chandra shekhar azad life history in hindi – चंद्रशेखर आजाद की जीवनी

महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद को 14 साल की आयु में असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। अपने देश के लिए जान को कुर्बान कर देने  वाले चंद्रशेखर आजाद कम उम्र में ही गांधी जी से प्रभावित हो गए थे।

बर्ष 1920-21 में मात्र 14 वर्ष की उम्र में चंद्रशेखर आजाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़े गये थे। जब चंद्रशेखर आजाद को असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया।

आप Chandra Shekhar Azad in Hindi के इस लेख में चंद्रशेखर आजाद की जीवनी और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे। तो चलिये चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय विस्तार से जानते हैं।

चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय हिंदी में

चंद्रशेखर से चंद्रशेखर आजाद बनने की कहानी – चंद्रशेखर से चंद्रशेखर आजाद बनने के पीछे की कहानी बड़ी ही रोचक है। कहते हैं की 14 साल की उम्र में ही वे असहयोग आंदोलन में गांधी जी से जुड़ गये।

उन्हें गिरफदार कर लिया गया और कोर्ट में जज से सामने उनकी पेशी की गयी। जज ने जब उनका नाम और पता पूछा, तब जज उनके जबाब को सुनकर दंग रह गये।

CHANDRA SHEKHAR AZAD LIFE HISTORY IN HINDI
CHANDRA SHEKHAR AZAD LIFE HISTORY IN HINDI

कोर्ट में जब जज ने उनसे पूछा –तुम्हारा नाम क्या है, उन्होंने उत्तर दिया आजादतुम्हारा घर कहाँ है। उनका उत्तर था जेलखाना, तुम्हारे पिता का क्या नाम है, उत्तर मिला –स्वाधीनता।

तब जज उनके निर्भयतापूर्ण जबाव को सुनकर झुँझला उठे थे। इस तरह चंद्रशेखर आजाद के विचारों ने युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए अत्यंत ही प्रभावित किया। इसी घटना के बाद वे सार्वजनिक रूप से चंद्रशेखर से चंद्रशेखर आजाद के नाम प्रसिद्ध हो गये

जब जज ने उन्हें 15 कोड़े मारने की सजा सुनायी।

नाम और पता पूछने पर चंद्रशेखर आजाद के जवाब से गुस्से में आकार जज ने उन्हें 15 कोड़े मारने की सजा सुनायी। कहते हैं की चंद्रशेखर आजाद को कोड़े मारने के लिए जब बाँधा जाने लगा।

तब उन्होंने अंग्रेजों से कहा बांधते किसलिए हो, कोड़ा लगाओं। अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आजाद पर बेंत के कोड़े से प्रहार शुरू कर दिया। ऐसे ही अदम्य साहस के धनी थे चंद्रशेखर आजाद। 

बचपन से ही चंद्रशेखर आजाद के अंदर अदमय साहस और देशभक्ति कूट-कूट भरी थी। प्रत्येक कोड़े के प्रहार पर उनके मुँह से आह की जगह वनदे मातरम, भारत माता की जय और गांधीजी की जय निकलते रहे।

कहते हैं की इस घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद युबा क्रांतिकारी के प्रेरणा स्रोत बन गये। उसके बाद उन्होंने दुबारा जीते जी अंग्रेजों के गिरफ़त में नहीं आने का प्रण लिया। दोस्तों आइये, देश के उन महान सपूतों याद करें।

चंद्रशेखर आजाद का जन्म और शिक्षा दीक्षा – Birth of Chandra Shekhar Azad in Hindi

भारत के महान सपूत तथा स्वतंत्रता संग्राम के महानायक चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को भाबरा नामक स्थान पर हुआ। यह स्थान मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में स्थित है। चंद्रशेखर आजाद का पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी (Chandrashekhar Tiwari) था।

बचपन से ही वे स्वाभिमानी और साहसी के साथ तीरंदाजी और निशानेबाजी में परांगत थे।उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगदानी देवी थी।

उनके पिता ने चंद्रशेखर आजाद को बनारस में संस्कृत पाठशाला दाखिला दिलाई। आजादी के बाद उनके जन्मस्थान भाबरा का नाम प्रवर्तित कर ‘आजादनगर‘ कर दिया गया।

चंद्रशेखर आजाद की कहानी

चंद्रशेखर आजाद का कांग्रेस से मोह भंग

असहयोग आंदोलन के दौरान वे रामप्रसाद बिस्मिल के करीब आ गए। कहते हैं की चौरी चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने जब आंदोलन वापस ले लिया तब उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया।

