Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi – स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय

स्वामी दयानंद सरस्वती, उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध समाज-सुधारक और संत थे। उन्होंने हिन्दू समुदाय में व्याप्त अंधविश्वास, बहु-ईश्वरवाद और मूर्ति पूजा की कड़ी आलोचना की। वे इसके खिलाफ आवाज उठाते हुये हमेशा एकेश्वरवाद पर जोर दिया।

SWAMI DAYANAND SARASWATI BIOGRAPHY IN HINDI - स्वामी दयानंद सरस्वती जीवन परिचय
स्वामी दयानंद सरस्वती जीवन परिचय

समाज में व्याप्त जाति-पाती के बंधनों और बाल विवाह का उन्होंने खुलकर विरोध किया। जब अंग्रेजों के गुलामी के जंजीर में जकड़े भारत के लोग पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित हो रहे थे।

जब समाज में अंधविश्वास इस कदर छाया हुआ था की स्त्री शिक्षा, विधवा-विवाह और समुन्द्र यात्रा वर्जित माना जाता था। जब भारत के लोगों का झुकाव ईसाई धर्म की ओर बढ़ रहा था।

उस बक्त स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यसमाज की स्थापना के द्वारा, समाज को वैदिक वयवस्था के आधार पर संगठित किया। उन्होंने दलित और पिछड़ी जाती के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया।

शुद्धि आंदोलन के द्वारा उन्होंने गैर हिंदूयों को भी हिन्दू धर्म की प्रेरणा दी। उन्होंने भारतीय संस्कृति और वेदो की ओर लौटने का संदेश दिया। स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम हिन्दू समुदाय में अत्यंत श्रध्दा के साथ लिया जाता है।

वह संत और समाज सुधारक के साथ-साथ महान देशभक्त थे। विदेशी हुकूमत के खिलाफ भी उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की और देशभक्ति क लोगों को प्रेरित किया। तो आइए जानते हैं महान संत स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन के वारें में विस्तार से : –

स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जीवन परिचय संक्षेप में

स्वामी दयानंद का पूरा नाम – स्वामी दयानंद सरस्वती
स्वामी दयानंद सरस्वती का मूल नाम – मूलशंकर एवं दयाराम
स्वामी दयानंद का जन्म तिथि – 12 फरवरी 1824 ईस्वी
स्वामी दयानंद का जन्म स्थान – काठियावाड, गुजरात
स्वामी दयानंद के पिता का मूल नाम – कर्शनजी लाल
स्वामी दयानंद के माता का नाम – यशोदाबाई
स्वामी दयानंद के गुरु का नाम – स्वामी विरजानन्द
स्वामी दयानंद का निधन – 30 अक्टूबर 1983 अजमेर, राजस्थान

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 ईस्वी में भारत के गुजरात राज्य में राजकोट जिला के काठियावाड़ क्षेत्र  हुआ था। उनके माता का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता करशनजी लालजी एक कर-कलेक्टर के पद पर आसीन थे।

फलतः उनका पूरा परिवार सुखी सम्पन था, धर में किसी चीज की कमी नहीं थी। स्वामी दयानंद सरस्वती का मूल नाम अर्थात बचपन का नाम ‘मूलशंकर’ एवं दयाराम था। पाँच वर्ष की अवस्थ में उन्होंने देवनागरी पढ़ना आरंभ कर दिया था।

उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में होने के कारण, 8 वर्ष की उम्र में उनका यज्ञोपवीत संस्कार हो। हुआ था। इसके साथ ही उन्हें गायत्री संध्या और उसकी क्रिया से भी अवगत करा दिया गया।

उनके परिवार में शैव मत को मानते थे इसलिए उन्हें यजुर्वेद की संहिता के प्रथम रुद्राध्याय का पाठन कराया गया।  

