‘मेजर सोमनाथ शर्मा’ भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता की गौरव गाथा

भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता - मेजर सोमनाथ शर्मा के बारे में

मेजर सोमनाथ शर्मा एक भारतीय सैन्य अधिकारी थे जिन्हें भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान, परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 1947-48 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ऐसी वीरता दिखाई कि दुश्मन के पसीने छूट गए थे।

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मेजर सोमनाथ शर्मा के बारे में – Major Somnath Sharma information in Hindi

पूरा नाम – सोमनाथ शर्मा (Somnath Sharma)
रैंक – मेजर
जन्म – 31 जनवरी, 1923
पिता– मेजर अमरनाथ शर्मा
सेना – थल सेना
यूनिट – कुमाऊँ रेजिमेंट (चौथी बटालियन)
शहादत– 3 नवम्बर1947
सम्मान – परमवीर चक्र (भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान)

मेजर सोमनाथ शर्मा – Major Somnath Sharma in Hindi

वे कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के खिलाफ अपने देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। दुश्मन के सामने उनके असाधारण साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

मेजर सोमनाथ शर्मा प्रतिष्ठित परमवीर चक्र के पहले प्राप्तकर्ता थे। संयोग देखिए परमवीर चक्र को मेजर शर्मा के भाई की सास सावित्री खानोलकर ने डिजाइन किया था तथा मेजर शर्मा ही उनके पहले प्राप्त कर्ता बने।

उनकी साहस और बलिदान सभी भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा के बारे में जानेंगे की कैसे उन्होंने मात्र 24 साल की उम्र माँ भारती के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी।

भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता - मेजर सोमनाथ शर्मा के बारे में
भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता – मेजर सोमनाथ शर्मा के बारे में

मेजर सोमनाथ शर्मा का जीवन परिचय – Major Somnath Sharma biography in Hindi

आरंभिक जीवन

मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को वर्तमान भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य के कांगड़ा में हुआ था। वह एक प्रसिद्ध सैन्य परिवार से आते थे, उनके पिता का नाम अमर नाथ शर्मा था।

मेजर शर्मा के पिता सेना में चिकित्सा अधिकारी के रूप में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके अलावा उनके भाई लेफ्टिनेंट जनरल सुरिंदर नाथ शर्मा तथा जनरल विश्वनाथ शर्मा भी भारतीय सेना में अपना योगदान दिये।

विश्वनाथ शर्मा उनके छोटे भाई थे जो भारतीय सेना के 14वें सेनाध्यक्ष के पद पर आसीन रहे।

शिक्षा

सेना में जाने और देश सेवा की प्रेरणा मेजर शर्मा को विरासत में मिली थी। सोमनाथ शर्मा ने अपनी स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज, नैनीताल से पूरी की। उसके बाद सोमनाथ शर्मा का 1939 में प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज, देहरादून में दाखिला हुआ।

उसके बाद 1942 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। भारतीय सैन्य अकादमी में अपने परिशिक्षण के दौरान उन्होंने अपने साहस और दृढ़ संकल्प के असाधारण गुणों का प्रदर्शन किया।

सैन्य कैरियर की जानकारी

रॉयल मिलिट्री अकादमी में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद मेजर शर्मा की नियुक्ति 1942 में 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट के 8वीं बटालियन में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में हुई। उसके बाद 1947 में उनका कुमाऊं रेजिमेंट के 4थी बटालियन में स्थानांतरन हो गया।

भारत की आजादी के बाद उन्हें श्री नगर हवाई अड्डे पर तैनात कर दिया गया। उन्हें 22 फरवरी, 1942 को ब्रिटिश भारतीय सेना की 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट की 8वीं बटालियन में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया था।

1945 में उनका प्रोमोशन सेकेंड लेफ्टिनेंट से लेफ्टिनेंट के पद पर किया गया था। उसके बाद वे मेजर के पद तक पहुचे। जब 1947 में हमारा देश भारत आजाद हुआ तब सोमनाथ शर्मा को भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन में स्थानांतरित कर दिया गया।

मेजर सोमनाथ शर्मा और बड़गाम की लड़ाई – Major Somnath Sharma story in Hindi

आजादी के बाद नवगठित भारत जैसे वृहद राष्ट्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जिनमें से एक पाकिस्तानी सेना का आदिवासी हमलावरों के भेष में कश्मीर घाटी पर आक्रमण था।

