परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा (Major Dhan Singh Thapa) की गौरव गाथा

By Amit
परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा - Major Dhan Singh Thapa in Hindi
परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा - Major Dhan Singh Thapa in Hindi

मेजर धन सिंह थापा ((Major Dhan Singh Thapa)) एक भारतीय सेना अधिकारी थे जिन्हें 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उनकी उत्कृष्ट बहादुरी और साहस के लिए भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

मेजर धन सिंह थापा 1962 में ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित होने वाले चार बहादुर सैनिकों में से एक थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध में जिन चार भारतीय बहादुरों को परमवीर चक्र प्रदान किया गया था,

उनमें से केवल मेजर थापा ऐसे वीर जवान थे जिन्हें यह सम्मान जीवित अवस्था में प्राप्त हुआ। मेजर थापा हमेशा अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। जब चुशुल एयरफील्ड पर कब्जे के इरादे से चीनी सेना ने उनके पोस्ट पर हमला किया।

तब मेजर धन सिंह थापा अपने मात्र 27 जवानों के साथ मिलकर चीनी सेना का अद्भुत पराक्रम के साथ सामना किया। मेजर थापा उस बक्त लद्दाख के उत्तरी सीमा पर पांगोंग झील के पास तैनात थे, जो सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान माना जाता था।

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मेजर थापा न तो चीनी फौजियों की संख्या से घबराए, न ही उनके हथियारों से। उन्होंने एक-एक को चुन-चुनकर मारा और अंत में युद्धबंदी बनाए गए। इस लड़ाई में चीनी फौजी भी मेजर थापा के युद्धकौशल के कायल हो गए थे।

उस युद्ध में मेजर थापा ने अपने असाधरण वीरता और अद्भुत साहस के बल पर ऐसी मिसाल कायम की आने वाली पीढ़ी के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत का कार्य करेगी। आइए इस ब्लॉग पोस्ट में परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा के बारें में विस्तार से जानते हैं।

परम योद्धा मेजर धन सिंह थापा संक्षिप्त परिचय – Major Dhan Singh Thapa in Hindi

पूरा नम धन सिंह थापा (अंग्रेजी – Major Dhan Singh Thapa)
जन्म:28 अप्रैल 1928, शिमला
रैंक: लेफ्टिनेंट कर्नल (भारतीय सेना)
यूनिट: 1/8 गोरखा राइफल्स
पुरस्कार: परमवीर चक्र
निधन:6 सितंबर 2005 (77 वर्ष की उम्र में)

परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा – Major Dhan Singh Thapa information in Hindi

प्रारंभिक जीवन

मेजर धन सिंह थापा जी का जन्म नेपाली परिवार में 10 जून 1928 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में हुआ था। धन सिंह थापा का जन्म एक सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता पदम सिंह थापा भी ब्रिटिश भारतीय सेना में एक सैनिक के रूप में कार्य कर चुके थे।

इस कारण से सेना में सेवा की प्रेरणा उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिली। अपने पिता का अनुसरण करते हुए धन सिंह थापा सेना में जाने का निश्चय किया अरु 1947 में भारत की आजादी के बाद वे भारतीय सेना में शामिल हो गए।

सैन्य कैरियर

अपनी ट्रेनिग पूरी करने के बाद अगस्त 1949 में मेजर थापा को 8वीं गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन में शामिल कर लिया गया। वह तेजी से रैंकों में आगे बढ़ा और अपनी बटालियन में एक सम्मानित अधिकारी बन गया।

1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व कौशल और बहादुरी की कड़ी परीक्षा हुई, जिसमें वे खड़े उतरे।

फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनाती – Major Dhan Singh Thapa story

मेजर धन सिंह थापा अपनी नियुक्ति की शुरुआत से ही अपने साथी सैनिकों के बीच अपनी बहादुरी और समर्पण के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने अपने से वरिष्ठ अफसर द्वारा सौंपे गए प्रत्येक कर्तव्य का उत्कृष्टता से प्रदर्शन किया।

उनके बहादुरी, साहस और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण के कारण उन्हें विवादित हिमालयी सीमाओं पर चीनी सेना की घुसपैठ को रोकने का कार्यभार दिया गया।

