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झांसी की रानी वीर मनु की कहानी – ABOUT JHANSI KI RANI IN HINDI

about Jhansi ki rani in Hindi -झांसी की रानी वीर मनु की कहानी में हम रानी लक्ष्मी बाई के बचपन से लेकर वीर गति के प्राप्ति तक की संपर्ण जीवन गाथा का के बारें में विस्तार से जानेंगे। झांसी अंग्रेजों के आँखों की किरकिरी बनी हुई थी।

अंग्रेजों ने झांसी पर चढ़ाई कर दी। झांसी की सेना ने रानी के नेतृत्व में भयंकर युद्ध हुआ। लेकिन चंडी के तरह दुश्मन का संहार कर रही थी। लेकिन अंत में झांसी की रानी लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त हो गई।

लेकिन उन्होंने अंग्रेजों के बिरुद्ध जो मशाल की लौ जलाई उस मशाल की लौ तब तक जलती रही जब तक हमारा देश भारत अंग्रेजों के दस्ता से मुक्त नहीं हो गया। आज हम इस आर्टिकल्स में उनके जन्म से लेकर वीरगति तक की गाथा को जनेगे।

झांसी की रानी वीर मनु की कहानी - ABOUT JHANSI KI RANI IN HINDI
प्रतीकात्मक चित्र – झांसी की रानी

झांसी की रानी वीर मनु का बचपन (Jhansi Ki Rani Veer Mannu Ki bachpan ki Kahani )

लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को तीर्थ नगरी वराणसी मे एक मराठी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे और माँ का नाम भागीरथी बाई था। वे मूलतः सतारा के वासी थे। लेकिन मोरोपंत ताम्बे जीविका की खोज में काशी आ गये।

लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था और उनके माता-पिता प्यार से उन्हें मनु (Mannu )कहकर बुलाते थे। उनकी माता भागीरथी बाई एक धर्म-प्रयाण और विदूसी महिला थी। बचपन से ही वे मनु (Mannu ) को विरागनाओं की गाथाएं सुनाया करती।

फलतः लक्ष्मीबाई के मन में वचपन से ही स्वदेश प्रेम और वीरता की भावना कूट-कूट भरी हुई थी। कहते हैं की जब मनु (Mannu ) की आयु मात्र 6 वर्ष की थी, तब उनकी माता इस दुनियाँ से चल वसी। इस प्रकार मनु का लालन-पालन उनके पिता ने किया।

उनके पिता मोरोपंत ताम्बे बिठूर रियासत के पेशवा के यहॉं काम करते थे। माँ की मृत्यु के वाद मनु बिठूर में अपने पिता के पास ही रहने लगी। उनका अधिकांश समय अपने पिता के साथ राज दारवार में ही व्ययतीत होने लगा। इस प्रकार उनका लालन पालन बाजीराव पेशवा के संरक्षण में ही हुआ।

वचपन से ही मनु चंचल स्वभाव की थी। जिस के कारण उन्हें दरवार में लोग छबीली के नाम से पुकारते थे। मनु इस प्रकार दरवार में पेशवा के पुत्र नाना साहब के साथ पढ़ी, खेली और बड़ी हुई। बचपन में ही इन्होंने तीर-भाला चलना, घूड़्सवारी आदि में महारत हासिल कर ली थी।

अक्सर वे बच्चों को जमा कर युद्ध कला आदि का खेल खेल में अभ्यास करती थी। इस प्रकार मनु वचपन में ही युद्ध की सारी कलाओं में परांगत हासिल कर ली।

झांसी की रानी की शादी (Jhansi Ki Rani Veer Manu Ki Kahani )

बड़ी होने पर मनु का विवाह बिठूर के राज ज्योतिषी की सलाह पर झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से कर दिया गया। इस प्रकार वे झांसी की रानी बनी। विवहा के पश्चात उनका नाम मनु से रानी लक्ष्मीबाई हो गया।

गंगाधर राव अपनी रानी से बहुत प्यार करते थे। कुछ महीनों के बाद रानी लक्ष्मीबाई को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हई। लेकिन दुर्भाग्यवश वह बालक अल्पायु में ही संसार को छोड़कर चल बसा। रानी और गंगाधर राव इस सदमें के कारण टूट गये।

