Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindi – आधुनिक युग की मीरा महादेवी वर्मा का जीवन परिचय

Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindi

Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindiमहादेवी वर्मा एक महान कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल चित्रकार थी। इनकी रचनाओं में छायावादी कवियों में सबसे ज्यादा अनुभूति एवं मार्मिक अभिव्यंजना की झलक दिखाई पड़ती है।

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हिन्दी साहित्य की अनुपम प्रतिभावान कवयित्री महादेवी वर्मा छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक मानी जाती हैं।आधुनिक हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक सशक्त कवयित्रि होने के कारण ही महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की ‘मीरा’ भी कहते हैं।

उनकी काव्य का रचनाकाल 1924 से लेकर 1942 ईस्वी तक माना जाता है। उनका पूरा जीवन हिन्दी साहित्य और शिक्षण को ही समर्पित रहा। उन्होंने M. A करने के बाद प्रयाग महिला विध्यापीठ की प्राचार्य बनी और आजीवन इस पद पर आसीन रहीं।

प्रारंभ से ही उन्हें काव्य के क्षेत्र में रुचि थी, और मात्र सात बर्ष की अवस्था में उन्होंने कविता लिखनी शुरू कर दी थी। उन्होंने कुछ दिन महिलाओं की पत्रिका ‘चाँद’ का भी सम्पादन किया।

महिला अधिकारों के लिए जीवन भर वे संघर्ष करती रही। उन्होंने महिलाओं को अपने हक के लिए लड़ना सिखाया। महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला साहब उन्हें ‘सरस्वती’ नाम से संबोधित किया करते थे।

महादेवी वर्मा को हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है।आईए इस लेख में महादेवी वर्मा की जीवनी(Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindi ) को संक्षेप में जानते हैं।

आधुनिक युग की मीरा’ महादेवी वर्मा – Mahadevi Verma Biography in Hindi

पूरा नाम महादेवी वर्मा
उपनाम आधुनिक युग की मीरा
जन्म दिवस 26 मार्च
जन्म स्थान फरुखाबाद, उत्तर प्रदेश
पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा
माता का नाम हेमरानी वर्मा
पति का नाम डॉ रूपनारायण वर्मा
प्रसिद्धि एक लेखक और कवयित्री के रूप में
सम्मान पद्ध भूषण, पद्ध विभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार आदि
Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindi
Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindi

कवयित्री महादेवी वर्मा का जीवन परिचय – Mahadevi verma ka jivan parichay in Hindi

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 ईस्वी को होली के दिन उत्तरप्रदेश के फरुखाबाद में हुआ था। उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा एक शिक्षक थे जो बिहार के भागलपुर में कार्यरत थे। उनकी माता हेमरानी वर्मा एक विदूसी और अत्यंत ही धार्मिक प्रवृति की महिला थी।

वे अपने माता पिता की एकलौती संतान थी। उनके पिता ने प्यार से उनका नाम महादेवी रखा था। कहते हैं की उनके नाना जी वज्र भाषा के कवि थे। इस कारण बचपन से काव्य रचना की प्रेरणा उन्हें अपने ही परिवार से प्राप्त हुई।

उनकी आरंभिक शिक्षा पहले घर पर हुई उसके बाद की शिक्षा इंदौर के मिशन स्कूल में हुई। बचपन से ही उन्हें पढ़ाई लिखाई में बहुत मन लगता था।

बाल्यावस्था से ही उन्हें सूर, तुलसी और मीरा जैसे संत व कवियों की रचनाओं को पढ़ने में विशेष रुचि थी। आगे चलकर यही महान संत व कवि उनकी जीवन का प्रेरणा स्रोत बने।

Mahadevi verma ka jivan parichay विवाह व शिक्षा

महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma )की बाल्यावस्था में ही शादी कर दी गयी। उनके पति का नाम डॉ रूपनारायण वर्मा था। हालांकि कहते हैं की उनका दाम्पत्य जीवन उतना सफल नहीं रहा। शादी के बाद उनके शिक्षा में कुछ दिनों के लिए रुकावट आ गयी।

लेकिन उन्होंने दुबारा अपनी पढ़ाई शुरू की। उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद ) में नामांकन लिया। वहीं पर उन्होंने हाई स्कूल, इंटर और स्नातक की परीक्षा पास की। वे हमेशा पढ़ाई में अव्वल रही और इसके लिए उन्हें छात्रवृति भी प्रदान की गयी।

सन 1933 ईस्वी में उन्होंने प्रयागराज यूनिवर्सिटी से संस्कृत में एम ए की परीक्षा पास की। उनकी पहली रचना ‘चाँद’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। उनकी रचना को लोगों ने खूब सराहा और उन्हें एक नई पहचान मिली।