अंग्रेजों के द्वारा लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय के मृत्यु के बाद वे अत्यंत क्रोधित हो गये। वे अंग्रेजों से बदला लेने का प्रण ले लिया।

इसी दौरान वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेशचन्द्र चटर्जी के द्वारा बनाए गये क्रान्तिकारियों के संगठन हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ में शामिल हो गए। उसके बाद सन 1928 में जब रिपापलिकन आर्मी की स्थापना हुई तब उन्हें इनका कमांडर बनाया गया।

लाला लाजपत राय के मौत का बदला

साल 1928 ने चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेज अधिकारी सॉन्डर्स को गोली मारकर हत्या कर दी। इस तरह उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था।

जब लाहौर के पुलिस अधीक्षक जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर जा रहे थे। तब चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने घात लगाकर घेर लिया।

राजगुरु के पिस्टल से निकली गोली साण्डर्स के सिर में लगी और वे वहीं मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। उसके बाद भगत सिंह ने गोलियां से भूनकर उसे बिल्कुल शांत कर दिया। उसके बाद तीनों वहाँ से भाग निकले।

साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया लेकिन चंद्रशेखर आजाद ने उनको भी मौत के घाट उतार दिया। इस घटना को समस्त भारत के लोगों ने सराहा गया।

लाहौर में जगह-जगह पोस्टर लगा दिए गए की ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक साण्डर्स की हत्या के द्वारा लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला लिया गया।

काकोरी ट्रेन लूट कांड और चंद्रशेखर आजाद

रामप्रसाद बिस्मिल के मार्गदर्शन में चंद्रशेखर आजाद 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड में सक्रिय रूप से भाग लिया। आजाद अपने क्रांतिकारियों साथियों के साथ काकोरी में ट्रेन लूट को अंजाम दिया।

इस ट्रेन में अंग्रेजों का पैसा जा रहा था। इस पैसे से ज्यादा से ज्यादा हथियार खरीदने की योजना थी। काकोरी लूट व हत्याकांड ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया।

जिन लोगों ने ट्रेन लूटा को अंजाम दिया उनको अंग्रेजों ने गिरफदार कर सजा देना शुरू कर दिया। इस कांड के बाद भारत के कई महान क्रांतिकारी को फांसी की सजा सुनाई गई। जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां के साथ कई अन्य क्रांतिकारी शामिल थे।

चंद्रशेखर आजाद को खोजेने के लिए अंग्रेजों ने जाल बिछाया। लेकिन वे जानते थे की अंग्रेज के गिरफ़त में आने का मतलब था मौत। आजाद वेश बदलने में माहिर तो थे ही वे गिरफ़्तारी से बचने के लिए पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गये। तभी से अंग्रेज हाथ धोकर उनके पीछे पड़ा था।

क्या वे रूस के बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित थे ?

कहते हैं की वे रूस की बोल्शेविक क्रांति से बहुत प्रभावित थे और रूस जाकर स्टालिन से मदद भी लेना चाहते थे। माना जाता है की इसके लिए उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से सहयोग की भी पेशकश की थी।

गणेश शंकर विद्यार्थी और नेहरू जी से मुलाकात

वायसराय की रेल को बम से उड़ा देने की कोशिश तथा असेंबली में बम फेकने के जुर्म में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव आदि को फांसी की सजा सुनाई गही थी। अंग्रेज अधिकारी को चंद्रशेखर आजाद की भी तलाश थी लेकिन वे अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे।

चन्द्रशेखर आज़ाद ने फांसी की सजा पाये अपने तीन साथी भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव की सजा कम कराने का काफी प्रयास कर रहे थे। इसके लिए वे गणेशशंकर विद्यार्थी से के परामर्श कर इलाहाबाद गये और नेहरू जी से उनके घर आनन्द भवन में मुलाकात की।

चंद्रशेखर आजाद ने नेहरू जी से यह अनुरोध किया कि वे गांधी जी पर इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये प्रयास करें। इसी बीच अंग्रेजों अधिकारी ने चंद्रशेखर आजाद( Chandra Shekhar Azad ) की गिरफदारी के प्रयास तेज कर दिए थे।

चंद्रशेखर आजाद का छ्द्म वेश धारण में माहिर

कहते हैं की चंद्रशेखर आजाद(Chandra Shekhar Azad ) छदम वेश धारण करने में माहिर थे। इस कारण हमेशा वे अंग्रेज को चकमा देने में कामयाब हो जाते थे। यही कारण हो सकता है की अंग्रेज कभी उन्हें जिंदा नहीं पकड़ सकी।

