अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु कैसे हुई, अहिल्याबाई होळकर इतिहास और कहानी

अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु कैसे हुई - Ahilyabai holkar

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अहिल्याबाई कौन थी (Ahilyabai holkar in Hindi )

अहिल्याबाई होलकर मालवा राज्य की रानी थी। भारत के इतिहास में अहिल्याबाई अपने सुचारु शासन व्यवस्था के लिए जानी जाति है। पति, ससुर और पुत्र को अकस्मात खोने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने सत्ता का संचालन बड़े ही सुंदर तरीके से किया। उनके शासनकाल में राज्य की प्रजा खुश थी तथा चारों ओर सुख और शांति थी। अपने प्रजा के लिए वे जितनी परोपकारी थीं, उतना ही वे राजपाट के नियमों में सख्त भी थीं।

दोषी चाहें उनका पुत्र क्यों न हो सख्त फैसले लेने में संकोच नहीं करती थी। रानी अहिल्या देवी 13 मार्च 1767 ईस्वी में अपने राज्य के सत्ता पर काबिज हुई और 1795 तक रही।

अपने करीब 28 साल के शासनकाल में उन्होंने बड़ा ही नाम कमायी। इस लेख में अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु कैसे हुई थी, उनके जीवनी, कार्य और योगदान के बारे में विस्तार से जानेंगे।

अहिल्या बाई का जीवन परिचय – Ahilyabai holkar information in Hindi

रानी अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 ईस्वी में हुआ था। रानी अहिल्याबाई होळकर का जन्म स्थान महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में चौंढी नामक गांव माना जाता है।

अहिल्याबाई के पिता का नाम मानकोजी शिंदे था। उनके पिता एक साधरण किसान परिवार से थे।

अहिल्याबाई का विवाह किसके साथ हुआ था

इनका विवाह मात्र 12 वर्ष की उम्र में हुआ था। एक बार इन्दौर राज्य के संस्थापक राजा मल्हारराव जब इनके गाँव से गुजर रहे थे। तब संयोग से कन्या अहिल्याबाई पर उनकी नजर पड़ी। वे अहिल्याबाई के बुद्धिमानी से बहुत प्रभावित हुए।

फलतः उन्होंने अपने पुत्र खंडेराव होल्कर का विवाह अहिल्याबाई से कर दिया। कहा जाता है की अहिल्याबाई के पति खंडेराव होल्कर अपने राजकाज में कोई रुचि नहीं लेते थे।

लेकिन शादी के बाद अहिल्याबाई के सूझ बुझ से वे सही रास्ते पर आ गए। रानी अहिल्याबाई को एक पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई। उनके पुत्र का नाम मालेराव और पुत्री का नाम मुक्ताबाई था।

अहिल्याबाई के पति का निधन

अहिल्याबाई होळकर अपने ससुर से राजकाज की शिक्षा ग्रहण की। मल्हारराव अहिल्या के बुद्धि और चतुराई से बहुत प्रसन्न थे। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। लेकिन 1754 में खंडेराव होल्कर को युद्ध में वीरगति की प्राप्ति हुई।

खंडेराव होल्कर की चार रानियाँ थी। अपने ससुर मल्हारराव होलकर की बात मानकर अहिल्या बाई सती नहीं हुई जबकि अन्य बाँकी रानियां सती हो गईं। अहिल्याबाई मात्र 29 वर्ष की उम्र में विधवा हो गई।

जब महाराजा मल्हारराव को अपने बेटे का निधन का समाचार मिला। वे मानसिक रूप से कमजोर हो गए तथा अस्वस्थ रहने लगे।

फलतः मल्हारराव ने अपने बहू अहिल्याबाई को होलकर साम्राज्य की कमान सौंप दी। एक दिन मल्हारराव की तवीयत अचानक विगड़ गई और उनका निधन हो गया।

सत्ता की बागडोर

पति और ससुर दोने के आकस्मिक निधन के बाद सत्ता की सारी जिम्मेदारी सीधे अहिल्याबाई के कंधों पर आ गई। लेकिन कठिन घड़ी में भी उन्होंने बड़ी ही धैर्य और सूझ-बुझ से काम लिया।

