Sri Chaitanya Mahaprabhu in Hindi – चैतन्य महाप्रभु जीवन परिचय

Sri Chaitanya Mahaprabhu In Hindi – चैतन्य महाप्रभु जीवनी

चैतन्य महाप्रभु, भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त और भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। वे 16 वीं शताब्दी के महान संत थे। जिन्हें अचिंत्य भेदाभेद के प्रवर्तक माने जाते हैं।

उन्होंने हरीनाम संकीर्तन (hari naam sankirtan )द्वारा भक्तियोग का प्रचार कर जन-जन तक पहुंचाया। प्रेम तथा भक्ति चैतन्य प्रभु के मुख्य आधार थे। कहते हैं की बंगाल में भागवत भक्ति के प्रचार-प्रसार का सम्पूर्ण श्रेय चैतन्य प्रभु को ही जाता है।

वैष्णव समुदाय के लोग चैतन्य महाप्रभु को भगवान श्री कृष्ण का अवतार मानते हैं। कहते हैं की भगवान श्री कृष्ण को राधा जी ने एक बार कहा था। आप एक बार राधा बनकर देखो तब हमारी विरह वेदना तुम्हें समझ आएगी।

Sri Chaitanya Mahaprabhu In Hindi -  चैतन्य महाप्रभु जीवनी
Sri Chaitanya Mahaprabhu In Hindi – चैतन्य महाप्रभु जीवनी

तब भगवान श्री कृष्ण ने राधा को बचन दिया था की ठीक हैं, कलयुग में हम जन्म लेंगे। उस बक्त शरीर तो कृष्ण का होगा लेकिन मन राधा की होगी।

श्रीकृष्ण दास द्वारा लिखित ‘चैतन्य चरितामृत’ में भगवान चैतन्य के जीवन के समस्त घटनाओं का जिक्र मिलता है। चैतन्य प्रभु (Chaithanya ) के बचपन का नाम विशंभर था। लेकिन वे निमाई, गौर, गौरहरी, गौरांग जैसे कई नामों से प्रसिद्ध हुए।

चैतन्य महाप्रभु जीवन परिचय – Biography of Shri Chaitanya Mahaprabhu in Hindi

चैतन्य महाप्रभु का जन्म 18 फरवरी 1486 ईस्वी में आधुनिक पश्चिम बंगाल के नादिया नामक स्थान पर हुआ था। चैतन्य चरितामृत के अनुसार उनका जन्म सिंह लग्न में फाल्गुन मास के पूर्णिमा के दिन हुआ था।

कहते हैं की संध्याकाल में जब उनका जन्म हुआ था, उस समय चंद्र ग्रहण लगा हुआ था। बंगाल में उनके जन्म स्थान को अव मायापुर के नाम से जाना जाता है।

चैतन्य महाप्रभु के माता का नाम सचि देवी और पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र था। चैतन्य प्रभु अपने माता पिता का द्वितीय पुत्र था।

माँ के कोख में 13 माह बिताये?

चैतन्य महाप्रभु Chaitanya Mahaprabhu के जन्म की कहानी भी बहुत अद्भुत है, आइये जानते हैं। कहते हैं की चैतन्य महाप्रभु के माता-पिता बंगाल के सिलहट नामक स्थान से आकर नवद्वीप में बसे थे।

उनकी माता सचि देवी के गर्भ से लगातार आठ कन्याएं का जन्म हुआ। लेकिन संयोगबस सभी कन्यायें पैदा होने के कुछ दिन बाद ही मर जाती थी। आठ कन्याओं के बाद उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई।

उसका नाम विश्वरूप रखा गया। विश्वरूप के थोड़ा बड़ा होने के बाद सचि देवी ने अपने दूसरे पुत्र को जन्म दिया। घर में खुशी का ठिकाना न था। कहते हैं की बालक अपने माँ के गर्भ में 9 महिने नहीं बल्कि 13 महिने रहा।

उनके जन्म लेने के बाद ज्योतिषी को कुंडली बनाने के लिए बुलाया गया। ग्रह और नक्षत्र के लेखा जोखा के आधार पर ज्योतिष ने भविष्यवाणी की। ज्योतिष ने कहा की यह बालक आगे चलकर बहुत बड़ा महापुरूष सबित होगा।

इस बालक का नाम ज्योतिष ने विश्वंभर रखा। लेकिन प्यार से इनके माता-पिता इन्हें ‘निभाई’ कहकर बुलाते थे। यही निमाई आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

शिक्षा दीक्षा – Chaithanya mahaprabhu

कहते हैं की निमाई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। 5 वर्ष की आयु में उनकी शिक्षा शुरू हुई थी तथा 9 वर्ष की आयु में उनका उपनयन संस्कार हुआ था। बचपन से ही वे अत्यंत ही शांत चित और सरल थे।

इन्होंने संस्कृत व्याकरण, न्याय और तर्कशास्त्र के साथ श्रीमद्भागवातगीता का व्यापक अध्ययन किया। इनकी विलक्षण प्रतिभा को देखकर हर कोई हतप्रभ रह जाता था। https://nikhilbharat.com/biography-of-chaitanya-mahaprabhu-in-hindi/

उन्हें शास्त्रार्थ के क्षेत्र में महारत हासिल थी। कहते हैं की उन्होंने मात्र 16 वर्ष की आयु में अपना पाठशाला खोलकर संस्कृत की शिक्षा देते थे।

