बीरबल साहनी का जीवन परिचय – खोज, जीवनी, निबंध, Birbal Sahni Biography in Hindi

BIRBAL SAHNI BIOGRAPHY IN HINDI - वैज्ञानिक बीरबल साहनी का जीवन परिचय

बीरबल साहनी का जीवन परिचय – खोज, जीवनी, निबंध, Birbal Sahni Biography in Hindi

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बीरबल साहनी का जीवन परिचय – खोज, जीवनी, निबंध, BIRBAL SAHNI BIOGRAPHY IN HINDI

बीरबल साहनी का नाम भारत के महान अवशेष वनस्पति वैज्ञानिक (भारतीय पुरावनस्पती वैज्ञानिक) के रूप में लिया जाता है। इन्होंने सारी उम्र वनस्पति अवशेषों के शोध में लगा दिया। जिस बक्त विज्ञान उतना उन्नत नहीं था।

जब शिलाखंडों को काटने का कोई विशेष यंत्र का आविष्कार भी नहीं हुआ था। उस बक्त भी बीरबल साहनी ने अपने कड़ी मेहनत के बल पर पत्थरों के बीच छिपे अवशेषों को निकालकर उस पर शोध किया करते थे।

डॉ बीरबल साहनी की जीवनी हमेशा से ही प्रेरक रही है। बीरबल साहनी को इंडियन पैलियोबॉटनी का जनक माना जाता है। भारतीय वनस्पतियों का किसी ने अगर गहन अध्ययन किया है तो वे थे महान वैज्ञानिक बीरबल साहनी।

हरियाणा के रोहतक में उनके द्वारा कुछ प्राचीन सिक्कों की खोज भी की गयी। उनके सम्मान में बीरबल साहनी पूरा वनस्पति विज्ञान संस्थान लखनऊ में है।

कहते हैं की उनका पहला शोधपत्र “न्यू फाइटोलॉजी” पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद उनका नाम धीरे-धीरे समस्त दुनियाँ में प्रसिद्ध हो गया।

BIRBAL SAHNI BIOGRAPHY IN HINDI - वैज्ञानिक बीरबल साहनी का जीवन परिचय
BIRBAL SAHNI BIOGRAPHY IN HINDI – वैज्ञानिक बीरबल साहनी का जीवन परिचय

कहते हैं की बीरबल साहनी पूरा-वनस्पति विज्ञान के विद्वान थे। बाल्यकाल से ही उनके अंदर पेड़-पौधे में गहरी रुचि थी।

लखनऊ में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पलेओबॉटनी (Birbal Sahni Institute of Palaeosciences ) की स्थापना का श्रेय इन्ही को जाता है। आईये जानते हैं वैज्ञानिक बीरबल साहनी का जीवन परिचय विस्तार से :-

डॉ बीरबल साहनी की जीवनी – Birbal Sahni Biography in Hindi

महान वैज्ञानिक बीरबल साहनी का जन्म 14 नवम्बर 1891 में अखंड भारत के पंजाब के भेरा नामक स्थान में हुआ था। जब सन 1947 में देश आजाद हुआ तब यह हिस्सा पाकिस्तान में चला गया। 

बीरबल साहनी के माता का नाम ईश्वरी देवी थी। बीरबल साहनी के पिता के नाम प्रो. रुचीराम साहनी था। उनके पिता लाहौर के एक कॉलेज में रसायन शास्त्र के अच्छे प्राध्यापक थे। बीरबल साहनी साहब अपने माता पिता की तीसरी संतान थे।

इनके पिता अक्सर प्रकृति से संबंधित रसायन विज्ञान पर शोध किया करते थे। वे पहाड़ों पर जाते और वहाँ से अनेक तरह के पौधे और चट्टाने को एकट्ठा कर अपने साथ लाते।

बचपन से ही बीरबल साहनी अपने पिता के शोध को देखा करते। इस प्रकार बचपन से ही बीरबल साहनी को भूगर्भ तथा वनस्पाती  विज्ञान के प्रति दिलचस्पी पैदा हो गई।