अंग्रेजों से छुपकर चंद्रशेखर आजाद कुछ समय तक झांसी में भी रहे। वे झांसी के पास ओरछा के जंगलों में धिमारपुर गांव के पास रहते थे। वे यहॉं हरिशंकर नामक एक ब्रह्मचारी के वेश में रहकर दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम भी करते थे।

इसी दौरान उनकी मुलाकात रुद्रनारायण सक्सेना से हुई वे भी क्रांतिकारी विचारधारा के थे। चंद्रशेखर आजाद की उनसे अच्छी दोस्ती हो गयी। उन्होंने अंग्रेजों से बचाने में चंद्रशेखर आजाद की हमेशा मदद की।

यहॉं वे अंग्रेजों से बचने के लिए तहखाने (जमीन के अंदर बनी सुरंग) का प्रयोग करते थे। बाद में जब अंग्रेजों को इनकी भनक लग गयी तब आजाद झांसी से निकल भागे।

अंग्रेजों से मुठभेड़ व चंद्रशेखर आजाद की मौत

(chandra shekhar azad death story in hindi)

इस बीच चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी 1931 को अपने साथियों के साथ इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में किसी योजना के बारें में विचार-विमर्श कर ही रहे थे। तभी अंग्रेज अधिकारी को किसी मुखबिरी ने इसकी सूचना दे दी।

नॉट बाबर ने अपने दल बल के साथ अल्फ्रेड पार्क को चारों तरफ से घेर लिया। उनके साथी भागने में सफल हो गये। लेकिन चंद्रशेखर आजाद के साथ अंग्रेजों की मुठभेड़ शुरू हो गयी। उन्होंने एक पेड़ का आड़ लेकर जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। अंग्रेज उन्हें समर्पण करने को कह रहे थे।

chandra shekhar azad life history in hindi
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उन्होंने प्रण जो किया था कि अग्रेज उन्हें कभी जीवित नहीं पकड़ सकती और ने ही अंग्रेजी हुकूमत उन्हें फांसी पर लटका सकेगी। चंद्रशेखर आजाद अपनी पूरी साहस के साथ नॉट बावर का मुकाबला करते रहे।

लगातार 20 मिनट तक दोनो तरफ से फायरिंग चलती रही। जब उनके पिस्टल में अंतिम गोली बची तब उसने अपने पिस्टल की अंतिम गोली अपनी ही कनपटी में मारकर वीरगति को प्राप्त हो गये।

इस प्रकार भारत के महान सपूत माँ भारती की गोद में सदा के लिए सो गया। भारत माँ का यह अमर सपूत हमेशा के लिए भले ही सो गया। लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत की लौ को और तेज कर दिया। 

आज़ाद है मेरा नाम, आज़ाद ही रहेंगे

(great freedom fighter Chandra Shekhar Azad hindi language)

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद है मेरा नाम, आजाद ही रहेंगे’ । उनका प्रण था जीते जी कभी अंग्रेज के गिरफ़त में नहीं आएंगे। उनका प्रण सच हुआ, वे आजाद थे और अंत तक आजाद रहे।

जीते जी कभी अंग्रेजों के गिरफ़त में नहीं आए। चंद्रशेखर आजाद बलिदान दिवस हर वर्ष 27 फरवरी को मनाया जाता है। चंद्रशेखर आजाद पुण्यतिथि पर जगह-जगह कई कार्य कर्म का आयोजन किया जाता है।

उपसंहार

चंद्रशेखर आजाद के शहादत की खवर तुरंत समूचे इलाहाबाद में फैल गई। अल्फ्रेड पार्क में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। कहते हैं की उनकी अस्थियों को लेकर पूरे इलाहाबाद में जलूस निकाला गया। इस जुलूस में हजारों लोगों ने भाग लिया।

जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ परदर्शन होने लगे। चंद्रशेखर आजाद का यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। इस प्रकार 15 अगस्त 1947 को हमारा देश अग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया।

उनकी वीरता की कहानी सदियों तक समस्त देशवासियों को प्रेरित करती रहेगी। देश के लिए उनकी कुर्बानी सदा याद की जायेगी।स्वतंत्रता के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर आजाद पार्क कर दिया गया ।

आपको चंद्रशेखर आजाद की जीवनी (chandra shekhar azad life history in hindi ) जरूर अच्छी लगी होगी, अपने सुझाव से अवगत करायें।

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