विवाह

कहते हैं की मात्र 16 वर्ष की उम्र में Sri Chaitanya Mahaprabhu का विवाह वल्लभाचार्य की कन्या लक्ष्मीप्रिया के साथ सम्पन हुआ। कहते हैं की उनकी पत्नी लक्ष्मीप्रिया की सर्पदंश से मृत्यु हो गई।

अपनी माता के आग्रह पर उनका दूसरा विवाह सनातन मिश्र की कन्या विष्णुप्रिया के साथ हुआ।

सन्यास ग्रहण करना

निमाई (Chaitanya Mahaprabhu के बचपन का नाम ) अपने पिता के मृत्यु के बाद उनके पिंड दान के लिए विहार के गया नामक स्थान पर गये। वही पर उन्होंने ईश्वरपुरी को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा प्राप्त की।

कहते हैं की अपने गुरु ईश्वरपुरी से प्रेरणा स्वरूप ही उनके अंदर श्री कृष्ण के प्रति भक्ति भावना प्रकट हुई। उसके बाद वे कृष्ण की भक्ति और श्रीमद्भागबत गीता के प्रचार-प्रसार में लग गये।

सन 1510 ईस्वी में उन्होंने केशव भारती से सन्यास की दीक्षा ग्रहण की। उस बक्त निमाई की उम्र मात्र 24 वर्ष की थी। सन्यास दीक्षा के बाद उन्होंने गृह त्याग कर हरी गुण गाने लगे। 

संत केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद वे निमाई से चैतन्य महाप्रभु के नाम से मशहूर हो गये।

कृष्ण के परमभक्त

सन्यास ग्रहण के बाद Chaitanya Mahaprabhu कृष्ण भक्ति मे लीन हो गये। वे हरी नाम संकीर्तन के द्वारा कृष्ण को पुकारते हुए प्रभु प्रेम की मस्ती में डूब जाते। उनके संकीर्तन और कृष्ण की प्रति अपार श्रद्धा ने लोगों को बहुत प्रभावित किया।

उनके प्रभु प्रेम और विलक्षण व्यक्तित्व लोगों को वरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता। इसका प्रभाव हुआ की आम जन के साथ कुछ साधु-सन्यासी भी उनसे जुडते गये। इस प्रकार धीरे-धीरे उनके शिष्यों की संख्या बढ़ने लगी।

कृष्ण भक्ति के लिए हरे कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे-राम, हरे-राम, राम राम, हरे हरे। जपने का महामंत्र दिया। कलयुग में जीवात्मा के उद्धार हेतु इस मंत्र को तारक ब्रह्म-महामंत्र  की संज्ञा दी गयी।

वे कृष्ण की भक्ति में ऐसे नाचते और गाते थे की सारा सुध-बुध खो देते थे।

जीवन का एक मात्र लक्ष्य

श्री महाप्रभु चैतन्य के जीवन का मात्र लक्ष्य लोगों में कृष्ण भक्ति और संकीर्तन का प्रसार-प्रचार करना था। उनके दृष्टि में सभी धर्म बराबर हैं वे सभी धर्मों का आदर करते थे।

उन्होंने हरिनाम संकीर्तन के द्वारा कृष्ण की भक्ति के प्रचार के लिए अद्वैताचार्य, नित्यानंद प्रभु, रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को लगाया। जिन्होंने समस्त भारत के सुदूर गाँव तक इसका प्रचार किया।

तत्पश्चात चैतन्य महाप्रभु ओडिसा चले गये। जहॉं कहते हैं की लगातार 12 वर्षों तक उन्होंने भगवान जगन्नाथ की भक्ति और आराधना की।

भारत के बाहर इनका प्रभाव

श्रील प्रभु पाद जो एस्कान के संस्थापक माने जाते हैं। उन्होंने चैतन्य प्रभु का कृष्ण के प्रति भक्ति धारा और वैष्णव मत का सुदूर पश्चिमी देशों तक प्रसार किया।

उनके द्वारा चैतन्य महाप्रभु के जन्म स्थल बंगाल  के मायापुर में विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण संभव हुआ।

प्रमुख ग्रंथ

महाप्रभु चैतन्य के जीवन पर आधारित प्रमुख ग्रंथ में चैतन्य चरितामृत, चैतन्य भागवत और चैतन्य मंगल  प्रमुख माने जाते हैं।

निधन – chaitanya mahaprabhu death

चैतन्य प्रभु सन 1515 ईस्वी में वृंदावन आए और यहॉं कुछ वर्षों तक कृष्ण भक्ति में बिताया। कहते हैं की 14 जून 1534 ईस्वी में जगन्नाथपुरी में रथ यात्रा के दिन उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया।

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उपसंहार –  conclusion

चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रारंभ किए गए कृष्ण भक्ति और संकीर्तन का प्रभाव अमेरिका सहित विश्व के कई देशों तक हुआ। कहते हैं की यदि चैतन्य प्रभु नहीं होता तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता।

जब वे कृष्ण की भक्ति करते तब वे मानो जैसे खो जाते। वे अपने शिष्यों के साथ ढोल, मंजीरा बजाकर उच्च स्वर में गाते और नाचते थे। कहते हैं की उन्हें देखकर  लगता था की वे साक्षात श्रीकृष्ण को बुला रहे हों।

दोस्तों चैतन्य महाप्रभु की जीवनी Sri Chaitanya Mahaprabhu In Hindi का यह लेख आपको कैसा लगा। अपने सुझाव से जरूर अवगत करायें।

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