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई द्वारा बच्चा गोद लेना। about rani lakshmi bai in hindi

सदमें के कारण राजा की तबीयत दिन-प्रतिदिन बिगरती ही जा रही थी। राजा गंगाधर राव की विगरती तवीयत के कारण उनके मंत्रियों ने उन्हें राज्य के वारिस हेतु एक बच्चे को गोद लेने की सलाह दी।

मंत्रीगण की सलाह पर उन्होंने झांसी के उत्तराधिकारी के लिए एक बालक को गोद लेने का निश्चय किया। राजा गंगाधर राव ने अपने परिवार के बालक आनंद राव को गोद लेकर उन्हें झांसी के उत्तराधिकारी घोषित किया। इस प्रकार अपने दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा।

झांसी का वारिस और दामोदर राव जैसा दत्तक पुत्र को पाकर रानी लक्ष्मीबाई बेहद खुश थी। हालांकि इस समय ब्रिटिश सरकार, राजे-रजवाड़ों द्वारा गोद लेने की प्रथा पर बेहद सख्त थे।

इस बात की आशंका का ध्यान रखते हुए राजा दामोदर राव ने गोद लेने की सारी रस्में, झांसी में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों की उपस्थित में सम्पन की। बकायदा गोद लेने के वाद, वसीयत से जुड़ी सारी जानकारी से तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी को अवगत भी कराया गया।

राजा गंगाधर राव का आकस्मिक निधन

इधर दिन-प्रतिदिन राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। एक दिन अचानक राजा गंगाधर राव की तवीयत बहुत अधिक खराव हो गयी। आखिर जिस बात की आशंका थी, वही घटित हुआ। 21 नवंबर 1853 को उनका निधन हो गया।

महाराज की मृत्यु की खवर से पूरी झांसी शोक सागर में डूब गयी। राजा गंगाधर राव की मृत्य झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को झकझोड़ कर रख दिया वे अंदर से टूट सी गयी।

अंग्रेजों द्वारा दत्तक को झांसी का उतराधिकारी मानने से इनकार

इधर राजा गंगाधर राव के मृत्यु के बाद, झांसी की रानी को असहाय एवं अनाथ समझकर अंग्रेजों की नियत बदल गयी। वे अपने विस्तारवादी नीति के तहद झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाना चाहा।

ब्रिटिश सरकार ने Jhansi ki rani laxmi bai के दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी के राजा की निजी संपत्ति का इकलौता वारिस तो मान लिया। लेकिन उन्हें बतौर झांसी का उतराधिकारी स्वीकार करने से मना कर दिया।

तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने उनके दत्तक पुत्र को अवैधानिक धोषित कर दि। उन्होंने डॉक्टराइन ऑफ लैप्स नीति का हवाला देकर झांसी को ब्रिटिश राज्य में विलय का फरमान जारी कर दिया।

लैंग जॉन से मुलाकात और रानी द्वारा मुकदमा दर्ज कराना

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की कहानी में आगे जानेंगे की रानी का ऑस्ट्रेलियन वकील लैंग जॉन से मुलाकात और लंदन में मुकदमा दर्ज कराना।

तत्कालीन वायसराय के विरोध के बावजूद रानी लक्ष्मीबाई हिम्मत नहीं हारी और डॉक्टराइन ऑफ लैप्स नीति के विरुद्ध लंदन की अदालत में मुकदमा दायर कर अपना पक्ष रखने की कोशिस की। इसके लिए ऑस्ट्रेलियन वकील लैंग जॉन को कानूनी मदद के लिए महल मे बुलाया गया।

लैंग उस समय भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की के विरुद्ध मुकदमा लड़ने के लिए मशहूर थे। महल में आगमन पर उनका शानदार स्वागत किया गया। 22 अप्रेल 1854 को लैंग ने रानी के इच्छा के अनुसार लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया गया।

