहास (History of Kedarnath temple in Hindi) से जुड़ी जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी, अपने कमेंट्स से अवगत कराएं।

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