उन्होंने राज्य का संचालन बड़े ही सुचारु रूप से सांभाला। कुछ वर्षों के बाद जब उनके पुत्र मालेराव का शासन संभालने का समय आया । तब उनका भी आकस्मिक निधन हो गया। तत्पश्चात उनकी पुत्री भी दुनियाँ से चल बसी।

इतने दुखों के पहाड़ टूटने के बावजूद भी रानी अहिल्याबाई होळकर ने 28 वर्षों तक बड़ी ही कुशलता पूर्ण शासन किया। अंततः 1795 में रानी अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु हुई

तक उनका यश पूरे भारत में फैल चुका था। आज भी उनकी आदर्श सुशासन व्यवस्था की मिसाल दी जाती है।

अहिल्याबाई होलकर का इतिहास – Rani Ahilyabai Holkar history in Hindi

भारत के इतिहास में रानी अहिल्याबाई होलकर को एक बुद्धिमान, तीक्ष्ण सोच और एक अच्छे शासिका के रूप में जाना जाता है। अपने पति और ससुर के आकस्मिक निधन के बावजूद भी बिना बिचलित हुए उन्होंने राजकाज का सुचारुपूर्वक संचालन किया।

अहिल्याबाई होलकर का शासनकाल 1767 से लेकर 1795 के बीच माना जाता है। इस प्रकार उन्होंने मालवा की रानी के रूप में करीब 28 वर्षों तक शासन की।

भगवान शिव के प्रति गहरी आस्था के कारण उन्होंने अपनी राजधानी महेश्वर में स्थानतरित किया। यहाँ पर उन्होंने कई सुंदर महल का निर्माण करवाया।

अहिल्याबाई होलकर के कार्य about ahilyabai holkar in hindi

अहिल्याबाई दान पुण्य में विश्वास करती थी। प्रजा की सेवा को अपना परम धर्म मानती थी। वे रोज अपने प्रजा की समस्या को सुनती और उसका निदान करती थी। जनता की भलाई के लिए उन्होंने अनेकों कार्य किए।

अपनी सूझ बुझ से उन्होंने अपने साम्राज्य को समृद्ध बनाया। उनका मानना था कि धन, ईश्वर व प्रजा द्वारा दी हुई ऐसी धरोहर है जिसकी मैं मालिकिन नहीं हूँ। बल्कि प्रजाहित में उस धन का उपयोग करना उनकी जिम्मेदारी है।

वे अपने प्रजा को समान रूप से देखती थी। उन्होंने अपने राज्य में प्रजा के सुख सुविधा के लिए उन्होंने किले, विश्रामालय, कुएं और सड़कें बनवाई। तयोहारों के अवसर पर वे प्रजा के बीच में जाकर त्योहार मनाती थी।

मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा भगवान शिव के टूटे हुए मंदिरों को देखकर बहुत दुखी थी। कई मंदिरों के जीर्णोद्धार में उन्होंने योगदान दिया। इसमें विहार के गया का मंदिर, उत्तर प्रदेश का काशी विश्वनाथ मंदिर, गुजरात का सोमनाथ मंदिर के नाम शामिल हैं।

भगवान शिव की परम भक्त थी

रानी अहिल्याबाई होळकर भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने अपना सारा जीवन परमार्थ, प्रजा की सेवा, वैराग्य और कर्त्तव्य-पालन में बीता दिया।

कहते हैं की उन्होंने अपने राज्य को भगवान शिव को समर्पित कर राज्य का सेवा किया करती थी। भगवान शंकर की पूजा किए बगेर वे मुँह में अन्न का एक दाना भी नहीं डालती थी।

राज्य के मुद्राओं पर शिवलिंग का चित्र

भगवान शिव के प्रति उनका गहरा लगाव था। वे राजाज्ञाओं पर अपना हस्ताक्षर के स्थान पर श्री शंकर लिखती थी। भगवान शिव के प्रति उनके समर्पण इस बात से पता चलता है की उनके राज्य के रुपयों पर शिवलिंग तथा बिल्व पत्र का फ़ोटो बना होता था।

उनके द्वारा जारी मुद्राओं पर भगवान शिव की सवारी नंदी का चित्र बना होता था। देवी अहिल्याबाई के शासन में बनवाई गईं चांदी की दुर्लभ मुहरें आज भी मल्हार मार्तंड मंदिर के गर्भगृह में सुरक्षित है।