बाद में वे इस पत्रिका का सम्पादक भी बनी। इस रचना के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। वे काव्य साधना के पथ पर अनवरत चलती रही। 

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भगवान बुद्ध से थी अत्यंत ही प्रभावित

कहते हैं की वे भगवान बुध से बेहद प्रभावित रहीं। उनकी रचनाओं में करुणा तथा संवेदना का भाव भगवान बुध से ही प्रेरित लगता है। कहा जाता है की एक बार वे अपने घर गृहस्थी छोड़कर सन्यासी बनने की तरफ अग्रसर होने का मन बना ली थी।

लेकिन महात्मा गाँधी से मुलाकात के बाद उनका इरादा बदल गया। उन्होंने देश की आजादी में योगदान दिया और और सारी जिंदगी हिंदी साहित्य के सृजन में समर्पित कर दिया।

महादेवी जी का जीवन परिचय वीडियो

नारी शिक्षा और अधिकार के लिए सतत लड़ती रही

उन्होंने प्रयागराज यूनिवर्सिटी से संस्कृत में डिग्री लेने के बाद प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनीं। वहाँ पर उन्होंने महिला को समर्पित प्रसिद्ध पत्रिका ‘चाँद’ का सम्पादन किया। इस पत्रिका का सम्पादन के लिए उन्होंने कोई शुल्क नहीं ली।

इस पत्रिका के संपादन द्वारा उन्होंने नारी शिक्षा, उनके अधिकारों के बारें में जमकर लिखी। वे महिलाओं के स्वतंत्रता को समाज में उनके सम्मानजनक स्थान के लिए हमेशा प्रयत्न शील रही।

उन्होंने नारी की विकास के लिए शिक्षा को आवश्यक माना। इस प्रकार महादेवी जी ने लड़कियों के उत्थान और अधिकार के लिए कई उल्लेखनीय काम किये।

महादेवी वर्मा का साहित्यिक परिचय

उनका नाम हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में लिया जाता है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत के साथ हिंदी साहित्य के छायावाद युग को एक नई दिशा और चेतना प्रदान की।

Mahadevi Verma की रचनाओं में बिरह और वेदना का समन्वय दिखाई देता है। शुरुआत में उन्होंने वज्र भाषा में अपनी कविता लिखी। लेकिन बाद में उन्होंने खड़ी बोली में अपने काव्य की रचना करने लगी।

उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में  में भावात्मक शैली का अद्भुत प्रयोग किया है। उनकी रचना में अलंकार के रूप में उपमा, रुपक आदि की प्रधानता नजर आती है।

महादेवी वर्मा की रचनाएँ

उनहें गद्य और पद्य दोनो में महारत हासिल थी। महादेवी वर्मा ने कई काव्य ग्रंथों की रचना की हैं।

उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं-

  • निहार (1930)
  • रश्मि (1932)
  • नीरजा (1933)
  • संध्यागीत (1935)
  • दीपशिखा (1942)
  • प्रथम अयम (1949)
  • सप्तपर्णा (1959)
  • अग्नि रेखा
  • नीलाम्बरा
  • यामा

महादेवी वर्मा की प्रमुख गद्य रचनाओं में शामिल हैं –

  • अतीत के चलचित्र (1961, रेखाचित्र)
  • स्मृति की रेखाएं (1943, रेखाचित्र)
  • पाठ के साथी (1956)
  • मेरा परिवार (1972)
  • संस्कारन (1943)
  • संभासन (1949)
  • श्रींखला के करिये (1972)
  • विवेचामनक गद्य (1972)
  • स्कंधा (1956)
  • हिमालय (1973)

गढ़ ग्रंथ में – उनकी गद्य कृतियों में स्मृति की रेखाएं, मेरा परिवार, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियां और अतीत के चलचित्र आदि प्रसिद्ध हैं।.

