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कवि अज्ञेय का जीवन परिचय, कहानी और कविता – Agyeya Biography in Hindi

अज्ञेय कौन थे ?

अज्ञेय हिन्दी साहित्य के महान कवि थे। कहा जाता है की जो स्थान इंग्लिश कविता में पोइट इलियट को प्राप्त है वही स्थान हिंदी साहित्य में कवि अज्ञेय को जाता है। इन दोनों कवि ने अपने रचनाओं में शब्दों को नए ढंग से सवारते हुए व्यवस्थित स्थान दिया। इन्हें हिंदी कविता में प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में देखा जाता है।

कवि अज्ञेय का पूरा नाम ‘सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन’ था। वे एक कवि, कथाकार, निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक रहे। उन्होंने अनेकों कविता और कहानियाँ लिखी। अज्ञेय जी प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने के लिए जाने जाते हैं।

वे एक सच्चे देशभक्त और भारत की आजादी के समर्थक थे। अज्ञेय जी ने स्वतंरता संग्राम में भी सक्रिय रूप से भाग लिया और अंग्रेजों का खुलकर विरोध किया। उन्हें कई सालों तक जेल की कालकोठरी में बितानी पड़ी।

अज्ञेय साहब एक कवि, स्वतंरता सेनानी और संपादक ही नहीं बल्कि के अच्छे फोटोग्राफर भी थे। इन्हें सन 1964 में इनकी अमर रचना ‘आँगन के पार द्वार‘ के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला।

कवि अज्ञेय का जीवन परिचय - kavi agyeya biography in hindi
कवि अज्ञेय का जीवन परिचय – kavi agyeya biography in hindi

साथ ही सन 1978 में उनकी रचना “कितनी नावों में कितनी बार‘ के लिए साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार‘ से नवाजा गया। इस महान कवि का 4 अप्रेल 1987 में दिल्ली में निधन हो गया।

आइए इस लेख में हम कवि अज्ञेय अर्थात ‘सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन’ की जीवनी, उनकी प्रमुख रचनाए और उनकी बिशेषता के बारें में जानते हैं।

कवि अज्ञेय की जीवनी – Sachchidananda Hiranand Vatsyayan ‘Agyeya’ Biography in Hindi

पूरा नाम हिंदी में – सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
अज्ञेय का जन्म वर्ष – सन्‌ 1911 ई०
अज्ञेय का जन्म स्थान – कुशीनगर, देवरिया, उत्तरप्रदेश
अज्ञेय के पिता का नाम – हीरानंद शास्त्री
पत्नी का नाम – कपिला वात्स्यायन
अज्ञेय का मृत्यु – सन्‌ 1987 ई०

अज्ञेय का प्रारम्भिक जीवन

प्रसिद्ध कवि अज्ञेय का जन्म फाल्गुन शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन 7 मार्च, 1911 ई में कुशीनगर, देवरिया, उत्तरप्रदेश में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ में हुई। लखनऊ में उन्होंने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। उसके बाद जम्मू कश्मीर में फारसी और अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया।

बाद में अपने पिता के साथ बिहार के पटना में रहने लगे।  उन्होंने अपने पिता के सनीधय में हिन्दी सीखी। पटना में रहते हुए उन्होंने बँगला भाषा का भी ज्ञान प्राप्त किए। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे मद्रास चले गये।

जहां पर उन्होंने क्रिश्चियन कॉलेज (मद्रास) से इंटर की परीक्षा पास की। उसके बाद वे सन 1929 में लाहौर के फारमेन कॉलेज से B.sc की परीक्षा उत्तीर्ण की। यहीं पर वे प्रोफेसर जे.एम. बेनेड तथा प्रोफेसर हैंडेनियल के संपर्क में आये।

इन प्रोफेसर के सनीधय में उन्हें अंग्रेजी साहित्य का गहन अध्ययन करने का मौका मिला।

अज्ञेय का करियर

उन्होंने सेना में भर्ती होकर एक प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया। लेकिन सेना की नौकरी उन्हें रास नहीं आई और उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी। भारत के आजादी के बाद सन 1950 में वे ऑल इंडिया रेडियो में अपनी सेवा देने लगे। उन्हें यूनेस्को के निमंत्रण पर यूरोप का भ्रमण का भी मौका मिला।