लेकिन हुआ वही जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही थी। लंदन की अदालत में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के द्वारा दायर मुकदमे को खारिज कर दिया गया। रानी ने दोबारा कोर्ट में अपील की और इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।

लैंग जॉन की पुस्तक में रानी लक्ष्मीबाई से मुलाकात का जिक्र

लैंग जॉन के किताब “वांडरिंग्स इन इंडिया एंड अदर स्केचेज ऑफ लाइफ इन हिंदुस्तान” में रानी लक्ष्मीबाई के साथ उनकी मुलाकात का वर्णन मिलता है। लैंग जॉन ने अपने किताब में लिखा है। झांसी पहुचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया।

लैंग अपने किताब में लिखते हैं की रानी से मुलाकात वाले कमरे के एक तरफ पर्दा लगा हुआ था। उस पर्दे के पीछे खड़ी होकर रानी अपनी बात बता रही थी। तभी अचानक से उनका दत्तक पुत्र बालक दामोदर ने पर्दा हिला दिया, जिससे मैं रानी की एक झलक देख पाया।

लैंग लिखते हैं, रानी एक मध्यम कदकाठी की महिला थीं। उनके चेहरे पर अब भी काफी तेज था। वे न तो ज्यादा सांवली थीं और न ही बहुत ही गोरी। उस बक्त वे सफेद परिधान में थी और कानों में स्वर्ण बालियों के अलावा उनके तन पर कोई आभूषण नहीं था।

मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’-रानी लक्ष्मी बाई

लैंग ने रानी को सलाह दी कि उन्हें अपने दत्तक पुत्र के अधिकार के लिए याचिका दायर करें। लेकिन अभी अंग्रेजों की बात मान कर पेंशन लेते रहना चाहिए। लैंग आगे लिखते हैं, रानी ने इस बात पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा, “मैं अपनी झांसी नहीं दूँगी”।

मैंने उन्हें बहुत विनम्रता से समझाने का प्रयास किया। कहा कि इस विद्रोह का कोई मतलब नहीं निकलेगा। अंग्रेजी फौज ने आपको तीन तरफ से घेर लिया है। उनसे विद्रोह आपकी आखिरी उम्मीद को भी खत्म कर देगा।

वह मेरी ज्यादातर बातों के लिए राजी हो गई। सिवाय ब्रिटिश सरकार से अपनी पेंशन लेने की। जॉन लैंग ने उन्हें इस मामले में फ़िलहाल चुप रहने की सलाह दी। इसलिए शुरू के दौर में रानी ने भी ब्रितानियों के साथ बातचीत से मसला सुलझाने की कोशिश की।

अंग्रेजों द्वारा रानी को महल छोड़ने का आदेश

रानी लक्ष्मीबाई को किला छोड़कर झांसी में स्थित रानी महल में जाने का आदेश दे दिया गया। रानी को महल छोड़ने का फरमान जारी कर अग्रेजों ने राज्य के खजाने पर कब्जा कर लिया। रानी को उनकी गुजर-भत्ता के रूप में 5000 रुपए प्रति महीने की पेंशन निर्धारित कर दी गई।

अंग्रेज अधिकारी कैप्टन अलैक्जेंडर स्कीन को झांसी की जिम्मेदारी सौंप दी गयी। किन्तु रानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों को पैगाम भेजा की की ‘झांसी मेरे है, मेरे जीते जी इसे मुझसे कोई नहीं छिन सकता‘। रानी ने पेंशन लेने से इनकार कर दिया।

लेकिन बक्त की नजाकत को समझते हुए रानी लक्ष्मी बाई को झाँसी का क़िला छोड़ कर रानी महल में जाना पड़ा। लेकिन रानी लक्ष्मीबाई हिम्मत कहाँ हारने वाली थी। उन्होनें हर हाल में अपने राज्य की रक्षा करने का प्रण लिया।

रानी द्वारा दुर्गा दल नामक महिला सैन्य दस्ता का गठन

रानी ने सोची की अंग्रेजों बड़े ही कूटनीतिज्ञ हैं। अतः इनके साथ कूटनीति से ही काम लेना चाहिए। रानी लक्ष्मी बाई समझ चुकी थी कि झांसी का आत्मगौरव फिर से वापस पाने के लिए एक-न एक दिन ब्रिटिश फौजों से लड़ना ही होगा।