आरंभिक जीवन की घटना

जैसा का उनका परिवार शैव मत से प्रभावित थे। ब्राह्मण परिवार में पैदा होने की वजह से धर में पूजा पाठ का माहौल तो था ही। उन्होंने 14 वर्ष की उम्र तक आते आते यजुर्वेद का सम्पूर्ण रूप से पाठन के साथ अन्य वेद का भी पाठ पूरा कर लिया।

बचपन से वे हर बात को तर्क की कसौटी पर कस कर देखते थे। अंधविश्वास और मूर्तिपूजा का वे विरोध किया करते थे। उनमें बचपन से ही जीवन और मृत्यु के रहस्य को जानने की जिज्ञासा थी।

उनके मन में कई ऐसे सबाल उठते जो हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं के वारें में प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देते। उनके बचपन में घटी शिवरात्री की रात की घटना ने उनके जीवन को नई दिशा दे दी।

एक समय की बात है शिवरात्रि का समय था। घर के सारे लोग शिवरात्री का व्रत रखे हुए थे। उनके साथ बालक दयानंद सरस्वती को भी व्रत रखना पड़ा। शिवरात्रि के रात उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए शिवमंदिर में रुके हुए थे।

उन्हें बताया गया था की भगवान शिव रात्री में आते हैं और प्रसाद का भोग लगते हैं। सो जाने से शिवरात्री पूजन का फल नहीं प्राप्त होता। इस कारण वे रात भर आँख में पानी का छींटा मार कर जागते रहे। 

तभी उनकी नजर एक चूहे पर गई जो मंदिर में भगवान शिव को चढ़ाये गये भोग को खा रहे हैं। यह दृश्य देख कर वे सोच में पड़ गये और विचार करने लगे कि जो भगवान स्वयं को चढ़ाये गये भोग (प्रसाद) की सुरक्षा नहीं कर पा रहा है।

वह समस्त मानवता की रक्षा कैसे कर सकते हैं। उन्होंने इस बात पर अपने पिता से प्रश्न पूछ दिया। लेकिन उनके पिता ने उन्हें चुप करा दिया। लेकिन बार-बार वे तर्क दे रहे थे कि क्या हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना करनी चाहिए।

घिरे-धीरे उनके पिता को पाने पुत्र के मनः स्थिति के बारें में पता चलने लगा की। वे देश दुनियाँ से इतर भक्ति और भगवान में बारें में जानने की ज्यादा रुचि है। यह रुचि संसार से उन्हें विरक्त कर सकती है। फलतः उन्होंने अपने पुत्र मूल शंकर की शादी कराने का फैलसा कर लिया।

गृह त्याग और सन्यास ग्रहण

जब उन्हें मालूम हुआ की उनके माता पिता उनकी शादी करने वाले हैं। तब उन्होंने सांसारिक सुख को आध्यात्मिक उन्नत्ती के लिए बाधक समझा। फलसरूप उन्होंने गृह त्याग का मन बना लिया। एक दिन वे चुपचाप सन 1846 ईस्वी में संध्या के समय गृह त्याग कर दिये।

इस प्रकार वे मात्र 21 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर सन्यासी का वेश धारण कर लिये। ज्ञान की खोज में भ्रमण करते वे मथुरा पहुंचे।

स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु, गुरु दीक्षा और दक्षिणा

स्वामी जी जीवन में गुरु का महत्व को भली भांति समझते थे। इस प्रकार मथुरा में उन्होंने स्वामी विरजानंद को अपना गुरु बना लिया और उनसे दीक्षा और ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब गुरु दक्षिणा की बात आई तब उनके गुरु ने गुरु दक्षिना में वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार की बात कही।

उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप में अपने गुरु स्वामी विरजानंद जी को वचन दिया की वे उम्र-भर वैदिक ज्ञान के प्रचार और प्रसार के लिए काम करते रहेंगे।

विश्व में वैदिक ज्ञान का प्रचार

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने गुरु को दिए गये वचन को निभाते हुए भारत सहित दुनियाँ के कई देशों में वैदिक ज्ञान का प्रचार किया। इस दौरान उन्हें अनेकों कठिनयियों का सामना कड़ना, अपमान सहना पड़ा। लेकिन वे इन सब बातों से कभी विचलित नहीं हुए।