फॉरवर्ड पॉलिसी लागू करना

बर्ष 1962 में भारत ने चीन के नपाक मकसद को देखते हुए अपनी सीमा की रक्षा के लिए फॉरवर्ड पॉलिसी लागू की। इस पॉलिसी के तहत भारतीय सेना ने अपनी सीमा की सुरक्षा हेतु विवादित क्षेत्रों में कई छोटी-छोटी पोस्टें बनाई गईं।

ताकि चीन की घुसपैठ को रोका जा सके। भारत को उम्मीद थी कि इस कदम से चीनी सेना भारत में हमला नहीं करेगी। लेकिन लेकिन चीनी सेना के मन में कुछ और ही चल रहा था।

1962 के भारत-चीन युद्ध

चीनी सेना ने भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए भारत के अग्रिम पोस्ट पर जोरदार हमला कर दिया। उस बक्त मेजर धन सिंह थापा अपने सैन्य टुकड़ियों के साथ लद्दाख क्षेत्र में एक अग्रिम चौकी की कमान संभाल रहे थे।

रात के साढ़े चार बज रहे थे जब मेजर थापा के पोस्ट पर चीन के 600 सैनिकों ने तोपों और मोर्टारों जबरदस्त बमबारी शुरू कर दी।

चीनियों ने पैदल सेना भेजने से पहले सुरक्षा को कमजोर करने के लिए तोपखाने और मोर्टार फायर का इस्तेमाल किया था। दुश्मन की संख्या बहुत ज्यादा होने के बावजूद मेजर थापा और उनके जवानों ने बड़े ही विराता और साहस से उनका विरोध किया।

अनेकों चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारते हुए उन्होंने दुश्मन के पहला हमला को नाकाम करने में कामयाब रहे।

बंकर-बंकर अपने जवानों का हौसला बढ़ाया

मेजर थापा एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट की बंकर में जाकर मशीन गन से ताबड़तोड़ फायरिंग करते रहे और अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। उनके इस जबावी करबाई में कई चीनी सैनिक मारे गए। भारत द्वारा ऐसे जवावी करबाई की उम्मीद चीनियों को भी नहीं थी।

लेकिन चीन के आर्टिलरी फायर में कई भारतीय सैनिक बुरी तरह जख्मी और शहीद हो चुके थे। उधर गोलीबारी में मेजर थापा के रेडियो सेट्स खराब हो जाने से उनका अपने रेजीमेंट से भी संपर्क टूट चुका था।

धीरे-घिरे चीनी सेना उनके पोस्ट के नजदीक पहुचते जा रहे थे। चीनी फौजियों ने टैंक से भारत के सेना के पोस्ट पर बम और हथगोले दागने शुरु कर दिया। उनके पोस्ट को गोले और बारूद से उड़ा दिया गया इस प्रकार मेजर थापा के जवान शहीद हो चुके थे।

अव उनके साथ बंकर में मात्र तीन जवान बचे थे। मेजर थापा के हथियार भी खत्म हो चुके थे और दुश्मन उनपर हाबी होता जा रहा था। तब मेजर थापा अपने बाकी जवानों के साथ बंकर से बाहर निकले और अपने खुखरी निकाल कर चीनियों पर टूट पड़े।

इस प्रकार मेजर थापा ने दुश्मन से आमने-सामने की लड़ाई लड़ी और कई चीनी सेना को अपने खुकरी से मौत के घाट उतार दिया। लेकिन बिना हथियार के वे ज्यादा समय तक दुश्मन से मुकाबला नहीं कर सके।

युद्धबंदी बनाया जाना

लेकिन दुश्मन की संख्या अधिक होने के कारण दुर्भाग्यवश वे अपने पोस्ट को नहीं बचा पाए। कई घंटों तक चली लड़ाई के बाद मेजर शर्मा हालांकि आत्मसमर्पण से इनकार कर दिया। लेकिन अंत में उन्हें मेजर थापा को अपने तीन साथियों के साथ युद्धबंदी बना लिया गया।

मेजर थापा के साथ उनके तीन और जवान युद्धबंदी बनाये गए। जिसमें से राइफलमैन तुलसी राम चीनी सेना से किसी तरह से जान बचाकर भागने में कामयाब हो गए।

