भगवान धन्वंतरि कौन है (LORD DHANVANTARI STORY IN HINDI)

LORD DHANVANTARI STORY IN HINDI – धन्वंतरि वैदिक भारत के महान आयुर्वेदाचार्य कहा जाते हैं। धन्वंतरि को औषधि के देवता और देवताओं के चिकित्सक कहे जाते हैं। भगवान धन्वंतरि को प्राचीन भारत के आयुर्वेद का जनक माना जाता है।

उन्होंने रोग निदान के द्वारा अकाल मृत्यु को रोकने के कई आयुर्वेदिक निदान और चिकित्सा बताया। उसमें वृद्धावस्था को प्राप्त मृत्यु को काल और उम्र के पहले होने वाली मृत्यु को अकाल मृत्यु कहा।

धन्वंतरि के विषय में कहा जाता है की उन्होंने देवराज इंद्र अथवा ऋषि भरद्वाज से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। महान प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों धन्वंतरि ने मृत्यु को दो श्रेणी में विभकत किया।

श्रीमद्भागवत, विष्णु और अग्नि पुराण के आधार पर भगवान धन्वंतरि की उत्पत्ति समुंद मंथन से मानी जाती है। वे समुन्द्र मंथन के दौरन अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।

भगवान धन्वंतरि कौन थे | LORD DHANVANTARI STORY IN HINDI
भगवान धन्वंतरि कौन थे | LORD DHANVANTARI STORY IN HINDI

कहा जाता है की उन्हें अमृत निर्माण का ज्ञान प्राप्त था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने धन्वंतरि का काल ईसा पूर्व 6075 मानते हैं। प्राचीन भारत में अवतरित भगवान धन्वंतरि को आयुर्वैदिक विज्ञान के प्रसिद्ध देव कहे जाते हैं।

धन्वंतरि दिवस

धन्वंतरि को केवल आरोग्य प्रदाता ही नहीं बल्कि समृद्धि दाता भी कहा जाता है। हर साल दीपावली से ठीक पहले कार्तिक मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को उनकी विशेष पूजा का विधान है।

यह दिन चिकित्सक से साथ-साथ आम जन के लिए भी बेहद खास दिन होता है। इस दिन लोग भगवान धन्वन्तरि की उपासन कर अपने तथा अपने परिवार की अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

इस महान प्राचीन वैध की यादगार में हर वर्ष समस्त भारत में ‘धन्वंतरि दिवस’ मनाया जाता है।  

धन्वंतरि संहिता

भगवान धन्वंतरि को आयु के हरेक पराव पर होने वाले शारीरिक व्याधि और उनके चिकित्सा का ज्ञान था। तभी तो उन्हें आयुर्वेद का जन्मदाता कहा जाता है। कहा जाता है की उन्हें समस्त विश्व के वनस्पतियों के वारें में ज्ञान था।

वे हर वनस्पतियों के गुण-दोष और उसका चिकित्सा में उपयोगिता के बारें में ज्ञान था। कहते हैं की धन्वंतरि ने आयुर्वेद पर अनेकों ग्रंथों की रचना की था। लेकिन सिर्फ धन्वंतरि संहिता ही उपलब्ध मानी जाती है।

धन्वंतरि संहिता को आयुर्वेद जगत का मूल ग्रंथ कहा जाता है। उन्होंने ही इस बात की उल्लेख किया है की जरा-मृत्यु से रक्षा हेतु देवताओं ने सोम अमृत का निर्माण किया था।

भगवान धन्वंतरि के जन्म से जुड़ी कहानी – LORD DHANVANTARI STORY IN HINDI

पहली कहानी

जब देवता और दानव मिलकर अमृत पाने के लिए समुन्द्र मंथन कर रहे थे। तभी भगवान धन्वन्तरि की उत्पत्ति मानी जाती है। समुन्द्र मंथन की कथा पुराणों में विस्तार से वर्णित है। माना जाता है की समुन्द्र मंथन के दौरन 14 रत्न निकले थे।

इस दौरन सबसे पहले निकलने वाला रत्न बिष था। जिसे भगवान शंकर ने संसार के लिये विनाशकारी जान खुद पी लिए। इसी बिष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हुआ और वे नीलकंठ कहलाये।

कहा जाता है की मंथन के अंत में भगवान धन्वंतरि अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। बाद में इसी अमृत को पाने के लिए देवों और असुर में संग्राम हुआ। समुन्द्र मंथन के बारें में विशेष जानने के लिए लिंक पर क्लिक करें।

