भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया की जीवनी | DN Wadia Biography in Hindi

भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया जीवनी | DN WADIA BIOGRAPHY IN HINDI

भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया की जीवनी | DN Wadia Biography in Hindi

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भूविज्ञानी डी एन वाडिया जीवनी – DN Wadia Biography In Hindi

दरशाव नौशेरवान वाडिया (D.N. WADIA) भारत के जाने-माने भूगर्भशास्त्री थे। भारतीय भूतात्विक सर्वेक्षण में डी.एन. वाडिया (Darashaw Nosherwan Wadia )का अहम योगदान माना जाता है।

इन्होंने हिमालय के बनावट, संरचना, उद्भव का वाडिया साहब ने पंजाब के पीर पंजाल पर्वत की संरचना पर सर्वेक्षण करते हुए अपने मौलिक विचार प्रकट के बारे में गहन शोध और सर्वेक्षण किया।

इन्होंने दो बार भारतीय विज्ञान परिषद के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। सन 1964 में उन्होंने नई दिल्ली में होने वाले ‘22 वें अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ कांग्रेस’ की अध्यक्षता की।

सन 1938 में उन्होंने श्री लंका सरकार के आग्रह पर वहाँ के सरकारी भूवेत्ता के रूप में काम किया। उनके अहम योगदान के कारण ही उनके निधन के ठीक एक साल पहले सन 1968 में ‘हिमालय भूविज्ञान संस्थान’ की स्थापना हुई।

आईए इस लेख में डी एन वाडिया जीवनी (DN Wadia Biography in Hindi ) विस्तार से जानते हैं।

जन्म व प्रारम्भिक जीवन

दरशाव नौशेरवान वाडिया का जन्म गुजरात के उधोगिक शहर सूरत में 25 अक्तूबर 1883 को हुआ था। बाद में इनका परिवार सूरत से बड़ौदा शिफ्ट हो गया। बचपन में वाडिया साहब को घर के लोग प्यार से दारा कहते थे।

इस कारण वाडिया साहब के प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा बड़ौदा में ही सम्पन्न हुआ। उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उनका नामांकन बंबई विश्वविध्यालय में हुआ। यहाँ से उन्होंने सन 1905 ईस्वी में B.Sc और बाद में M.Sc की डिग्री हासिल की।

भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया जीवनी | DN WADIA BIOGRAPHY IN HINDI
भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया

वाड़िया साहब बचपन से ही पढ़ने में तेज थे। इन्हें पेंटिंग का भी बहुत शौक था। लेकिन इनके भाई ने इनकी जिज्ञासा को विज्ञान की ओर मोड़ा। इस कारण उनके अंदर भूगर्भ विज्ञान के प्रति गहरी रुचि पैदा हो गई।

वे बड़े होकर एक बड़े भूगर्भशास्त्री बनना अपना लक्ष्य बना लिया। यह भी कहा जाता ही की उनके अंदर भू-विज्ञान के प्रति गहरा लगाव कालेज के प्रिन्सपल प्रो अदारजी एम मसानी के कारण हुआ।

करियर

उच्च शिक्षा के बाद कुछ दिनों तक वे बड़ौदा के एक कालेज में व्याख्याता के रूप में सेवा दिया। उसके बाद आपकी नियुक्ति जम्मू स्थित ‘प्रिन्स ऑफ वेल्स कॉलेज’ में एक प्रोफेसर के रूप में हूई। वहाँ पर उनके करियर को और निखड़ने का मौका मिला।

उन्हें वहाँ पर चारों तरफ फैली हिमालय पर्वतमाला में अनुसंधान का सुनहरा मौका मिला। छुट्टी के दिन हिमालय पर्वतमालाओं में जाकर वे खनिज, चट्टान और अवशेष एकत्रित करते और उस पर अपने अनुसंधान करते।

सन 1921 में इनकी नियुक्ति भारतीय भूतात्विक सर्वेक्षण विभाग(Geological Survey of India) में हुई। भारतीय भूतात्विक सर्वेक्षण विभाग (जियॉलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया ) में रहते हुए उनहोने हिमालय को अपना कार्य क्षेत्र बना लिया।

उन्होंने हिमालय पर्वतमाला में भ्रमण कर पर्वत की बनावट और शिलाओं का गहन अध्ययन किया। अपने अनुसंधान के दौरान इन्होंने भूगर्भ विज्ञान नामक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद इनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।

