भारत में हरित क्रांति के जनक वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का जीवन परिचय

भारत में हरित क्रांति के जनक वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का जीवन परिचय

देश के मशहूर कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति के जनक कहा जाता है। वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का जीवन परिचय शीर्षक वाले इस लेख में जानेंगे की 60 के दशक में कैसे उनका भारत में आनज की कमी को दूर करने में बहुत बड़ा योगदान रहा है।

भारत में गेहूं और चावल की अधिक उपज देने वाली उन्नत किस्मों के विकास का श्रेय प्रोफेसर स्वामीनाथन को जाता है। उन्हें की सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित क्या गया।

वर्ष 1987 में प्रथम विश्व खाद्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाले प्रोफेसर स्वामीनाथन को थे। यह सम्मान कृषि के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। इसके अलावा उन्हें प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और विज्ञान के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व पुरस्कार भी मिला।

इसके अलावा प्रोफेसर स्वामीनाथन को टाइम पत्रिका ने 20वीं सदी के 20 सबसे प्रभावशाली एशियाई लोगों की सूची में उनका नाम रखा।

वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का जीवन परिचय – MS Swaminathan in Hindi

एम.एस.स्वामीनाथन (M S Swaminathan in Hindi ) की गिनती भारत के महान कृषि वैज्ञानिक के रूप में की जाती है। इन्हीं के कोशिस के कारण ही 60 के दशक में भारत में हरित क्रांति सफल हो सका था.

इस कारण डॉ एम.एस.स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति का जनक माना जाता है। हमारा देश भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या के जीविका का स्रोत कृषि है।

देश की आजादी के लगभग 18 साल बाद, 60 के दशक के दौरन देश में अनाज का उत्पादन काफी कम हो गया था। अकाल की स्थिति उत्पन्न हो चली थी। विशाल जनसंख्या वाले हमारे देश भारत में खाद्य पदार्थों की कमी की हो गई थी।

उस बक्त डॉ. स्वामीनाथन भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक पद पर आसीन थे। इस विषम परिस्थिति में कृषि वैज्ञानिक एम.एस.स्वामीनाथन ने इस समस्या से देश को निजाद दिलाया। डॉ. स्वामीनाथन ने अपने अनुसंधान और प्रयास से देश में हरित क्रांति ला दिया।

भारत में हरित क्रांति के जनक - MS SWAMINATHAN IN HINDI
भारत में हरित क्रांति के जनक – MS SWAMINATHAN IN HINDI

उनके अहम प्रयास का प्रतिफल था की देश में खाद्य पदार्थों का उत्पादन कई गुण बढ़ गया। इन्होंने गेहूं, चावल और आलू की भी कई उन्नत किस्म का विकास किया। इस कारण खाध्य पदार्थों के पैदावार में अपार बढ़ोतरी हुई। इस प्रकार एमएस स्वामीनाथन का संबंध हरित क्रांति से है। 

स्वामीनाथन का प्रारम्भिक जीवन

एमएस स्वामीनाथन का पूरा नाम मंकॉम्बो सम्बासीवन स्वामीनाथन(Mankombu Sambasivan Swaminathan) था। बचपन से इनका रुझान कृषि की तरफ था। स्वामीनाथन का जन्म तमिलनाडु के कुंभकोणम में 7 अगस्त 1925 को हुआ था।

बंगाल के भीषण आकाल के बारें में पढ़ चुके थे। अनाज उत्पादन के क्षेत्र में वे भारत को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा तमिलनाडू में ही हुई थी। वे गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन से बहुत प्रभावित थे।

उन्होंने तमिलनाडु से कृषि में ग्रैजूइट की डिग्री हासिल की। पोस्ट ग्रैजूइट के बाद वे पी-एच.डी. के लिए इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन करने लगे। इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे भारत लौट आए।

यहाँ उन्होंने कई साल तक भारत के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में कार्य किया।  इन्होंने गेहूँ, चावल और आलू की अनेक किस्में विकसित कीं।

स्वामीनाथन का योगदान

साठ के दशक में विश्व प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक बोरलॉग द्वारा ‘मैक्सिकन ड्वार्फ’ नामक एक उन्नत किस्म की गेहूँ के बीज का आविष्कार किया। स्वामीनाथन साहब ने पाया की गेहूँ की वह किस्म भारत की मिट्टी में भी अच्छी पैदावार दे सकती है।

उन्होंने अपने अनुसंधान में यह पता लगाया की गेहूँ की यह ड्वार्फ किस्म हमारे देश में अनाज की समस्या के समाधान में मदद कर सकती है। इस प्रकार डॉ स्वामीनाथन के आग्रह पर नोबेल पुरस्कार विजेता विश्व प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक बोरलॉग को भारत बुलाया गया।

उन्होंने बोरलॉग से यहाँ की मिट्टी और जलवायु के बारे में कई विचार विमर्श किये। बोरलॉग से उन्होंने ढेर सारी जानकारी प्राप्त की। एम एस स्वामीनाथन ने सन 1966 में बोरलॉग द्वारा आविष्कार किये गये मैक्सिको के गेहूँ के बीज के साथ एक अनुसंधान किया।

उन्होंने मैक्सिको के गेहूँ के बीज को भारत के पंजाब की घरेलू किस्म की गेहूँ के बीज के साथ मिश्रित कर एक नए किस्म के गेहूँ के संकर बीज का विकास किया। इस करना पैदावार में भारी बृद्धि हुई और भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई।