इन मुहरों का उपयोग रानी अहिल्याबाई के राज में किया जाता था। रानी अहिल्याबाई के आदेश के बाद मुहर लगाई जाती थी, जिसे भगवान शिव का आदेश माना जाता था।

अहिल्याबाई होलकर की कहानी Ahilyabai holkar story in Hindi

कहा जाता है की अहिल्याबाई होळकर अत्यंत न्याय प्रिय थी। एक बार उनका बेटा रथ से कहीं जा रहा था रास्ते में उनके रथ से टकराकर एक गाय का बच्चा मर गया। उनके पुत्र ने इस बात से बेखवर ध्यान नहीं दिया।

उधर गाय अपने मरे हुए बच्चे के पास जाकर सड़क पर बैठ गई। उसके थोड़ी देर बार उसी रास्ते से रानी अहिल्याबाई गुजर रही थी। लोगों की भीड़ जमा देखकर उन्होंने कारण को जाना और उन्हें उस गाय को देखकर उसे बड़ी दया आई।

उन्होंने अपने सिपाही को आदेश दिया की जिसने इस गाय के बछड़े के साथ ऐसा कृत्य किया है। उसे भी ठीक वैसा ही दंड दिया जाय जैसे उसे रथ के पहिए के नीचे कुचल दिया गया।

लेकिन सिपाही को जब पता चला की यह कृत्य करने वाला और कोई नहीं बल्कि खुद राजकुमार हैं। तब कोई सिपाही तैयार नहीं हुआ। अंत में अहिल्याबाई होळकर खुद ही रथ पर सवार होकर अपने पुत्र को रथ से कुचलने के लिए चल पड़ी।

लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को कुचलने के लिए रथ पर सवार हुई। वह गाय उनके रास्ते में आकार खड़ी हो गई और उन्हें ऐसा करने नहीं दिया। इतना न्याय प्रिय थी रानी अहिल्याबाई।

अहिल्याबाई के सेनापति

रानी अहिल्याबाई के सेनापति का नाम तुकोजीराव होल्कर था। तुकोजीराव अत्यंत ही बहादुर और रानी के सबसे विस्वासपात्र था। अहिल्याबाई भी उन्हें पुत्र के समान ही मानती थी।

जब अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु हुई उसके बाद तुकोजीराव ने ही शासन की बागडोर संभाली।

अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु कैसे हुई थी

अपने पति और ससुर और बेटे के आकस्मिक निधन के बाद वह टूट गई थी। अपने जीवन काल में महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने ढ़ेर सारी कठिनाइयों का सामना किया है। लेकिन रानी ने कभी हार नहीं मानी।

अपने ससुर के दिए हुए वचनों को याद करते हुए रानी हमेशा अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रही। इस प्रकार उन्होंने 1767 से 1795 तक करीब 28 साल तक शासन किया।

लेकिन अपनों का वियोग और सत्ता की जिम्मेदारी ने धीरे-धीरे रानी को खोखला कर दिया। फलतः एक दिन अचानक उनकी तबियत बिगड़ गई। इस प्रकार अहिल्याबाई होलकर की मृत्यु 13 अगस्त 1795 को इंदौर में हो गई।

अहिल्याबाई होलकर जयंती (Ahilyabai holkar jayanti)

महारानी अहिल्याबाई होल्कर को भारतीय इतिहास में सर्वश्रेष्ठ रानियों में गिना जाता है। भारत के इतिहास मे उनका नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है।

उनके शासन के  दौरान मराठा मालवा साम्राज्य अपनी सफलता की बुलंदी पर था। इस महान न्याय प्रिय, धर्मनिष्ट, परोपकारी रानी के सम्मान में 31 मई को उनकी जयंती मनाई जाती है।

FAQ

अहिल्याबाई के पति का नाम क्या था ?

मालवा की महारानी अहिल्याबाई के पति का नाम खण्डेराव होल्कर था।

अहिल्याबाई किस राज्य की महारानी थी ?

अहिल्याबाई मालवा राज्य की महारानी थी, उन्होने अपनी राजधानी माहेश्वर में निर्माण कर शासन किया।

अहिल्याबाई के पिता का नाम क्या था ?

रानी अहिल्याबाई के पिता का नाम मान्कोजी शिन्दे था।

बाहरी कड़ियाँ

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