बाद में उनकी नियुक्ति कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में हुई। जहां उन्हें वहाँ के छात्रों को भारतीय संस्कृति और साहित्य पढ़ाने से अवगत कराने का मौका मिला। इस प्रकार उनका अक्सर देश विदेश का दौरा लगा रहता था। आगे चलकर वे जोधपुर विश्वविद्यालय में एक संभाग के डायरेक्टर भी बने।

क्रांतिकारी जीवन का श्रीगणेश

उच्च शिक्षा प्राप्ति के बाद अज्ञेय के मन में देश की आजादी के लिए कुछ करने के भावना प्रबल हुई। इस प्रकार उनके क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत हुई। उन्होंने भारत के आजादी के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष किया।

‘अज्ञेय’ साहब हिंदुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी में शामिल होकर क्रांतिकारी जीवन बिताने लगे। कहते हैं की एक बार वे बम बनाते हुए पकड़े गए। फलतः उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इस प्रकार वे चार वर्ष तक जेल में रहे। साथ ही उन्हें 2 साल तक नजरबंद भी रखा गया।

इस दौरन वे अंग्रेजों के नजर में आ गये और गिरफ्तार कर लिए गये। अज्ञेय ने सन 1942 दिल्ली में अखिल भारतीय फासिस्ट विरोधी सम्मेलन’ का आयोजन किया। इस प्रकार अज्ञेय जी ने भारत की आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लिया।

कई पत्र पत्रिका का सम्पादन

अज्ञेय साहब को लिखने पढ़ने का शुरू से ही बहुत शौक था। अपने जीवन काल में उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं का सम्मापदन किया। उन्होंने हिंदी साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान‘ का संपादन किया। आगे चलकर उन्होंने ‘सैनिक’ नामक पत्रिका का संपादन किया।

उसके बाद वे हिन्दी पत्रिका ‘विशाल भारत‘ का सम्पादन करने लगे। उन्होंने अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में वाक् तथा एवरीमैंस का संपादन किया। बाद में अज्ञेय जी कुछ वर्ष तक ‘आकाशवाणी‘ से भी जुड़े रहे।

अज्ञेय का साहित्यिक परिचय

अज्ञेय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक कवि, लेखक, उपन्यासकार और अच्छे संपादक भी थे। लेकिन उनका नाम कवि के रूप में ही सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुआ। उनकी पकड़ सिर्फ हिन्दी साहित्य में ही नहीं बल्कि वे अंग्रेजी के भी अच्छे जानकार थे।

तभी तो उन्होंने अपने जीवनकाल हिन्दी और अंग्रेजी दोनों पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

हिन्दी साहित्य में योगदान

अज्ञेय साहब बहु मुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कविता, कहानियों और उपन्यास इन सभी क्षेत्रों में अपनी लेखनी से अमिट छाप छोड़ी। आइये उनके साहित्यिक परिचय को विस्तार से जानते हैं। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य के कविता के रुद्ध मार्ग को अपने प्रखर लेखनी से प्रशस्त किया। हिन्दी साहित्य में योगदान के लिए इस महान कवि को हमेशा याद किया जाएगा।

अज्ञेय की रचनाएँ

अज्ञेय ने अपनी पहली कविता जी रचना 1927 ई. की थी। क्रांतिकारी जीवन के दौरण जब वे गिरफ्तार होकर दिल्ली के जेल में बंद थे। तभी जेल में रहते हुए उन्होंने ‘चिंता’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ की रचना की थी। बाद में सन 1933 ई. में इनकी प्रसिद्ध काव्यकृति ‘भग्नदूत’ प्रकाशित हुआ।

उन्होंने आगे चलकर अनेकों कविता, कहानियाँ और उपन्यास की रचना की। साथ ही कई ग्रंथों का सम्पादन भी किया जिसमें तारसप्तक’ (1943), ‘दूसरा सप्तक’ (1951) तथा तीसरा सप्तक’ (1959) महत्वपूर्ण है।