इस प्रकार एम एस स्वामीनाथन के अहम योगदान के कारण भारत में 60 के दशक से ही कृषि के क्षेत्र में नई तकनीक का प्रयोग शुरू हो गया। डॉ स्वामीनाथन ने भारत में कृषि उत्पादन बढ़ाकर अनाज के क्षेत्र में देश को आत्म-निर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चलाईं।

भारत में हरित क्रांति के जनक

भारत के आनुवांशिक विज्ञानी (जेनेटिक वैज्ञानिक) स्वमीनाथन के निर्देशन में देश में संकर किस्म के गेहूँ के बीज से खेती की गई। इस बीज के द्वारा खेती करने से देश में गेहूँ का उत्पादन कई गुण बढ़ गया।

देश में गेहूँ उत्पादन इतना हुआ की मानो कृषि के क्षेत्र में क्रांति सी आ गई। इस प्रकार डॉ स्वामीनाथन के अथक प्रयास के फलस्वरूप  देश में गेहूँ का उत्पादन काफी बढ़ गया।

भारत के विशाल आबादी को अनाज की समस्या का समाधान मिला। देश का खाली पड़ा अन्न का भंडार भर गया। इस प्रकार देश की अर्थ व्यवस्था पटरी पर लौट गई।

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स्वामीनाथन को सम्मान व पुरस्कार-

कृषि विज्ञान के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए एमएस स्वामीनाथन को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया।

भारत सरकार ने उन्हें सन 1967 में पद्ध श्री और सन 1972 ईस्वी में देश के बड़े सम्मान पद्ध भूषण और 1989 में उन्हें पद्ध विभूषण से अलंकृत किया। इसके साथ ही इन्हें बीरबल साहनी मैडल, शांति स्वरूप भटनागर सम्मान और मैन्डल मेमोरियल पुरस्कार से अलंकृत किया गया।

सन् 1971 ईस्वी में प्रसिद्ध रेमन  मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन्हें सन् 1973 ईस्वी में लंदन के रॉयल सोसाइटी ने अपना सदस्य (फैलो) बनाया। इसके अलाबा दुनियाँ के 14 और प्रसिद्ध विज्ञान संस्थान ने एमएस स्वामीनाथन को अपना फ़ेलो चुना।

उन्हें सन 1986 में अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व विज्ञान पुरस्कार, सन 1987 में प्रथम विश्व खाध पुरस्कार मिला। इसके साथ ही उन्हें अमेरिका का टाइलर, जापान का होंडा, फ्रांस का ‘ऑर्डर टू मेरिट एग्रीकोल’ तथा सन 1999 में यूनेस्को गांधी स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।

दुनियाँ के सबसे प्रसिद्ध टाइम मेगजीन ने उन्हें वर्ष 1999 में उन्हें 20 वीं सदी के टॉप 20 एसिया महादेश के प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया।

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कैरियर

महान वनस्पति वैज्ञानिक सवामीनाथन यूपीएससी के तहद आईपीएस के लिए भी परीक्षा पास की थी। लेकिन उन्होंने कृषि विज्ञान को ही अपना कैरियर चुना। इस प्रकार आगे चलकर वे एक जेनेटिक्स वैज्ञानिक के रूप में भारत को गौरान्वित किया।

इन्हें फिलिपीन्स में स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के  निदेशक के पद पर भी कार्य करने का मौका मिला। सन 1965 से सन 1971 तक वे भारत के पूसा संस्थान के डायरेक्टर रहे। इसके साथ ही वे सन 1979 से 1982 ईस्वी तक भारत के योजना आयोग के सदस्य रहे।

अंत में –

एमएस स्वामीनाथन का संबंध भले ही हरित क्रांति था। लेकिन इसके अलाबा वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रबंधक और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। इन्होंने उच्च-उत्पादन क्षमता वाले गेहूँ के किस्म का विकास किया।

आनज उत्पादन के दिशा में भारत को 25 वर्ष से काम समय में आत्म निर्भर बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें पूरे भारत में ‘कृषि क्रांति आंदोलन’ के वैज्ञानिक के रूप में ख्याति मिली।

वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का निधन –

भारत मे हरित क्रांति के जनक के नाम से प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन का 98 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्हें फादर ऑफ ग्रीन रिवॉल्यूशन के नाम से पुकार जाता है। वे लंबे समय से विमार चल रहे थे।

उनके अहम प्रयास से ही देश में हरित क्रांति सफल हुई और देश में कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर हो सका। कृषि के क्षेत्र में वनस्पतिक वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।  

प्रधान मंत्री सहित की गण्यमान्य व्यक्ति ने वैज्ञानिक स्वामीनाथन के निधन पर शोक जताया।

F.A.Q

  1. भारत में हरित क्रांति के जनक कौन हैं?

    भारत में हरित क्रांति के जनक एम एस स्वामिनाथन को कहा जाता है। वे एक महान पौधों के जेनेटिक वैज्ञानिक हैं।

  2. भारत में हरित क्रांति की शुरुआत कहाँ से हुई?

    भारत की हरित क्रांति की शुरुआत पंजाव से हुई थी। एम एस स्वामिनाथन के सहयोग से पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ विदेशी किस्म के बीज को मिश्रित कर उच्च पैदावार वाले गेहूं के नए बीज का विकास किया गया।

  3. एम एस स्वामिनाथन का जन्म कहाँ हुआ?

    एम एस स्वामिनाथन जन्म 7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के कुम्भकोणम में हुआ था। उन्हें भारत के हरित क्रांति का जनक माना जाता है।

  4. एम एस स्वामीनाथन का पूरा नाम क्या है?

    भारत के महान कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन का पूरा नाम ‘मंकोम्बो सम्बासीवन स्वामीनाथन’ था।

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