इसी बात का ध्यान रखते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने अपने रियासत की सुरक्षा को अंदर ही अंदर मजबूत करना शुरू कर दिया। गुप्त रूप से वे अपने शक्ति-संचय करने में जुट गयी। उन्होंने अपनी सेना में पुरुषों और महिलाओं दोनो को जगह दी।

उन्होंने दुर्गा दल के नाम से महिला का सैन्य दस्ता बनाया। इस दस्ते का प्रमुख रानी ने अपने हमस्कल झलकारी बाई को बनाया। इस प्रकार उन्होंने सेना के साथ आम जनता को संगठित कर युद्ध के लिए प्रशिक्षत किया।

इसमें रानी को गुलाम गौस ख़ान, खुदा बख्‍़श, सुंदर-मुंदर, काशी बाई, दीवान जवाहर सिंह, दीवान रघुनाथ सिंह और मोती भाई ने भरपूर सहयोग प्रदान किया।

अंग्रेजों के प्रति असंतोष की भावना

उस समय पूरे भारतबर्ष में अग्रेजों के विरुद्ध वगवात की आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी। नौगांव, बांदा, बानपुर, काल्पी, बुंदेलखंड सहित देश के कई भागों में अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध प्रतिशोध की आंच चरम पर थी।

रानी लक्ष्मी बाई देश की स्थिति पर लगातार नजर बनाई हुई थी। अग्रेजों के दमनकारी नीति से उतरी भारत के सभी राजे और महराजे में असंतोष की भावना व्याप्त थी। भारत के राजे महाराजे से लेकर आम जन अंग्रेजों से विद्रोह के लिए उतारू थे।

उधर अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाही भी इस महायज्ञ में अपनी आहुति देने को तत्पर थे। रानी लक्ष्मीबाई इसी अवसर का इंतजार कर रही थी। बेगम हजरत महल, मुगल सम्राट बहादुर साह जफर, वानपुर के राजा मर्दन सिंह और तात्या टोपे, नाना साहब आदि के साथ अग्रेजों के विरुद्ध संग्राम के लिए विचार-विमर्श किया गया।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तिथि का निर्धारण

सुनियोजित ढंग से समस्त भारत में अग्रेजों के विरुद्ध वगवात की तारीख 31 मई 1857 को निर्धारित की गयी। कहते हैं की यह तारीख रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह जफर, तात्या टोपे, वीर कुंवर सिंह आदि ने सोच समझकर निर्धारित की थी।

इस क्रांति के लिए ‘रोटी और खिला हुआ कमल’ को प्रतीक के तौर पर चुना गया। पूरे भारत में इसकी सूचना गुप्त रूप से भेज दी गयी। भारत की जनता में अंग्रेजों के प्रति इतना रोष था की क्रांति की शुरुआत के लिए नियत तिथि से पहले हो गयी।

29 मार्च 1857 को बैरक छावनी में चार अंग्रेज अधिकारियों को विद्रोहियों ने मार गिराया। 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सिपाही मंगल पांडे ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत कर दिया। रानी लक्ष्मी बाई मुख्य रूप से लेकिन गुप्त नीति से उस पर नजर रखे हुई थी।

इस प्रकार कानपुर, बैरकपुर, मेरठ, बिहार सहित भारत के समस्त भु-भाग में क्रांति की आग फैल गयी। ब्रिटिश सेना के कमांडर सर हुरोज ने अपनी सेना के द्वारा विद्रोह की इस ज्वाला को दमन करने का प्रयास किया, लेकिन विद्रोह की आग कम नहीं हुई।

इधर 5 जून को झांसी के किले में विद्रोहियों ने कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। रानी को अपने किले में वापस लाया गया। रानी ने शासन की डोर अपने हाथ में लेकर सेना को जोड़-शोर से संगठित करने लगी। किले में गोला बारूद कभी मात्रा में इकट्ठा किया गया।