शहीद मान लिया जाना

कहा जाता है की भारतीय सेना को उन्हें बंदी बनाये जाने की खबर नहीं थी। कहते हैं की इस पोस्ट पर जबरदस्त चीनी हमले और वहाँ की स्थिति देखकर मान लिया गया की यहाँ तैनात भारत के गोरखा जवान शहीद हो चुके हैं।

अपने जवानों का नेतृत्व कर रहे मेजर धन सिंह थापा के घर पर उनके शहीद होने का संदेश भेज दिया गया। मेजर धन सिंह थापा के परिवार ने अपने वीर सपूत का अंतिम संस्कार कर दिया।

परमवीर वीर चक्र की घोषणा

इस लड़ाई के दौरान अदम्य वीरता और कुशल नेतृत्व के लिए मेजर धन सिंह थापा को भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। पुरस्कार के प्रशस्ति पत्र में उनकी उत्कृष्ट बहादुरी, नेतृत्व और दृढ़ संकल्प की अद्भुत प्रशंसा की गई।

उनके बारें में लिखा गया की ”

1/8 गोरखा राइफल्स के मेजर धन सिंह थापा लद्दाख में एक फॉरवर्ड पोस्ट की कमान संभाल रहे थे। 20 अक्टूबर 1962 को भारी संख्या में चीनी सैनिकों ने तोपखाने और मोर्टार द्वारा उनकी पोस्ट पर हमला कर दिया। उनके नेतृत्व में दुश्मन के हमले को विफल कर दिया गया और जिससे दुश्मन को भारी नुकसान हुआ।

दुश्मन ने दूसरी बार हमला किया और उसका भी फिर से भारत की तरफ से वैसा ही जवाव दिया गया। उसके बाद चीनियों ने टैंकों के और अपने पैदल सेना के साथ तीसरी बार हमला किया। लेकिन वे अंत तक डटे रहे। अंततः बंदी बनाये जाने से पूर्व मेजर धन सिंह थापा ने आमने-सामने की लड़ाई में कई चीनी सैनिकों को मार गिराया। मेजर थापा का साहस, विशिष्ट वीरता और नेतृत्व, सेना की उच्चतम परंपराओं के अनुरूप था, जिसके लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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जब मौत को मात देकर वतन वापस लौटे

इस लड़ाई में मेजर धन सिंह थापा को चीनी सेना द्वारा बंदी बनाने के बाद कई तरह की यातनाएं भी सहनी पड़ी होंगी। लेकिन युद्ध की समाप्ति के बाद 1963 में चीनियों द्वारा जेनेवा संधि के तहद उन्हें रिहा करना पड़ा।

इस प्रकार मेजर थापा चीन से मौत को मात देकर अपने वतन वापस लौटे। वापस आकर उन्होंने फिर से गोरखा रायफल्स की शान बनकर अपनी सेवा दी। इस प्रकार 1980 में अपनी सेवानिवृत्ति तक मेजर थापा भारतीय सेना में अनवरत सेवा करते रहे।

परम योद्धा मेजर धन सिंह थापा का निधन

परम योद्धा मेजर धन सिंह थापा का 6 सितंबर 2005 को 77 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक बहादुर सैनिक और परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता के रूप में उनकी विरासत समस्त भारत के लोगों को प्रेरित करती रहेगी।

इन्हें भी पढ़ें : परमवीर चक्र क्या है लिस्ट सहित सम्पूर्ण जानकारी

अंत में

मेजर धन सिंह थापा की कहानी अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प की कहानी है। जब 20 अक्टूबर 1962 को चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने हिमालय क्षेत्र में भारतीय सीमा चौकियों पर जोरदार हमला किया।

यह युद्ध करीब एक महीने तक चला, जिसमें दोनों तरफ से भारी जानमाल की हानि हुई। लेकिन भारत-चीन युद्ध के दौरान मेजर थापा ने अपने कार्य से भारतीय सेना के इतिहास में बहादुरी और वीरता की कहानी लिख डाली।

F.A.Qs

मेजर धन सिंह थापा को परमवीर चक्र किसने प्रदान किया था?

मेजर धन सिंह थापा को भारत सरकार ने 1962 युद्ध के बाद परमवीर चक्र प्रदान किया था।

परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा - Major Dhan Singh Thapa in Hindi
परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा – Major Dhan Singh Thapa in Hindi
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