अज्ञेय की प्रमुख काव्यकृतियों :-

अज्ञेय की कविता में प्रकृति चित्रण बड़े ही मनोरम ढंग से मिलता है। उन्हें हिन्दी में प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रवर्तक कहा जा सकता है। उनके कविता में प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति, शब्द चयन में सावधानी, भाषा की गम्भीरता साफ नजर आती है।

इसे अज्ञेय की काव्यगत विशेषताएं कही जा सकती है। अज्ञेय की प्रसिद्ध कविता की सूची में प्रमुख नाम हैं।

  • ‘भग्नदूत’ (1933),
  • ‘चिंता’ (1942),
  • ‘इत्यलम्’ (1946),
  • ‘हरी घास पर क्षण भर’ (1949),
  • ‘बावरा अहेरी’ (1954),
  • ‘आँगन के पार’ (1961),
  • ‘सुनहरे शैवाल’ (1965),
  • ‘कितनी नावों में कितनी बार’ (1967)
  • ‘सागर-मुद्रा’ (1970)

अज्ञेय की कहानियाँ : – अज्ञेय द्वारा रचित प्रमुख कहानियों के नाम हैं : –

  • ‘विपथगा’ (1937),
  • ‘परंपरा’ (1944),
  • ‘कोठरी की बात’ (1945),
  • ‘शरणार्थी’ (1948),
  • ‘अमर वल्लरी तथा अन्य कहानियाँ’ (1954),
  • ‘अछूते फूल और अन्य कहानियाँ’ (1960) ।

अज्ञेय द्वारा रचित उपन्यास

  • ‘शेखर : एक जीवनी’ (दो-भाग, 1941, 1944),
  • ‘नदी के द्वीप’ (1952)
  • ‘अपने-अपने अजनबी’ (1961) ।

इसके अलावा उन्होंने निबंध-संग्रहों के साथ -साथ यात्रा-वृत्तांत भी लिखे। इनके निबंध संग्रह में ‘कागद कोरे’ तथा ‘भवंती’ (1972) आदि प्रमुख हैं।  

अज्ञेय का व्यक्तित्व एवं कृतित्व

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अज्ञेय सिर्फ एक लेखक ही नहीं बल्कि एक अच्छे कवि और उपन्यासकार भी थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य के कहानी, कविता, उपन्यास, निबंध, यात्रा वृतांत समेत साहित्य के लगभग सभी आयामों को छुआ।

इसके साथ ही उन्हें फोटोग्राफी का भी बड़ा शौक था। अज्ञेय अपनी रचना में प्रयोगवाद के लिए भी जाने जाते हैं।

सम्मान व पुरस्कार

अज्ञेय जी द्वारा हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार मिले। उन्हें 1964 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार रचना ‘आँगन के पार द्वार’ के लिए मिल। साथ ही उन्हें सन 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें उनकी अमर कृति ‘कितनी नावों में कितनी बार’ के लिए प्रदान किया गया।

अज्ञेय जी की मृत्यु

अपने जीवन काल में अज्ञेय जी ने अनेकों देशों की यात्राएँ की और यात्रा वृतांत लिखी।  महान लेखक अज्ञेय ने अपने जीवन के प्रतिएक पल को साहित्य साधना में लगा दिया। अज्ञेय जी की 4 अप्रैल 1987 को दिल्ली में निधन हो गया।  

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के प्रश्न उत्तर F.A.Q

अज्ञेय का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

कवि अज्ञेय का जन्म 7 मार्च 1911 को कुशीनगर उत्तरप्रदेश में हुआ था।

अज्ञेय को अज्ञेय’ नाम किसने दिया?

कहा जाता है की मुंशी प्रेमचंद जी ने सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को ‘अज्ञेय‘ की उपाधि प्रदान की थी।

अज्ञेय को ज्ञानपीठ पुरस्कार किस रचना पर मिला?

प्रसिद्ध लेखक अज्ञेय को ज्ञानपीठ पुरस्कार उनकी रचना ‘कितनी नावों में कितनी बार’ के लिए मिला।

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