अंग्रेजों के अलाबा झांसी के और कई दुश्मन

अंग्रेजों के अलावा झांसी के दुश्मन उसके पड़ोसी राजा सदाशिव थे। गंगाधर राव के समय से ही झांसी पर उनकी नजर थी। सदाशिव ने मौका पाकर झांसी पर हमला कर दिया। लेकिन झांसी के सैनिकों ने रानी के नेतृत्व में उनका मुकाबला इस प्रकार किया की उनके होश उड़ गये। इस प्रकार सदाशिव को युद्ध का मैदान छोड़कर भागना पड़ा।

उनका दूसरा दुश्मन था ओरछा का दीवान। वह भी बहुत दिनों से झांसी पर कब्जा करने का ख्वाब देख रहा था। उसने अपनी सेना से झांसी पर चढ़ाई की लेकिन उसका भी वही हश्र हुया जैसा सदाशिव के साथ हुआ था। उसने रानी के शक्ति से अंग्रेजों को अवगत कराया।

उसने रानी के खिलाफ अंग्रेजों को भड़काया की अगर समय रहते हमला नहीं किया तो रानी और मजबूत हो जाएगी तब झांसी को वापस लेना बेहद मुस्किल हो जाएगा।

झांसी में अंग्रेजों के साथ युद्ध – About Jhansi ki rani laxmi bai in Hindi

Jhansi Ki Rani Laxmi Bai - झांसी की रानी लक्ष्मीबाई
झांसी के किला का एक दृश्य
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अंतोगत्वा जनरल ह्यूरो़ज 21 मार्च 1858 को ब्रिटिश फौजों क साथ झांसी पर आक्रमण कर दिया। इधर झांसी की रानी पहले ही पूर्ण तैयारी के साथ बैठी थी। देखते-देखते घमासान युद्ध प्रारंभ हो गया।

रानी अपनी सेना के साथ दुर्ग में बड़ी सूझ-बुझ और सतर्कता के साथ युद्ध का संचलान कर रही थी। रानी के कुशल तोपची गुलाम गौस कहाँ खान धड़ाधड़ अंग्रेजों को उड़ा रहे थे। ब्रिटिश सेना के छक्के छूटने लगे, किन्तु शक्तिशाली अंग्रेज पीछे नहीं हटे।

कई दिन तक रानी के सेना ने ब्रिटिश सेना को उलझाए रखा। 21 मार्च से लेकर 3 अप्रैल तक अंग्रेजी सैनिकों के साथ रानी लक्ष्मीबाई का घनघोर युद्ध हुआ। इसी बीच दुर्ग के दक्षिण द्वारा पर तैनात विश्वासघाती देशद्रोही दुलहजी सरदार अंग्रेजों से मिल गए।

कहते हैं की उसने अंग्रेज सैनिकों को किले में चुपके से प्रवेश करा दिया। अग्रेज सैनिकों ने झांसी के महलों को आग लगा दी। इस स्थिति को देखते हुए रानी लक्ष्मीबाई अपने दतक पुत्र को लेकर किले से बाहर निकर आयी।

रानी दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधे तथा घोड़े की लगाम को मुंह में दबाये किले से निकल कर दुश्मनों से निर्भीकता पूर्वक लड़ती रही। अंग्रेजों के सैनिक ने रानी को पकड़ने को कोशश की, किन्तु शत्रुओं को संघार करती हुई रानी लक्ष्मीबाई आगे बढ़ती चली गई।

छोटी सी सैन्य टुकरी के साथ अंग्रेजों के संगठित फौज से लंबे समय तक लड़ना, रानी के लिए संभव नहीं था। इसलिये वे 03 अप्रैल 1858 की आधी रात के बक्त छोटी सी सैन्य टुकड़ी के साथ झांसी से निकल भागी।

Jhansi ki rani laxmi bai अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बाँधे हुये, कालपी की ओर रवाना हो गयी। काल्पी में उन्होंने तांत्या टोपे से मिलकर सहायता की अपील की।