वैवाहिक जीवन

बीरबल साहनी का विवाह सन 1920 ईस्वी में पंजाब के राय बहादुर सुंदरदास की पुत्री ‘सावित्री सूरी‘ के साथ सम्पन्न हुआ। सावित्री सूरी ने अपने पति का कंधा-से कंधा मिलाकर साथ दिया। उन्होंने साहनी साहब के कार्यों में पूरे मनोयोग से सहयोग दिया।

कैरियर

बीरबल साहनी के पिताजी चाहते थे की उनके बेटा पढ-लिखकर बड़ा होकर ब्रिटिश भारत में आई.पी.एस. अफसर बने। लेकिन बीरबल साहनी के मन में तो कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने अवशेष वनस्पति वैज्ञानिक में रुचि लेना शुरू कर दिया।

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्कूल में ही हुई। उसके बाद उन्होंने सन 1911 ईस्वी में पंजाब विश्वविद्यालय से साइंस में पोस्ट ग्रैजूइट की डिग्री हासिल की। पी जी की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे लंदन चले गये।

वहाँ से उन्होंने सन 1919 में डॉक्टरेट (पी-एच.डी.) की डिग्री हासिल किया। लंदन यात्रा के दौरान उन्हें महान वनस्पति वैज्ञानिक प्रोफेसर ए. सी. नेवारड के मार्गदर्शन में शोध कार्य करने का मौका मिला।

लंदन से उच्च शिक्षा पाने के बाद वे भारत वापस लौटे। यहाँ इनकी नियुक्त काशी हिन्दू विश्व-विध्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्रधायपक के रूप में हो गये। उन्होंने एक प्रधायपक होने के नाते सर्वप्रथम वनस्पति विज्ञान विभाग में शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाया।

इस प्रकार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बीरबल साहनी ने कई वर्षों तक काम किया। तत्पश्चात सन 1921 ईस्वी में उन्हे लखनऊ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया।

बीरबल साहनी की खोज (Birval sahni invention / discovery

इंडियन पैलियोबॉटनी का जनक (father of indian paleontology ) ने अपने समस्त जीवन शोध में बीता दिया। इनका ज्यादातर  अनुसंधान जीवाश्म (फॉसिल) वनस्पति पर रहा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम करने वाले पुरावनस्पति वैज्ञानिक बीरबल साहनी ने फॉसिल ‘पेंटोज़ाइली’ की खोज की थी। उन्होंने फॉसिल ‘पेंटोज़ाइली’ की खोज तत्कालीन बिहार के राजमहल की पहाड़ियों से की थी।

सूक्ष्म जीवाश्मों पर उनकी खोज के कारण दुनियाँ भर के वैज्ञानिकों ने उनकी प्रशंसा की थी।

बीरबल साहनी का योगदान (Birbal sahni contribution )

महान अवशेष वनस्पति वैज्ञानिक बीरबल साहनी को उनके अमूल्य योगदान के लिए हमेशा याद किया जायेगा। उन्होंने वनस्पति अवशेषों पर शोध के लिए पुरा विज्ञान संस्थान की स्थापना की।

बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ़ पैलियोबोटनी (Birbal sahni institute of palaeobotany) की नींव भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी। यह संस्थान ‘बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ़ पैलियोबॉटनी’ के नाम से लखनऊ में स्थित है।

उनकी इच्छा थी की भारत में एक पुरा-वनस्पति संस्थान की स्थापना की जाय। इसके लिये उन्होंने जी-जान से प्रयास किया। उनके प्रयास के फलसरूप ही लखनऊ में बीरबल साहनी पूरा विज्ञान संस्थान (इंस्टीट्यूट ऑफ़ पलेओबॉटनी) की स्थापना संभव हो सकी।

उन्होंने प्राचीन नदी घाटी अर्थात सिन्धु घाटी, हङप्पा, मोहनजोदङो के अनेकों स्थल पर जाकर शोध किया। इन्होंने बिहार के राजमहल की पहाङियों से भी अवशेष प्राप्त कर शोध किया।