पाकिस्तानी हमलावरों और आदिवासी मिलिशिया ने 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर कब्जा करने के इरादे से कश्मीर घाटी पर आक्रमण किया। फलतः भारत सरकार ने आक्रमणकारियों को पीछे हटाने के लिए 27 अक्तूबर को भारतीय सेना की एक टुकड़ी को हवाई मार्ग से तुरंत श्रीनगर भेजा।

हाथ पर प्लास्टर के बावजूद लड़ाई लड़ी

जब 22 अक्तूबर को कश्मीर घाटी में पाकिस्तान सेना आक्रमण कर दिया तब इसके जवाब में भारतीय सेना की एक टुकड़ी तैनात किया गया।

इसके एक हफ्ते के बाद 31 अक्तूबर को मेजर शर्मा की अगुआई में कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डी कंपनी को श्रीनगर के लिए रवाना कर दिया गया। उस बक्त हॉकी खेलते हुए मेजर शर्मा के बायें हाथ पर चोट लगने के कारण प्लास्टर चढ़ा था।

लेकिन उन्होंने युद्ध के दौरान अपनी कंपनी का नेतृत्व करने का आग्रह किया और उन्हें जाने की अनुमति मिल गई। मेजर सोमनाथ शर्मा को अपने कंपनी के जवानों के साथ श्रीनगर के पास बडगाम हवाई क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मेदारी दिया गया।

उस बक्त कश्मीर का यह हवाई क्षेत्र एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान था। क्योंकि कश्मीर घाटी को बाहरी दुनिया से जोड़ने का एकमात्र यही एक साधन था।

जब 700 दुश्मनों ने घेर लिया था

दुश्मन की संख्या 700 दर अधिक होने के बावजूद उन्होंने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ मिलकर बहादुरी से लड़ाई लड़ी। दुश्मन की भीषण गोलाबारी का उन्होंने अपने जवानों के साथ मिलकर मुहतोड़ जवाव दिया।

इस दौरान मेजर शर्मा मोर्टार फायर में घायल हो गए। घायल होने के बावजूद भी उन्होंने वहां से पीछे हटने से इनकार कर दिया और अपने हाथों में पट्टी बंधे होने के बावजूद भी दुश्मन पर कहर बनकर बरसते रहे। यह उनके देश के प्रति सेवन, अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

पीछे नहीं हटने का संकल्प –

दोनों तरफ से भयंकर गोली बाड़ी चल रही थी। घायल होने के बाद भी उन्होंने अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। उन्होंने अपने कमांडिंग ऑफिसर को रेडियो संदेश भेजकर कहा, “दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूरी पर है

दुश्मन की संख्या बहुत अधिक है। दोनों तरफ से भयंकर गोला बारूद चल रही है। लेकिन हम एक इंच पीछे नहीं हटेंगे। हम अपने आखिरी जवान और आखिरी गोली के साथ लड़ता रहूँगा।

मेजर शर्मा का आत्म-बलिदान

इस प्रकार मेजर शर्मा ने कई घंटे तक दुश्मन को रोके रखा। दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकने के प्रयास में मेजर शर्मा और उनके लोगों ने पर भयंकर जवाबी हमला हुआ। इस जवाबी हमले के दौरान मेजर शर्मा को गोली लगी और वह जमीन पर गिर पड़े।

खून से लथपथ मेजर शर्मा ने फिर भी अपने हाथ में एक मशीनगन उठाकर दुश्मन पर गोलीबारी जारी रखी। जब तक उनकी सहायता के लिए कुछ और टुकड़ी पहुंची तब तक वे शहीद हो गए। लेकिन उसका बलिदान और बहादुरी व्यर्थ गया।

क्योंकि उनके इस करबाई से दुश्मन को पीछे हटाना पड़ा। इस दौरान उनके साथ 20 जवान शहीद हो गए। कहा जाता है की उनके इस करबाई में दुश्मन के 200 से अधिक जवान मारे गए, जिस कारण से दुश्मन आगे नहीं बढ़े सके।

इस प्रकार उन्होंने अपनी शहादत देकर बडगाम हवाई क्षेत्र को दुश्मन से बचा लिया गया। उनके इस प्रयास से भारतीय सेना को श्रीनगर क्षेत्र में उड़ान भरने का सुरक्षित मौका मिला और हमारी सेना दुश्मन के श्रीनगर में घुसने के सभी रास्ते को सील कर दिये।

मेजर शर्मा मोर्टार और गोली से इतने घायल हो गए थे की जब कुमाऊं रेजिमेंट की एक कंपनी बडगाम पहुंच तो मेजर शर्मा को पहचानने में दिक्कत भी हुई थी। उन्होंने मेजर शर्मा के पार्थिव शरीर की पहचान चमड़े के होलस्टर और उसमें पाए गए भगवद् गीता के पन्नों से की थी।