रानी का अंग्रेजों से बचकर काल्पी पहुचना – Jhansi ki rani laxmi bai in Hindi

Jhansi Ki Rani Laxmi Bai - झांसी की रानी लक्ष्मीबाई
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भारतीय इतिहास की विशेषज्ञ और अमेरिकी लेखिका पामेला डी टॉलर अपने एक लेख ‘लक्ष्मीबाई : में लिखती हैं, की ‘अगले 24 घंटे में तकरीबन 102 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर रानी लक्ष्मी बाई काल्पी जा पहुंचीं।

काल्पी में लक्ष्मीबाई ने वीर तांत्या टोपे से मिलकर अंग्रेजों के साथ घमशन युद्ध किया। तात्या टोपे के हजारों बागियों की फौज रानी लक्ष्मीबाई का साथ दे रहे थे। तात्या टोपे के अलाबा यहॉं इनका साथ नाना साहेब पेशवा और राव साहब ने दिया।

अंतोगत्वा काल्पी पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया। लेकिन उसके पहले ही योजना के अनुसार Jhansi ki rani laxmi bai और उनके साथी अपनी सेना के साथ ग्वालियर की तरफ कूच कर चुके थे।

अंग्रेजों के साथ अंतिम जंग

अंग्रेजों को इसकी जानकारी मिलते ही सेनापति सर हुरोज अपने फौजें के साथ ग्वालियर पहुंच गये। 18 जून रानी लक्ष्मीबाई (Jhansi ki rani laxmi bai ) का ग्वालियर का अंतिम जंग साबित हुया। ग्वालियर के पास कोटा की सराय में रानी लक्ष्मीबाई का ब्रिटिश सेना के साथ घमासान युद्ध हुआ।

अंग्रेज सेनापति सर ह्यूरो़ज स्वयं युद्ध का संचालन कर रहे थे। रानी लक्ष्मी बाई चंडी का रूप धारण कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रही थी। रानी ने मौका पाकर अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को रामचन्द्र देशमुख को सौंप दी और फिर अंग्रेजों से युद्ध करने लगी।

महान वीरांगना झांसी की रानी वीर मनु की वीरगति की कहानी

रानी अंग्रे़जों से युद्ध करते हुए एक नाले की ओर बढ़ चलीं, किन्तु दुर्भाग्य से रानी का घोड़ा वही अटक गया। अंग्रेजों से घिरी रानी वीरगति को प्राप्ति हुई। एंटोनिया फ़्रेज़र की किताब ‘द वॉरियर क्वीन‘ में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के बलिदान का विस्तृत वर्णन मिलता है।

प्रसिद्ध कवित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी अपनी कविता “झांसी की रानी” में उनकी शौर्य गाथा का बहुत ही बखूबी से वर्णन किया है। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

मध्यप्रदेश में ग्वालियर के फूल बाग इलाके में स्थित उनकी समाधि आज भी महान वीरांगना झांसी की रानी वीर मनु की अदम्य साहस और वीरता की कहानी को बयां कर रही है। 

रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी का प्रसंशक अंग्रेज भी थे ?

रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी का लोहा उनके प्रशंसक के साथ उनके दुश्मन भी मानते थे। पामेला डी टॉलर इस बारे में लिखती हैं कि झांसी के पोलिटिकल एजेंट एलिस के दिल में लक्ष्मीबाई के लिए संवेदना थी।
अंग्रेज के वरिष्ठ अधिकारी मैल्कॉम रानी से नफरत करता था।

यद्यपि उसने लॉर्ड डलहौजी को लिखे पत्र में लक्ष्मीबाई को बेहद सम्मानीय महिला के रूप में जिक्र किया। उन्होंने ने लिखा था की रानी लक्ष्मीबाई सिंहासन के लिए पूरी तरह से योग्य व समर्थ हैं।

झांसी के रानी लक्ष्मीबाई पर आखिरी कार्रवाई कर रानी को मारने वाले अंग्रेज अधिकारी सर ह्यू रोज ने कहा था। सभी विद्रोहियों में रानी सबसे ज्यादा नेतृत्वकुशल और साहसी एवं बहादुर थीं।

इन्हें भी पढ़ें – कविता खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी

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