गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास

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गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास किसी साहसिक गाथा से कम नहीं है। गुरु गोविंद सिंह सिख समुदाय के 10वें और अंतिम गुरु हुए। जिन्होंने सिख धर्म को पराकाष्ठा तक पहुचाया।

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लेकिन गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों की कहानी भी सिख धर्म को अति गौरवांवित करती है। गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों का बलिदान अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देती है।  उके पुत्रों ने कभी भी नवाब वजीर खां के आगे शीश नहीं झुकाया।

उनके दो पुत्रों साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह जिनकी उम्र क्रमशः महज मात्र 9 साल और 7 सात साल की थी। मुगलों ने इस्लाम ने कबूल करने के जुर्म में उन्हें दीवारों में चुनवा दिया था। उनके बाकी दो पुत्र भी मुगलों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2022 में दशम पातशाही श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के प्रकास पर्व के अवसर पर एक बड़ी घोषणा की।

भारत सरकार ने प्रतिवर्ष 26 दिसंबर को माता गुजरी और श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबजादों के बलिदान की याद में ‘वीर बाल दिवस’ मनाने की घोषणा की।

आइए जानते हैं माता गुजरी और गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास जिन्हें याद करने के लिए वीर बाल दिवस मनाया जाएगा।

गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास

गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास जानने से पहले हम थोड़ा गुरु गोविंद सिंह का इतिहास से अवगत होते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी सर्वोच्च बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने जहां अपने उपदेशों से लोगों को धर्म का मार्ग दिखाया।

वहीं अपने कर्मों द्वारा उन्होंने समाज के बीच सर्वोच्च आदर्श की स्थापना की। धर्म रक्षा के लिए उन्होंने अपने परिवार को कुर्बान कर दिया। उनके चारों बेटे धर्म रक्षा के लिए ही शहीद हो गए। ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है। 

गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके पुत्रों का  त्याग एवं बलिदान की अमर गाथा सुनकर हर हिन्दुस्तानी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। धन्य है हमारे देश की मिट्टी जहां ऐसे जाबांज सपूतों ने जन्म लिया। 

गुरु गोबिंद सिंह की जयंती के अवसर पर उस तिथि को प्रकाश वर्ष के रूप में मानते है तथा गुरु गोविंद सिंह और उनके पुत्रों के बलिदान को याद किया जाता है।

इसके लिए उन्हें अपने पुत्रों का बलिदान देना पड़ा लेकिन कभी भी उन्होंने मुगलों की अधीनता नहीं स्वीकारी। आज इस लेख में गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास के बारें में विस्तार से जानेंगे।

गुरु गोविंद सिंह जी के कितने पुत्र थे

सिखों के दशवें और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के चार पुत्र थे। गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों के नाम अजीत सिंह, जुझारू सिंह, फ़तेह सिंह और जोरावर सिंह था। गुरु गोविंद सिंह जी के तीन पत्नियाँ थी।

उनकी पहली पत्नी से तीन पुत्र, दूसरी पत्नी से एक पुत्र तथा तीसरे से कोई संतान नहीं था। गुरु गोविंद सिंह के बच्चे उनके तरह ही धर्म परायण थे। गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों का बलिदान की कहानी आपके रोंकटे खड़े कर देंगें।

सिख धर्म के रक्षा के लिए गुरु गोविंद सिंह जी के दो पुत्र जोरावर सिंह जी और फतेह सिंह जी ने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। जोरावर सिंह जी और फतेह सिंह जी को इस्लाम धर्म अपनाने पर मजबूर किया जा रहा था।

मुगलों ने दोनों को मुस्लिम धर्म अपनाने के बाध्य किया। लेकिन उन दोनों ने इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार कर दिया। उनकी बस इतनी सी गलती पर तत्कालीन मुगल शासक औरंगजेब के कहने पर उसके सूबेदार वजीर खान ने उन दोनों को मौत की सजा दे दी। दोनों भाइयों की उम्र उस बक्त महज 7 और 9 वर्षों की थी। इस अल्पायु में मुगलों ने दीवारों में चुनवा कर मौत की सजा दे दी।

गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्रों के बलिदान की कहानी

यह वाक्या उस समय की है जब मुगलों ने अचानक आनंदपुर में हमला कर दिया था जिसकी वजह से गुरु गोविन्द सिंह जी को आनंदपुर छोड़ निकालना पड़ा था। जब गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज सिख योद्धाओं के साथ सरसा नदी को पार कर रहे थे,

तभी अचानक नदी में तेज बहाव के चलते इनका परिवार इनसे बिछड़ कर दूर हो गया। जहाँ गुरु गोविंद सिंह जी दो बेटे अजीत सिंह और  जुझारू अलग दिशा में चले गये। वहीं इनके पुत्र फ़तेह सिंह और जोरावर सिंह अपनी दादी गुजरी के साथ जंगल की ओर चले गए।

