BHARAT KI RAJDHANI – कोलकता से नई दिल्ली स्थानांतरन की कहानी

BHARAT KI RAJDHANI CAPITAL OF INDIA - कोलकता से नई दिल्ली
BHARAT KI RAJDHANI नई दिल्ली में दिल्ली दरबार का एक दृश्य
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कोलकाता को सन 1772  से ही ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया था। प्रथम गवर्नर जनरल वॉरैन हेस्टिंग्स ने कोलकाता को भारत की राजधानी बनाया गया था।

BHARAT KI RAJDHANI – भारत की राजधानी

साल 1911 तक भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता क्रांतिकारियों के गतिबिधियों का गढ़ बन चुका था। अंग्रेजों का विरोध और स्वराज की मांग चारों तरफ तेज हो चुकी थी।

अंग्रेज भारत की राजधानी कलकत्ता से कहीं दूर स्थानतारित करने को सोच रहे थे। इस बीच किंग जॉर्ज पंचम ने अपने राज्याभिषेक के लिए दिल्ली दरबार सजाया था।

लेकिन किसी को पता नहीं था की वे अपने राज्याभिषेक के साथ ही भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट करने जा रहें है।

दूर-दूर से 80 हज़ार से भी ज़्यादा लोग किंग जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक का साक्षी होने दिल्ली पहुचे हुए थे।

12 दिसंबर 1911 की सुबह किंग जॉर्ज पंचम ने अपने राज्याभिषेक के दौरान भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की।

उन्होंने अपने अभिभाषण में कहा -“हमें भारत की जनता को यह बताते हुए बेहद हर्ष हो रहा है कि सरकार और उसके मंत्रियों की सलाह पर देश को बेहतर ढंग से प्रशासित करने के लिए ब्रितानी सरकार भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करती है।

दिल्ली दरवार की कहानी – BHARAT KI RAJDHANI STORY

भारत में ब्रिटिश सरकार ने 03 बार दिल्ली दरवार का आयोजन किया था। उन्होंने 1877, 1903 और 1911 में दिल्ली दरवार का आयोजन किया।

पहला दिल्ली दरवार – पहला दिल्ली दरवार का आयोजन 1877 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन के द्वारा आयोजित किया गया था। इस दौरान महारानी विक्टोरिया को भारत की रानी(सम्राज्ञी) घोषित किया गया था। इस दौरान पानी की तरह पैसा बर्बाद किया गया था।

दूसरा दिल्ली दरवार – दिल्ली में दूसरा दरवार 1903 में लॉर्ड कर्जन ने आयोजित किया था। इस दरवार में एडवर्ड सप्तम के गद्दी पर बैठने की घोषणा की गयी।

तीसरा दरवार – लॉर्ड हार्डीगज ने आयोजित द्वार आयोजित किया गया था। इस अवसर पर जार्ज पंचम और उनकी रानी भारत पधारे और उनका भव्य स्वागत किया गयी।

इसी दरवार में जार्ज पंचम ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानतारण की घोषणा की। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि व लेखक भारतेन्दु हरिशचंद ने एक दिल्ली दरबार का विस्तृत वर्णन किया है। 

राजधानी के लिए दिल्ली का नये ढंग से कायाकल्प

भारत की राजधानी ( BHARAT KI RAJDHANI )दिल्ली के आलवा शायद ही कोई दूसरा शहर होगा जो इतनी बार उजड़ा और फिर से बसाया गया हो। कहते हैं की 1450 ईसा पूर्व, दिल्ली को ‘इंदरपथ’ के रुप में पांडवों ने भी बसाया था।

इतिहासकारों के अनुसार निगमबोध घाट के पास इंद्रप्रस्थ की निशानियां आज भी मौजूद हैं। कलांतर में दिल्ली को मोहम्मद ग़ौरी, मोहम्मद ग़ज़नी, तुग़लक, खिलजी और फिर मुगलों ने अपने ढंग से दिल्ली को संजोया और राज किया।

अब बारी अंग्रेजों की थी। किंग जॉर्ज पंचम के घोषणा के बाद दिल्ली दरबार में ही इसकी आधारशीला रखी। बाद में ब्रिटिश वास्तुशास्त्री सर हरबर्ट बेकर और सर एडविन लुटियंस ने इस शहर को नये ढंग से रचने की योजना पर काम किया।

दिल्ली को आधुनिक ढंग से कायाक्लप कर देश की राजधानी का जामा पहनाने की कवायद शुरु की गयी। नये ढंग से आलीशान भवन, चौड़ी सड़कें, दफ्तर के आधुनिकीकरण का काम शुरू हुया।

रायसीन हिल्स के ऊपर ‘वायसराय के निवास के लिए आलीशान ‘वायसराय हाउस’ बनाया गया। जिन्हें आज ‘राष्ट्रपति भवन’ के नाम से जाना जाता है। ‘वायसराय हाउस’ के ठीक सामने ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ का निर्माण कराया गया।

जिसे आज हम ‘इंडिया गेट’ के नाम से जानते हैं। इस प्रकार इस योजना को अमली जामा पहनाने में लगभग 20 साल का बक्त लग गया।

इस प्रकार 13 फरवरी 1931 को आधिकारिक रूप से दिल्ली भारत की राजधानी बनी। इसका नाम नई दिल्ली 1927 में प्रदान किया गया। कुछ विद्वानों के अनुसार दिल्ली भौगोलिक दृष्टि से देश के मध्य में पड़ता था।

शायद इसी वजह से दिल्ली को भारत की राजधानी के लिए चुना गया। तब से लेकर अभी तक दिल्ली भारत की राजधानी है।

दिल्ली का नाम दिल्ली कैसे पड़ा – BHARAT KI RAJDHANI (CAPITAL OF INDIA )

दिल्ली का इतिहास 3000 साल से भी पुराना माना जाता है। दिल्ली शहर का नाम दिल्ली कैसे पड़ा आइए इस जानते है। दिल्ली को दिल्ली कहलाने के पीछे कई बातों का जिक्र आता है, कहते हैं की दिल्ली शव्द फ़ारसी भाषा के शव्द देहलीज़ से लिया गया है।

मान्यता हैं की दिल्ली गंगा के तराई इलाकों के लिए एक ‘देहलीज़’ का काम करता था। शायद इसी कारण बाद में इसका नाम दिल्ली हो गया।

दिल्ली का नाम तोमर राजा ढिल्लू से भी जोड़ कर देखा जाता है। मानते हैं की दिल्ली का नाम उसी राजा के नाम से पड़ा। कहते हैं की एक अभिषाप को झूठा साबित करने के लिए तोमर राजा ढिल्लू ने इस शहर की नींव में गड़ी एक कील को खुदवाने की कोशिश की थी।

इस घटना के बाद उनके राजपाट का अंत हो गया लेकिन मशहूर हुई एक कहावत, किल्ली तो ढिल्ली भई, तोमर हुए मतीहीन,।

दोस्तों BHARAT KI RAJDHANI का कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरन की कहानी आपको कैसा लगा अपने सुझाव से अवगत करायें ।

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