इस प्रकार इन्होंने अनेक वनस्पतियों पर शोध कर विश्व को कई महत्वपूर्ण जानकारी दी। बीरबल साहनी ने भारतवर्ष के कई दुर्लभ वनस्पतियों से विश्व को अवगत कराया। उन्होंने रोहतक के पास ईसा से 100 साल पहले के राजाओं के टकसाल के बारे में भी अनुसंधान किए।

इस प्रकार वनस्पति विज्ञानी डॉ. बीरबल ने अपने शोध के बल पर भारत को विश्व पटल पर गौरान्वित करने का कार्य किया।

सम्मान व पुरस्कार

बीरबल साहनी को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए कई सम्मान और पुरस्कार से अलंकृत किया गया।

  • सन 1929 ईस्वी में कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा विज्ञान वाचस्पति की उपाधि प्रदान की गई।
  • सन 1936 में इन्हें प्रसिद्ध संस्थान रॉयल सोसाइटी द्वारा अपना फ़ेलो (सदस्य) मनोनीत किया गया।
  • बीरबल साहनी दो वार 1937-1939 एवं 1943-1944 के बीच भारत के राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष रहे।
  • सन 1948 में वे अमेरिका की कला एवं विज्ञान अकादमी के सदस्य रहे।
  • सन 1950 में वे अंतर्राष्ट्रीय वानस्पतिक कांग्रेस, स्टाॅकहोम के अध्यक्ष रहे।

निधन

वनस्पति विज्ञान के लिए अपने सारी जिंदगी को समर्पित करने वाले इस महान वैज्ञानिक ने बिश्व को कई महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। लेकिन बीरबल साहनी का हार्ट अटेक के कारण 10 अप्रैल 1949 ईस्वी में लखनऊ में अचानक मृत्यु हो गई।

उनके निधन के बाद उनकी पत्नी सावित्री ने उनके काम को आगे बढ़ाया। बीरबल साहनी सिर्फ पुरावनस्पति विज्ञानी ही नहीं थे, बल्कि वे एक महान भूविज्ञानी और पुरातत्ववेता भी थे। उन्हें ‘भारत के प्रथम जुरासिक वैज्ञानिक‘ के रूप में हमेशा याद रखा जायेगा।

उनका मानना था की वैज्ञानिक अध्ययनों एवं अनुसंधानों का उपयोग मानव प्रगति एवं विकास में किया जाय। बीरबल साहनी उम्र भर जीवशम विज्ञान को समर्पित कर दिया।

भारत को इस महान वैज्ञानिक पर हमेशा गर्व रहेगा। आपको वैज्ञानिक बीरबल साहनी का जीवन परिचय (Information about Birbal Sahni Biography in Hindi ) जरूर अच्छी लगी होगी। अपने सुझाव से जरूर अवगत करायें

FAQ

  1. भारत के प्रथम जुरासिक वैज्ञानिक कौन कहे जाते हैं।

    भारत के प्रथम जुरासिक वैज्ञानिक प्रो बीरबल साहनी को कहा जाता है। वे एक पूरा-वनस्पति वैज्ञानिक थे।

  2. बीरबल साहनी ने किसकी खोज की?

    प्रो बीरबल साहनी को इंडियन पैलियोबॉटनी का जनक कहा जाता है। उन्होंने वनस्पति की उत्पत्ति तथा उनके जीवाश्म पर अहम शोधकार्य किए।

  3. बीरबल साहनी की मृत्यु कब हुई?

    बीरबल साहनी की मृत्यु 10 अप्रैल 1949 ईस्वी में लखनऊ में दिल का दौरा पड़ने से हुई।

  4. बीरबल साहनी कौन से वैज्ञानिक थे?

    प्रो बीरबल साहनी भारत के एक पुरा-वनस्पती वैज्ञानिक कहे जाते हैं। उन्हें जीवावशेषों के अध्ययन के लिए जाना जाता है।

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