महादेवी जी की रचनाओं की विशेषता

उनकी अधिकतर रचनायें नारीवादी दृष्टिकोण पर केंद्रित लगती हैं। उन्होंने करुणा की अभिव्यक्ति के लिए अपने रचनाओं में शब्दों का चयन इस प्रकार किया है की उनकी रचनाएँ लोगों के दिल को छु जाती है।

महादेवी वर्मा की भाषा शैली

उनकी रचनायें आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है। चाहे गद्य हो या पद्य उन्होंने अपनी हर रचना में जान डाल दिए हैं। उनकी रचनाओं की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है।

उनकी रचनाओं में संस्कृत के सरल और क्लिष्ट तत्सम शब्दों का मेल देखने को मिलता है। भावतरलता, प्रतीकात्मकता, चित्रात्मकता, आलंकारिता, छायावादी आदि उनकी रचनाओं की विशेषता कही जा सकती है।

पुरस्कार व सम्मान

उन्हें भारत सरकार के द्वारा सन 1956 ईस्वी में पद्ध भूषण से सम्मानित किया था। साथ ही उन्हें साहित्य के सबसे बड़े सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें 1982 ईस्वी में प्रमुख काव्य संग्रह ‘यामा’ के लिए प्रदान किया गया था।

हिंदी साहित्य में अमूलय योगदान के लिए वर्ष 1988 ईस्वी में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान ‘पद्म विभूषण‘ से सम्मानित किया।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन की तरफ से उन्हें भारतेन्दु अवॉर्ड प्रदान किया गया। महादेवी वर्मा को 1943 ईस्वी में ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ एवं ‘भारत भारती’ पुरस्कार प्रदान किया गया। आजादी के बाद 1952 में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या चुनी गयीं।

बर्ष 1971 में साहित्य अकादमी की सदस्यता ग्रहण करने वाली महादेवी वर्मा पहली महिला थीं। भारत सार्क ने 1988 में उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण उपाधि से सम्मानित किया।

उन्हें 1969 में विक्रम, 1977 में कुमाऊं, 1980 में दिल्ली विश्वविद्यालय और 1984 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने महादेवी वर्मा को डी.लिट की उपाधि प्रदान की।
महादेवी वर्मा को 1934 में ‘नीरजा’ के लिये ‘सक्सेरिया पुरस्कार’, और 1942 में ‘स्मृति की रेखाएँ’ के लिये ‘द्विवेदी पदक’ प्रदान किया गया।
उनके सम्मान में 16 सितंबर 1991 को भारत सरकार के डाकतार विभाग ने कवि जयशंकर प्रसाद के साथ डाक टिकट जारी किया था। इसके आलवा भी उन्हें कई छोटे-बड़े अवॉर्ड से सम्मानित  किया गया।

महादेवी वर्मा की मृत्यु

हिन्दी साहित्य को अपना समस्त जीवन समर्पित करने वाली महादेवी वर्मा की 11 सितंबर 1987 को प्रयागराज में मृत्यु हो गयी। उनकी कृतियों अनुपम और महान हैं। हिन्दी साहित्य जगत इस आधुनिक युग की मीरा को सदा स्मरण रखेगी।

इन्हें भी पढ़ें –

महादेवी वर्मा की कविताएं (Mahadevi Verma poems in Hindi)

काव्य का नाम – मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हँसा नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झारिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा, श्वासों से स्वप्न-पराग झरा नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय-बयार पली।

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल, चिन्ता का भार बनी अविरल रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना, पथ-चिह्न न दे जाता जाना; सुधि मेरे आगन की जग में, सुख की सिहरन हो अन्त खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना, इतिहास यही उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

महादेवी वर्मा की कहानी – Mahadevi Verma stories in Hindi

महादेवीवर्मा की गद्य कृतियों अर्थात कहानी की बात करें तो इसमें कुछ प्रसिद्ध नाम हैं।

  • स्मृति की रेखाएं,
  • पथ के साथी,
  • मेरा परिवार,
  • शृंखला की कड़ियां
  • अतीत के चलचित्र

कुछ और जानने की बातें (F.A.Qs)

महादेवी वर्मा अपने विवाह के समय कितने वर्ष की थी?

कहते हैं की वे अपने विवाह के समय मात्र 9 साल की थी। उनके पति का नाम डॉ रूपनारायण वर्मा था।

महादेवी वर्मा का जन्म कहाँ हुआ?

महादेवी जी का जन्म उत्तरप्रदेश के फरुखाबाद में हुआ था।

महादेवी वर्मा की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

महादेवी जी की मृत्यु 11 सितंबर 1987 को प्रयागराज में हुई।

महादेवी वर्मा को कौन कौन से पुरस्कार मिले?

हिन्दी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्ध भूषण, पद्म विभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा भारतेन्दु अवॉर्ड मिले।

महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की मीरा क्यों कहा जाता है?

उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन साहित्य साधना और आधुनिक काव्य जगत को आलोकित करने में लगा दिया. अपने काव्य में उपस्थित विरह वेदना और भावनात्मक गहनता के कारण ही उन्हें आधुनिक युग की मीरा कहा जाता है.

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बाहरी कड़ियाँ (External links)

महादेवी वर्मा – विकिपीडिया

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