दूसरी कहानी

bhagwan dhanvantari के जन्म से जुड़ी एक और भी पौराणिक कथा प्रसिद्ध है। धन्वंतरि काशी के महाराज धन्व के पुत्र माने जाते हैं। कहा जाता है की ईसा पूर्व करीब सात हजार वर्ष पहले काशी में उनका जन्म हुआ था।

माना जाता है यह समुद्र मंधन से निकले धन्वंतरि का ही दूसरा जन्म था। पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है की काशी में धन्व नाम के राजा थे। राजा धन्व ने अज्ज नामक देव की कठोर उपासन की।

उन्होंने अपने कठोर तपस्या के वल पर अज्ज देव को प्रसन्न कर लिया। उन्होंने खुश होकर राजा धन्व से वरदान मांगने का कहा। इस प्रकार उन्होंने भगवान धन्वंतरि को पुत्र रूप में अपने धर उत्पन्न होने का वर प्राप्त कर लिया। इसका बात का उल्लेख पुराण में भी मिलता है।

तीसरी कथा

धन्वंतरि से जुड़ी तीसरी कथा भी प्रसिद्ध है। इस कथा के अनुसार एक बार जंगल भ्रमण के क्रम में एक ऋषि को जोड़ों की प्यास लग गई। थककर चूर हो चुके ऋषि का गला प्यास से सुख रहा था।

तभी संयोग से वीरभद्रा नामक लड़की अपने माथे पर पानी का घड़ा लिए गुजर रही थी। उस युवती ने उन्हें जल पिलाया तब जाकर ऋषि के जान में जान आई। ऋषि ने प्रसन्न होकर अनजाने में उस  युवती को अति ज्ञानवान पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दे दिया।

उन्होंने कहा की तुम्हारा पुत्र अपने ज्ञान की ज्योति से समस्त संसार को आलोकित करेगा। लेकिन जब लड़की ने बताई की वह कुंवारी है। तब ऋषि ने घास-फूस का पुतला बनाकर उस लड़की की गोद में रख कर मंत्र का आह्वान किया।

मंत्र के आह्वान से वह पुतला एक जीवित बालक के रूप में परिवर्तित हो गया। कहते हैं की यही बालक आगे चलकर विश्व के महान आयुर्वेदचार्य के रूप में जगत प्रसिद्ध हुए। 

धन्वंतरि जी ने किनसे आयुर्वेद का ज्ञान पाया?

कहा जाता है ही धन्वंतरि ने इन्द्र देवता से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। सर्वप्रथम आयुर्वेद का ज्ञान जगत के सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी से अश्वनी कुमार और क्रमश इन्द्र के पास आया।

इन्द्र ने इस ज्ञान को धन्वन्तरि को प्रदान किया। जिन्होनें लोककल्याण हेतु समस्त संसार में इस ज्ञान को फैलाया। आयुर्वेद के प्रसिद्ध प्राचीन ऋषि सुश्रुत ने भगवान धन्वंतरिजी से ही आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था।

समय के साथ यह चरक आदि ऋषियों के पास आया। इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी यह ज्ञान हस्तांतरित होता रहा। धन्वंतरि को महान ऋषि सुश्रुत अपना गुरु मानते थे। उनके अनुसार धन्वंतरि ने यह ज्ञान इंद्र से प्राप्त किया था।

जबकि हरिवंश पुराण के आधार पर धन्वंतरि ने भरद्वाज ऋषि से आयुर्वेद का ज्ञान ग्रहण किया था। कहते हैं की धन्वंतरि का विवाह अश्विनी कुमारों की पुत्रि के साथ सम्पन्न हुआ था।

धन्वंतरि का योगदान

धन्वन्तरि के अनेक शिष्य हुए जिन्होंने आयुर्वेद-ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाकर लोक कल्याण किया। उनके शिष्यों में सुश्रुत और आचार्य दिवोदास प्रसिद्ध माने जाते हैं।

सुश्रुत के द्वारा रचित ग्रंथों में भी धन्वंतरि के विद्वता और प्रतिभा का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है की सुश्रुत शल्य क्रिया में निपुण थे। लेकिन धन्वंतरि को आठों अंगों के अनुपम ज्ञान था। उन्होंने चिकित्सा के सभी आयामों को छुआ।

अमृत का प्रयोग उनके प्रसिद्ध आविष्कार में माना गया है। कहा जाता है उन्हें व्याधि और औषधि का बेहद ज्ञान था। उनके बताये जीवन पद्धति और औषधि के उपयोग से हजार बर्ष की आयु तक जिया जा सकता था।  


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