डी.एन. वाडिया का योगदान

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डॉ वाडिया की हिमालय के बारे में उनके अनुसंधानों के कारण उनकी ख्याति पूरे दुनिया में फैल गई। उन्होंने हिमालय के चट्टानों की उत्पत्ति और संरचना के बारे में गहन शोध किया।

उन्होंने पंजाब के पीर-पंजाल, नागा पर्वत, हिन्दू कुश की पहाड़ी के बारे में अनुसंधान कर कई राज से पर्दा उठाया। इसके साथ ही आपने कोहाट के काले नमक के पहाड़ की उत्पत्ति, भारतीय मृदा का भी गहन अध्ययन किया।

वाडिया साहब ने मध्य एसिया के मरुभूमि की उत्पत्ति तथा खनिज संपदा के बारे में अपने विचार दिये। उनके अनुसार लाखों साल पहले हिमयुग में पृथ्वी हिम से अच्छादित था। हिमनद के खत्म होने बाद यह स्थान बालू से भड़ा।

आजकल हिमनद केवल उतरी धुरव पर शेष बचा है। उन्होंने हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निर्माण में अहम रोल अदा किए। उनके सम्मान में बाद में हिमालयी भूविज्ञान संस्थान का नाम परिवर्तित कर वाडिया हिमालय भूविज्ञान केंद्र रखा गया।

इसके अलाबा उनके अहम प्रयास के कारण “राष्ट्रीय भू-भौतिकी अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद” तथा “राष्ट्रीय महासगर विज्ञान संस्थान पणजी, गोआ” की स्थापना संभव हो सकी।

उनके नाम पर ही भारत सरकार के विज्ञान और प्रौधोगिकी विभाग के अंतर्गत “वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान देहरादून” में स्थित है।

डी.एन. वाडिया द्वारा लिखित पुस्तक

डी.एन. वाडिया साहब ने अपने अनुसंधान को लिपिबद्ध किया। इस क्रम में उन्होंने 100 के करीब मौलिक शोध लेख व मोनोग्राफ की रचना की। उन्होंने भूगर्भ विज्ञान से संबंधित कई पुस्तकों का भी लेखन किया।

सन 1916 में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था ‘जियोलाजी ऑफ इंडिया एण्ड बर्मा’। उन्होंने बाद में जियॉलॉजी ऑफ नागा पर्वत एण्ड गिलगित डिस्ट्रिक्ट और स्ट्रक्चर ऑफ हिमालय (Structure of Himalayas) की रचना की। इस रचना के बाद इनकी ख्याति पूरे विश्व में फैल गई।

सम्मान व पुरस्कार

भूगर्भशास्त्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वाडिया साहब को 1934 में बैक पुरस्कार से नवाजा गया। लंदन की रॉयल जियॉलॉजीकल सोसाइटी ने उन्हें 1943 में विश्व प्रसिद्ध लॉयल पदक से सम्मानित किया गया।

डी.एन. वाडिया को राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान द्वारा मेघनाथ साहा मेडल प्रदान किया गया। इसके साथ ही पी एन बोस मेडल भी कलकता के एसियाटिक सोसाइटी ने उन्हें प्रदान किया।

लंदन के रॉयल सोसाइटी ने सन् 1957 में उन्हें अपना फैलो(सदस्य) बनाया। रॉयल सोसाइटी लंदन द्वारा भूगर्भ विज्ञान के वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्हें फैलो चुना गया।

भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया जीवनी | DN WADIA BIOGRAPHY IN HINDI
भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया की स्मृति में डाक टिकट

भारत सरकार ने इस महान वैज्ञानिक को देश का प्रसिद्ध सम्मान ‘पदमभूषण’ से सम्मानित किया। भारत सरकार उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।

डी.एन. वाडिया का निधन

भारत के इस महान भूगर्भशास्त्री का निधन 15 जून 1969 हो गया। एक भूगर्भशास्त्री के रूप में उनके सभी शोध मौलिक थे। भूगर्भविज्ञान के क्षेत्र में उनके अहम योगदान को हमेशा याद रखा जायेगा।

पाठकगण भूविज्ञानी डी. एन. वाडिया जीवनी (DN WADIA BIOGRAPHY IN HINDI) जरूर अच्छी लगी होगी। अपने सुझाव से अवगत कराएं।



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