इन्होंने सभी धर्मों के धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर उन धर्मों के बारे में जाना और समझा। उन्होंने पाया की वेदों में निहित ज्ञान ही सर्वोपरि और प्रामाणिक है। उसके बाद उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों का जमकर विरोध करना शुरू किया।

साथ ही उन्होंने ईसाई, मुस्लिम व अन्य धर्मों में व्यापात बुराई का विरोध किया। इस प्रकार उन्होंने समाज के उत्थान के लिए वेदों पर आधारित आर्य समाज की स्थापना की।

आर्य समाज की स्थापना – Arya Samaj ki sthapna

धर्मसुधारक के अग्रदूत रहे स्वामी दयानंद सरस्वती ने 10 अप्रेल 1875 ईस्वी में मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज की स्थापना के फलस्वरूप उन्होंने हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन पर अंकुश लगाने का काम किया।

उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज ने भारत में राष्ट्रवाद के विकाश में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने नारा दिया, वेदों की ओर लौट चलो। उन्होंने बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का खंडन किया और वैदिक शिक्षा, वैदिक धर्म, वैदिक दर्शन को अपनाने पर बल दिया।

आर्य समाज के संस्थापक (Founder of Arya Smaj) दयानंद सरस्वती नारी शिक्षा और विधवा विवाह के समर्थक थे। उन्होंने अपने प्रभावशाली प्रवचनों के द्वारा भारत के लोगों को राष्ट्रीयता का संदेश दिया।

दयानंद सरस्वती द्वारा शास्त्रार्थ

स्वामी दयानंद सरस्वती महान विद्वान और वक्ता थे। स्वामी दयानंद, समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ हमेशा अपनी आबज उठाई। उन्होंने सन 1867 ईस्वी में हरिद्वार में कुम्भ मेले के अवसर पर पोंगा-पंथियों से शास्त्रार्थ किया।

उन्होंने वेद की महत्ता पर जोर देते हुए 1869 ईस्वी में काशी में शास्त्रार्थ किया। इसके बाद सन 1878 ईस्वी में उनका रेवरेंड ग्रे और डॉ. हसबैंड के साथ शास्त्रार्थ हुआ। इसके अलाबा 1879 ईस्वी में बरेली में पादरी स्कॉट के साथ और 1880 ईस्वी में जैनियों के शास्त्रार्थ किया।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

स्वामी दयानंद सरस्वती ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किये। शुरू में उनका जोर संस्कृत के शिक्षा पर रहा। बाद में उन्होंने लाहौर में दयानंद एंग्लोवैदिक कॉलेज की स्थापना कर अंग्रेजी शिक्षा पर भी जोर दिया।

तत्पश्चात 1902 ईस्वी में उन्होंने हरिद्वार में गुरुकुल काँगड़ी की नींव राखी। इस गुरुकुल काँगड़ी में हर बिषय का ज्ञान संस्कृत और हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रदान की जाने लगी।

उन्होंने अपने आंदोलन के द्वारा समस्त भारत में अनेक, गुरुकुल, कन्या पाठशाला, संस्कृत विध्यालय, अनाथालय की स्थापना की।   

आर्यसमाज का प्रचार-प्रसार Arya Samaj

दयानंद सरस्वती ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और अनेकों नगर में आर्यसमाज की शाखा स्थापित किये। धीरे-धीरे आर्यसमाज की ख्याति फैल गयी। इस प्रकार इसका विस्तार भारत के अलावा मलाया, थाईलेंड, अफ्रीका सहित दुनियाँ के कई देश में हो गया।

स्वामी दयानंद सरस्वती की रचनायें –

स्वामी सरस्वती का जन्म गुजरात में हुआ था लेकिन उन्होंने अपनी रचना हिन्दी भाषा में की। यद्यपि वे संस्कृत के विद्वान थे लेकिन अंग्रेजी में भी उनकी पकड़ कम नहीं थी।

अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेकों ग्रंथ की रचना की। उनकी रचनाओं में ‘सत्यार्थप्रकाश’, संस्कार विधि तथा ‘ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका’ सवसे ज्यादा प्रसिद्ध है। इसके अलाबा उनके महत्वपूर्ण रचना में 1879 ईस्वी में रचित आत्मचरित भी मानी जाती है।   

  • ‘सत्यार्थप्रकाश’,
  • संस्कार विधि
  • ‘ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका’
  • आत्मचरित

स्वामीजी द्‌वारा रचित ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ संपूर्ण आर्यसमाज का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। इसमें वैदिक धर्म की उच्चता, वैदिक धर्म के दर्शन आदि का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। वैदिक ज्ञान और वैदिक धर्म अन्य सभी धर्मों में श्रेष्ट क्यों है, इस वारें में इस ग्रंथ में स्पष्ट विवेचना की गई है।

दयानंद सरस्वती के कुछ विचार – Swami Dayanand Saraswati quotes in Hindi

  • सभी सत्य, विध्या और जो चीज विध्या से प्राप्त होते हैं उन सबका आदि मूल परमपिता परमेश्वर है। अगर मनुष्य का मन शाँन्त है, चित्त प्रसन्न है, ह्रदय प्रफुलित  है, तो निश्चय ही ये उनके अच्छे कर्मो का फल है।
  • ये ‘शरीर’ ‘नाशवान है, हमे इस शरीर के द्वारा सिर्फ एक मौका मिला है, खुद को साबित करने का कि, ‘मनुष्यता’ तथा आत्म-विवेक  क्या है?
  • ईष्या से मनुष्य को हमेशा दूरी बनाकर रहना चाहिए। क्योकि ये मनुष्य  को भीतर ही भीतर जलाकर तथा पथ से भटकाकर पथ भ्रष्ट कर देती है।
  • भगवान सच्चिदानंद स्वरूप, अजन्मा, निराकार, सर्वशक्तिमान, अजर, अमर, अनंत सृष्टिकर्ता हैं। वेदों में सभी सत्य-ज्ञान निहित है। वेदो का पठन, पाठन और श्रवण आर्यों का परम धर्म है।
  • असत्य का परित्याग और सत्य को ग्रहण करने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिये। मनुष्य को सभी कार्य सत्य और असत्य का विचार कर धर्मानुसार कारण चाहिए।
  • सभी को केवल अपनी भलाई और उन्नति के लिए तत्पर न होकर, सबकी भलाई में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

दयानंद सरस्वती का निधन

कहते हैं की दयानंद सरस्वती को किसी ने धोखे से विषपान करा दिया, जिस कारण वे विमार रहने लगे। आधुनिक भारत के महान समाज-सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी का देहावसान 1883 में हुआ था।

उन्होंने 30 अक्टूबर 1883 ईस्वी को दीपावली के दिन राजस्थान के अजमेर में अंतिम सांस ली। इस प्रकार 62 वर्ष की अवस्था में वे अपने देह का परित्याग कर दिए। लेकिन फिर भी विष पिलाने वाले आदमी को उन्होंने दिल से माफ कर दिया।

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महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2022 में कब है? (Maharishi Dayanand Saraswati jayanti 2022

उत्तर – महान समाज सुधारक महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती वर्ष 2022 में 26 फ़रवरी दिन शनिवार को मनाई जाएगी।

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म कब और कहां हुआ था

स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जन्म 12 फ़रवरी 1824 ईस्वी को गुजरात के राजकोट के पास काठियावाड़ में हुआ था।

स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु कब और कहां हुई

स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को राजस्थान के अजमेर में हुई।

आपको स्वामी दयानंद सरस्वती जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi ) शीर्षक वाली जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी अपने सुझाव से अवगत करायें।

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