श्रीकृष्ण ने भागवत गीता से प्रभावित

मेजर शर्मा भगवान श्री कृष्ण और उनके गीता में कही हुई बातों से बहुत अधिक प्रभावित थे। कहते हैं की एक बार उन्होंने अपने माता पिता को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लिखा की मैं अपने कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा से कर रहा हूं।

थोड़ी देर के लिए मृत्यु से डर जरूर लगता है लेकिन जब गीता मैं भगवान श्रीकृष्ण का कही हुई बातों को याद करता हूं तो मौत का वह डर भी खत्म हो जाता जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अपने उपदेश में कहा है कि आत्मा अमर है।

फलतः क्या फर्क पड़ता है मेरा शरीर रहे अथवा नष्ट हो। उन्होंने अपने पिता को यकीन दिलाया की अगर मेरी मौत आएगी तो में एक बहादुर सिपाही की तरह ही लड़कर मरना पसंद करूंगा। ऐसा करते हुए मुझे कोई दुख नहीं होगा। ठीक वैसा ही आगे चलकर मेजर शर्मा द्वारा कही हुई बात सच साबित हुई।

भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता

मेजर सोमनाथ शर्मा को दुश्मन के सामने उनके असाधारण साहस और कुशल नेतृत्व के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

आज भारतीय सेना ही नहीं बल्कि पूरे देश बासी के लिए मेजर शर्मा का नाम साहस और बलिदान का पर्याय बन चुका है। मेजर सोमनाथ शर्मा परमवीर चक्र के पहले प्राप्तकर्ता हैं।

सम्मान व पुरस्कार

भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र विजेता सोमनाथ के सम्मान में शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने अपने कच्चे तेल टैंकरों में से एक का नाम उनके नाम पर रखा था।

उनके जीवन की वीर गाथा को 1988 में टीवी सीरियल “परम वीर चक्र” में विस्तार से दिखाया गया था। जिसमें उनकी भूमिका अभिनेता फारूक शेख ने निभाई थी। मेजर शर्मा के सम्मान में डाक विभाग ने डाक टिकट भी जारी किया था।

मेजर सोमनाथ शर्मा से जुड़ी रोचक बातें (about Major Somnath Sharma)

  • मेजर सोमनाथ शर्मा भारत के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र के पहले प्राप्तकर्ता थे।
  • मेजर सोमनाथ शर्मा को 1950 में मरणोपरांत यह पुरस्कार प्रदान किया गया था।
  • मेजर शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को दादह, कांगड़ा जिले, हिमाचल प्रदेश में हुआ था।
  • मेजर शर्मा ने अपनी स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज, नैनीताल से पूरी की थी।
  • आगे की पढ़ाई प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज, देहरादून से पूरा कर सेना में कैरियर की शरुआत की।
  • उनका सबसे पहले 1942 में 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट के 8वीं बटालियन में नियुक्त किया गया था।
  • भारत-पाकिस्तान युद्ध में मेजर शर्मा 3 नवंबर, 1947 को श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे।
  • शहादत के बक्त वे भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमांडर थे
  • 1950 में जब भारत के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र की स्थापना हुई, यह पुरस्कार उन्हें मरणोपरत्न किया गया
  • इस प्रकार मेजर शर्मा परमवीर चक्र के प्रथम विजेता बने।

अंत में (Conclusion)-

मेजर शर्मा भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र के पहले विजेता हैं। मेजर सोमनाथ शर्मा की कहानी बहादुरी, साहस और देश के लिए मर मिटने वाली एक बलिदान की कहानी है। उन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।

मेजर शर्मा के देश की प्रति सच्ची श्रद्धा, अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। भारतीय सैन्य इतिहास में मेजर शर्मा का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है। उनकी अदम्य साहस और बहादुरी की कहानी आने वाले भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है।

इन्हें भी पढ़ें : परमवीर चक्र विजेता लिस्ट 2024 विस्तार से

F.A.Qs

पहला परमवीर चक्र सोमनाथ शर्मा को दिया गया वह किस रेजिमेंट के थे

पहला परमवीर चक्र पाने वाले सोमनाथ शर्मा कुमाऊं रेजिमेंट के थे

मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र कब मिला

मेजर शर्मा को 1950 में परमवीर चक्र मिला था।

मेजर सोमनाथ शर्मा कौन थे ?

मेजर सोमनाथ शर्मा एक सैन्य अधिकारी थे। जिन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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