अपने परिवार से अलग होने के बाद पहाड़ों और नदियों को पार करके हुए गुरु गोविंद सिंह के माता जी (गुजरी देवी) पास के एक शहर में पहुंची। वहाँ उनकी मुलाकात एक पूर्व परिचित ‘गंगू’ नामक व्यक्ति से हुआ जो पहले कभी गुरु गोविन्द सिंह जी के रसोइया थे।

गुजरी जी से मिलने बाद वे उनको अपने साथ अपने घर चलने के लिए विनती की। जिसे गुजरी देवी मना नहीं कर पाई और दोनों बच्चों को संग लेकर उस रसोइये के घर पर गई।  माता गुजरी देवी की बदन पर ढेर सारे सोने की आभूषण थी।

उस आभूषण को देखकर गंगू के मन में लालच आ गया। फलतः उन्होंने सोते वक़्त रात के अंधेरे में सारी सोने की आभूषण और मुहरें चुरा ली।  

माता गुजरी देवी के साथ उनके दोनों पुत्रों को बंदी बनाना।

इसके अलावा उन्होंने ईनाम पाने के लालच में पास के कोतवाल में गुरु गोविन्द सिंह के दोनों बेटे और उनकी माँ के बारें में खबर दे दी। खबर मिलने के बाद कोतवाल ने अपने सिपाहियों को भेज कर उन्हें उन्हें बंदी बना लिया। 

इस प्रकार माता गुजरी देवी और उनके दोनों पुत्र गिरफ्तार हो गए।  वजीर खां ने साहिबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह सहित माता गुजरी को एक किले में कैद कर दिया।

वजीर खान ने पूस मास की तेज ठंढ रातों में तकलीफ देने के लिए उन्हें उस बुर्ज में कैद कर रखा जो चारों ओर से खुला था। कैद में भी माता गुजरी ने अपने पोतों को वीरतापूर्ण कहानियां सुनाती थी।

उन्होंने अपने पोतों को हर कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहने का उपदेश दिया। दोनों साहिबज़ादों ने भी माता गुजरी देवी को ये विश्वास दिलाया कि वो कभी भी अपने कुल की मर्यादा को झुकने नहीं देंगे।

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गुरु गोविंद सिंह जी पुत्रों की मुगल दरवार में पेशी

अगले  दिन गुरु गोविंद सिंह के दोनों वीर सपूत फ़तेह सिंह और जोरावर सिंह को  नवाब वजीर खान के पास ले जाया गया।चारों ओर मुगल सैनिको से घिरे होने के बाबजूद भी उनके माथे पर थोड़ी सी भी सिकन नहीं थी।

दरवार में पहुचकर उन्होंने नवाब वजीर खां के आगे शीश नहीं झुकाया। बल्कि वहों पहुँचते ही उन्होंने सबसे पहले शेर की तरह दहाड़ते हुए कहा, “वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरू जी की फतेह।”  यह दृश्य को देख कर सभी लोग भौंचक्के थे।

वजीर खान उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर इस्लाम कबूल करने के लिए बाध्य किया। लेकिन वीर पुरुष की वीर संतान की तरह ये वीर सुपुत्र अपने निश्चय पर अटल रहे। उन्होंने न ही उसके सामने अपना सिर झुकाया न ही इस्लाम को अपनाने के लिए राजी हुआ।

इस्लाम कबूल करने से साफ इनकार

वजीर खान ने उनसे यह कहा की हम तुम्हे मारना नहीं चाहते बल्कि नवाबों की तरह रखना चाहते हैं। लेकिन एक शर्त है की तुम्हे अपना धर्म बदलना पड़ेगा। लेकिन दोनों वीरों का जवाब सुन वजीर खान के होश उड़ गए।  

उन्होंने उत्तर दिया की हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है। जिस धर्म के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की बलि दे दी। उसे हम तुम्हारी लालच भरी बातों में आकर छोड़ दें, यह कभी नहीं हो सकता। उन्होंने धर्मांतरण से वजीर खान को साफ मना कर दिया। 

उनके जवाब सुनकर नवाब वजीर खान और वहाँ उपस्थित काजी गुस्से से तिलमिलाए। काजी ने कहा की ये दोनों बच्चे आगे चलकर मुग़ल शासन के लिए बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। इसलिए इन्हे दीवार में ज़िंदा दफ़न कर दिया जाये।

फैसला सुनाने के बाद दोनों वीरों को इनकी दादी के पास मिलने के लिए भेज गया। बालकों ने उत्साहपूर्वक दादी को पूरी घटना सुना दी।  बालकों की वीरता को देखकर दादी प्रफुलित हो उठी और उन्हें हृदय से लगाकर बोली – “मेरे बच्चों! तुमने अपने पिता की लाज रख ली”।   

गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों का बलिदान

अगले दिन उन्हें जल्लाद विशाल बेग और शिशाल बेग के पास भेज दिया गया। इनके चारों ओर दीवारों का निर्माण शुरू हो गयी। धीरे-धीरे जब दीवारें इनके गला के पास पहुँच गया। तब जोरावर सिंह ने आखिरी बार अपने भाई की ओर देखा और उसकी आंख नम हो आयी।  

ऐसे में वजीर खान और काजी उन्हें देख काफी खुश हुआ। उन्हें लगा की बच्चे डर गए हैं, उसने मौका देखकर जोरावर सिंह से कहा – “बच्चों! अभी भी तुम्हारे पास समय है। यदि चाहो तो तुम इस्लाम कबूल कर लो हम तुम्हारी सजा माफ कर देंगे।

उसपर जोरावर सिंह ने गरजकर कहा की “ये तुम्हारी भूल है, मैं मौत से नहीं डर रहा हूँ। मेरा भाई मेरे बाद इस संसार में आया था। लेकिन मेरे साथ ही धर्म के लिए शहीद हो रहा है। इसलिए मुझे रोना आ रहा है”।  

इन दोनों नन्हें वीर सपूतों की बातें सुन जल्लाद की भी आखें नम हो रह गयी। देखते ही देखते दोनों को दीवार में चुनवा दिया गया। इस प्रकार मुगलों ने गुरु गोविंद सिंह की दोनों बेटों की 26 दिसंबर 1705 को दीवारों में चुनवा कर निर्मम हत्या कर दी।

उधर जब माता गुजरी जी को दोनों छोटे साहिबजादों की शहादत की सूचना मिली तो उन्होंने भी शोक में अपने शरीर त्याग दिए।

गुरु गोविंद सिंह के अन्य दो बेटों का बलिदान

उधर गुरु गोविंद सिंह के दो सबसे बड़े बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह भी धर्म की रक्षा में अपने पिता को सुरक्षित करने हेतु शहीद हो गए। बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने 40 बहादुर सिख योद्धाओं के साथ मिलकर चमकौर का युद्ध मुगलों के खिलाफ लड़ा। 

यह युद्ध पंजाब के चमकौर में 1704 में 21 दिसंबर से 23 दिसंबर तक लड़ा गया था। बहादुर सिखों ने मुगलों की विशाल सेना से डटकर मुकाबला किया। उन्होंने मुगलों की आधी से अधिक सेना को मार गिराई। 

इस युद्ध में मुगल सेना गुरु गोबिंद सिंह जी के प्राणों की प्यासी थी,  लेकिन उनके मनसूबे को गुरु जी के दोनों पुत्र अजीत सिंह और जुझार सिंह ने चकनाचूर कर दिया। इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह जी सुरक्षित रहे, लेकिन उनके दोनों पुत्र बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह शहीद हो गए।

गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास
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गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब

कहा जाता है की गुरु जी के साहिबजादों की शहादत ने मुगलों को हिला कर रख दिया था। उनकी शहादत आगे चलकर मुगल साम्राज्य के पतन के कारण में से एक थी।

इस प्रकार गुरु गोबिंद जी के सभी बेटों ने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से सामना करते हुए शहादत को प्राप्त हुए। जहां गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों बेटों की शहादत दी गई उस स्थान पर आज गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब स्थित है।

निष्कर्ष (Conclusion)

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के बेटों की शहादत की याद में हर साल 20 दिसंबर से 27 दिसंबर तक शहीदी सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। हमें भी अपने बच्चों को गुरु गोविंद सिंह के वीर साहिबजादो की कहानी जरूर सुनानी चाहिए।

ताकि अपने धर्म और कर्तव्य के पालन हेतु कृत्य संकल्प रहें। हमें आशा है की गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों का इतिहास से जुड़ी जानकारी अच्छी लगी होगी। इसे आगे शेयर करें और कमेंट्स कर इस प्रकार के लेख को संकलन के लिए उत्साहवर्धन करें।

F.A.Q

गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों को किसने और क्यों मारा?

गुरु गोविंद सिंह जी के बच्चों को मुगलों ने इस्लाम धर्म नहीं कबूल करने के जुर्म में दो को दीवार में चुनवा दिया और दो को युद्ध में मारा।

किस मुगल शासक ने गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों को दीवारों में चिनवा दिया था?

औरंजेब के शासन काल में उसके आदेश पर सेनापति वजीर खान ने गोविंद सिंह के पुत्रों को दीवारों में चिनवा दिया था।

गुरु गोविंद सिंह के बच्चों का बलिदान दिवस कब है?

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के के बच्चों का बलिदान दिवस हर साल 26 दिसंबर को मनाया जाता है।

गुरु गोबिंद सिंह जी के पुत्रों का क्या हुआ?

सिखों के 10 वें और अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के दो पुत्रों को युद्ध में मार गिराया और दो पुत्रों को दीवारों में चुनवा दिया।

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